
गुणानंद जखमोला-
वो भी क्या दिन थे, आज क्या दिन आ गये.. अमर उजाला को पुजारी पत्रकार चाहिए, चाटुकार भी हो तो सलेक्शन पक्का.

मैंने अमर उजाला में आठ साल काम किया। बहुत ही अच्छा अनुभव था। तब पत्रकार की सुनी जाती थी। मुझे याद है कि 2000 की बात है। मैं तब महज स्ट्रिंगर था। अमर उजाला के तत्कालीन दिल्ली-एनसीआर एडिटर ने बाईलाइन खबरों पर रोक लगा दी थी तो मैंने अपना इस्तीफा नोएडा फैक्स कर दिया था कि यदि पत्रकार से उसकी पहचान ही छीन ली जाएं तो ऐसी नौकरी क्या करनी?
ग्रुप एडिटर राजेश रपरिया जी से मुझे डांट पड़ी और मेहनत करने का फरमान भी सुना दिया।
2001 में दैनिक भास्कर, हरियाणा लांच कर रहा था। प्रख्यात पत्रकार बलदेवभाई शर्मा संपादक थे। पानीपत इंटरव्यू के लिए गया तो बाहर निकलते ही रिसेप्शन पर ज्वाइंनिंग लेटर मिल गया। तब अमर उजाला के मालिक राजुल जैसे अकड़ू और कान के कच्चे राजुल महेश्वरी नहीं थे। अतुल जी ने मेरठ से बकायदा दूत भेजा और मुझे वही सेलरी ऑफर की, जो भास्कर दे रहा था।
इसमें गुड़गांव में हमारे ब्यूरो चीफ मलिक असगर हाशमी का भी बड़ा रोल था। लिहाजा मैं भास्कर में नहीं गया। आज की बात होती तो किसे परवाह? पता है कि सबको चाटुकार ही चाहिए।
गुड़गांव में मारूति कर्मचारियों का आंदोलन चल रहा था। हमारी टीम ने कर्मचारियों के हित में खूब खबरें लिखी। आंदोलन को अमर उजाला ने पूरा समर्थन दिया। सच कह रहा हूं कि मारुति प्रबंधन के अफसर मुझे दूर से ही पैदल जाते पीछे से ही पहचान लेते थे और लिफ्ट ऑफर करते थे, लेकिन मैंने कभी उनसे लिफ्ट नहीं ली।
उस जमाने में कार कंपनी हिन्दी अखबारों को विज्ञापन नहीं देती थी। हमारी टीम की खबरों का असर रहा कि 2001 में मारूति ने अमर उजाला को 25 लाख का विज्ञापन दिया। कहा गया कि आंदोलन की खबर मत लिखो। मैं फिर नौकरी छोड़ने की धमकी देने लगा कि बाजार में हमारी क्या कीमत रह जाएगी।
ग्रुप एडिटर राजेश रपरिया जी ने साफ कह दिया कि खबरें देते रहो, छपेंगी और छपी भी। आज तो कोई 100 रुपये का विज्ञापन दे तो उसके खिलाफ एक शब्द नहीं लिख सकते। अमर उजाला उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के भ्रष्टाचार की एक लाइन तक छाप सका।
2005 में शशि शेखर ने ग्रुप एडिटर का काम संभाला तो कारपोरेट जर्नलिज्म की आड़ में उन्होंने अमर उजाला की कमर तोड़ दी। दिल्ली और नेशनल ब्यूरो से चुन-चुन कर नामी-गिरामी पत्रकारों को हटाने या उनको इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। अमर उजाला खाली और फटा हुआ ढोल बन कर रह गया।
2006 में जो इंक्रीमेंट मिला तो मैं गुस्से से आग बबूला हो गया। मैंने इंक्रीमेंट लेटर पर लिखा कि घोर निंदनीय। और उसे नोएडा भेज दिया। तत्कालीन संपादक शंभुनाथ शुक्ला जी थे। उन्होंने नोएडा बुलाया और समझाया कि भगत सिंह मत बनो। खैर, इंक्रीमेंट लेटर की रिसीविंग पर मेरी टिप्पणी पर वाइटनर लगा दिया और मेरी नौकरी बच गयी।
हालांकि, मैंने उस दिन ही तय कर लिया था कि अब अमर उजाला में नौकरी नहीं करनी। चार महीने तक जेब में रोज इस्तीफा लेकर घूमता रहा और इसके बाद ही नवभारत टाइम्स में नौकरी मिली।
आज अमर उजाला बदहाल है। कई एडिशन घाटे में चल रहे हैं। उत्तराखंड के जिलों में स्टाफ रिपोर्टरों को डिमोट कर स्ट्रिंगर बना दिया गया है। एजेंसी के लेटर पर पत्रकारों का चयन हो रहा है।
अध्यात्म एक बीट हो सकती है लेकिन अध्यात्म रिपोर्टर का लॉजिक समझ से परे है, लेकिन यह बाजारवाद का जमाना है। पंडिताई और बाबाओं की खूब चल रही है तो ऐसे में अमर उजाला पुजारी पत्रकारों जैसी पूरी बात नहीं लिख सका.. वो मैं पूरी कर रहा हूं कि पुजारी होने के साथ ही उसे चारण या भाट टाइप भी होना चाहिए। गिरो अमर उजाला, गिरो, अभी तो और जोर से गिरना है तुमको।
मूल खबर…



विकास श्रीवास्तव
September 30, 2024 at 2:19 pm
बिलकुल सही। आज तो अमर उजाला में एक एक करके पुराने लोगों को निकल दिया गया। विजय त्रिपाठी जैसे संपादकों ने प्रताड़ना का नया अध्याय लिखा। मैं भी एक प्रताड़ित हूं। कई बार आवाज उठाने के बाद भी राजुल जी ने मेरा पक्ष जानने की आवश्यकता नहीं समझी।