
ब्लैक बॉक्स मिलने से पहले ‘ये एक्सीडेंट था… कोई रोक नहीं सकता’ पर कुछ नहीं है। यह बयान दुर्घटना से पल्ला झाड़ने की कोशिश हो (और है ही) तो अखबारों का सहयोग भी पूरा है। विमान यात्रियों के अलावा कई मरे लेकिन उनकी गिनती भी सही नहीं है।
संजय कुमार सिंह
दुर्घटनाग्रस्त विमान का ब्लैक बॉक्स मिला – आज की बड़ी खबरों में है। तथ्य यह है कि दो में से एक ही मिला है, दूसरे की तलाश जारी है और इसे लीड के शीर्षक के रूप में सिर्फ नवोदय टाइम्स ने बताया है। दैनिक भास्कर ने शीर्षक में मरने वालों की संख्या 275 होने की जानकारी दी है। देशबन्धु ने लिखा है, हादसे में अब तक 270 लोगों के शव बरामद। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, एयर इंडिया विमान हादसे में मरने वाले 274 हुए; जमीन पर 33 मौतों की पुष्टि। द टेलीग्राफ के अनुसार मरने वालों की संख्या 265 हो गई है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, जमीन पर मरने वालों की संख्या बढ़ी। इनमें चाय वाले का बेटा भी है। खबर के अनुसार मरने वालों की संख्या 265 से 270 के बीच होगी। यह सूचना अहमदाबाद (जोन फोर) के डिप्टी कमिश्नर कानन देसाई के हवाले से है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर मरने वालों की संख्या से संबंधित कोई खबर नहीं है। द हिन्दू की लीड बताती है कि हॉस्टल की छत से ब्लैक बॉक्स मिल गया है और प्रधानमंत्री मोदी ने दुर्घटना स्थल का दौरा किया। अखबार ने मोदी के इस दौरे की फोटो चार कॉलम में छापी है। दि एशियन एज में भी जमीन पर मरने वालों की कोई खबर नहीं है। दुर्घटना की जांच जारी, ब्लैक बॉक्स मिला जैसी खबरें जरूर हैं। अमर उजाला के पहले पन्ने से विमान दुर्घटना की खबर लगभग गायब है। कोई फॉलोअप नहीं है। नवोदय टाइम्स में दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, दुर्घटना स्थल पर पहुंचे मोदी घायलों का पूछा हाल।
कल मैंने लिखा था कि विमान आबादी के क्षेत्र में गिरा है लेकिन उसमें मरने वालों की खबर कायदे से नहीं है क्योंकि स्थानीय प्रशासन ने कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है, ‘ये एक्सीडेंट था… कोई रोक नहीं सकता’। इसकी सर्वत्र आलोचना हो रही है, मुझे ब्लैक बॉक्स की समीक्षा से पहले ऐसा कहने का कोई कारण नजर नहीं आ रहा है। दूसरी ओर, लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ की सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है क्योंकि उन्होंने जल्दी सवाल पूछ लिया और दूसरों को भी पूछने के लिए प्रेरित किया। यह अलग बात है कि सोशल मीडिया पर नेहा की आलोचना करने वाले को भी ढेरों प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा है और उन्होंने अपना स्पष्टीकरण दिया है। सोशल मीडिया पर अमित शाह के बयान और जल्दबाजी की तो चर्चा है लेकिन आज अखबारों में पहले पन्ने पर इससे संबंधित कुछ नहीं है। अमित शाह का बयान इसलिये अनुचित और जल्दबाजी में दिया गया लगता है क्योंकि ब्लैक बॉक्स मिलने की खबर अब आई है और अभी यह नहीं बताया गया है कि उससे क्या जानकारी मिली या कोई जानकारी नहीं मिली। जो नहीं जानते उन्हें बताना सही रहेगा कि ब्लैक बॉक्स में कॉकपिट रिकार्डर होता है जिससे पता चलता है कि अंतिम समय में पायलट ने क्या बात की, क्या संदेश दिया या क्या अनुमति मांगी। आज छपी खबरों के अनुसार, टाइटेनियम से बना यह डिब्बा जो नारंगी रंग का होता है, गुरुत्वाकर्षण से 3400 गुना ज्यादा बल सह सकता है। 1100 डिग्री सेल्सियस के तापमान में एक घंटे और पानी में छह हजार मीटर की गहराई में 30 दिन तक बचा रहता है।
किसी भी विमान दुर्घटना के बाद इस ब्लैक बॉक्स को अनिवार्य रूप से और प्रमुखता से ढूंढ़ा जाता है क्योंकि इससे दुर्घटना का कारण जानने में मदद मिलती है। इसीलिये इसका रंग चमकीला रखा गया है ताकि आसानी से पहचाना जा सके और मिल जाये। दुर्घटना के तुरंत बाद इसके नष्ट होने की संभावना नहीं है। इसलिए इसके मिलने का इंतजार किया जाता है। ऐसे में इतनी जल्दी अमितशाह का इसे दुर्घटना कह देना और साथ में यह भी कि इसे टाला नहीं जा सकता है, बड़ी खबर है। उल्लेखनीय है कि 22 जुलाई 2016 को भारतीय वायुसेना का एएन-32 परिवहन विमान चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर जाते हुए लापता हो गया था। इसमें 29 लोग सवार थे। इसका मलबा कई साल बाद चेन्नई तट से लगभग 300 किलोमीटर दूर समुद्र में राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान के एक ऑटोमैटिक अंडरवॉटर व्हीकल को मिला। विमान के लापता होने के तुरंत बाद खोज अभियान का जिक्र करते हुए रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा था, ‘विमान और जहाजों द्वारा बड़े पैमाने पर खोज और बचाव अभियानों से किसी भी लापता कर्मचारी या विमान के मलबे का पता नहीं लगाया जा सका था।’ उस समय भी एनआईओटी की मदद मांगी गई थी, लेकिन तब उसके पास उस तरह के उपकरण नहीं थे, जैसे अब हैं।
इन दोनों दुर्घटनाओं में अंतर है। पहला मामला वायु सेना का विमान समुद्र में गिरने और लापता हो जाने का है जबकि हाल का मामला नागरिक विमान के उड़ते ही घनी आबादी में गिर जाने और गैर यात्रियों की भी मौत का है। विमान हादसे होते रहेंगे तो हवाई अड्डे के पास या हवाई मार्ग के नीचे की आबादी को सुरक्षित कैसे किया जाये – किसकी जिम्मेदारी है। खासकर तब जब हाल में ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान दिल्ली से श्रीनगर जा रहे क्षतिग्रस्त विमान को पाकिस्तान की वायु सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया गया और पायलट किसी तरह विमान को श्रीनगर में सुरक्षित लैंड करा पाया। ऐसे में हादसे भले रोके न जा सकें, उसका कारण समझने और बताने के लिए इंतजार तो किया जाना चाहिये। फिर भी देश का नेतृत्व या भविष्य नियंता कहें कि रोका नहीं जा सकता है तो खबर क्यों नहीं है और है तो पहले पन्ने की क्यों नहीं? इसमें दिलचस्प यह भी है कि इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड विमान दुर्घटना में मारे गये लोगों की तकलीफ और इंतजार पर है। फ्लैग शीर्षक के तीन बिन्दुओं में एक है – कॉकपिट वॉयस रिकार्डर की तलाश जारी। दूसरे कई अखबारों में ब्लैक बॉक्स मिला लीड का शीर्षक है। ऐसे में मुझे इंडियन एक्सप्रेस का यह शीर्षक अटपटा लग रहा है कि ब्लैक बॉक्स दुर्घटना स्थल पर मिला, जांच के लिए लीड मिलने की संभावना। असल में ब्लैक बॉक्स होता ही इस काम के लिए है। मुझे याद नहीं है कि 2016 के हादसे में ब्लैक बॉक्स ढूंढ़ा गया था या नहीं और बाद में भी मिला या नहीं। विमान भारतीय वायुसेना का था तो यह भी नहीं जानता कि उनमें होते हैं या नहीं। पर अभी यह सब मुद्दा नहीं है।
अहमदाबाद के हादसे के बारे में कहा जा चुका है कि इस तरह की दुर्घटना का कारण हवाई अड्डे के पास घनी आबादी और इस कारण पक्षियों की मौजूदगी तथा उनसे टकराने के अलावा तकनीकी भी हो सकते हैं। इनमें दोनों इंजन का फेल होना और ईंधन दूषित होना शामिल है। इसके अलावा रनवे का छोटा होना भी दुर्घटना का कारण बनता है और ऐसे कई हवाई अड्डे हैं जहां रनवे तो छोटा है ही, हवाई अड्डे के आस-पास घनी आबादी है। विमान दुर्घटना न हो या कम हो इसके लिए इन कारणों को दूर किया जाना जरूरी है और इनसे आंख मूंद कर बिना कारण जाने यह कहना कि ‘ये एक्सीडेंट था… कोई रोक नहीं सकता’ और चीजों के अलावा असंवेदनशील होना भी है। यह नागरिकों की उपेक्षा और राजनीतिक रूप से बेपरवाह होना भी है। यह जनता की रक्षा में सरकार या शासन के नाकाम रहने का मामला भी है। जानकारों का कहना है कि विमान अगर उड़ान भरने में नाकाम रहे और हवाई अड्डे के बाहर आबादी हो तो लैंड कराने की कोशिश भी नहीं की जा सकती है और जो होगा उसे दुर्घटना ही कहा जायेगा जबकि वहां आबादी नहीं होती तो हवाई अड्डे के बाहर विमान को लैंड कराया जा सकता था या कोशिश तो की ही जा सकती थी। कुल मिलाकर, हवाई अड्डे के बाहर बचाव के लिए कोई जगह थी (है) ही नहीं। यह सब कोई नई बात नहीं है। सुरक्षा ऑडिट में बार-बार चेतावनी दी गई थी कि अहमदाबाद के रनवे के आखिर में मलबे बिखरे हैं, भूमि असमान है यहां तक कि नालियां खुली पड़ी हैं। 2019 की डीजीसीए की एक रिपोर्ट में खतरों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। 2018 में, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने रनवे के सुरक्षा क्षेत्र का विस्तार करने के लिए गुजरात सरकार से 29.79 एकड़ जमीन मांगी। उन्हें मंजूरी मिल गई, लेकिन जमीन कभी नहीं सौंपी गई। क्यों? क्योंकि इसके लिए आसपास रहने वाले 350 परिवारों को विस्थापित करना था। यह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक नहीं है। इसलिए कुछ नहीं किया गया। समानांतर टैक्सीवे, स्थानांतरण, भीड़-भाड़ कम करने की योजनाएं – सभी को टाल दिया गया। यात्रियों के मामले में हवाई अड्डे का विस्तार जारी रहा, लेकिन सुरक्षा के मामले में नहीं। और यह सिर्फ अहमदाबाद में नहीं है
एक तरफ केंद्रीय गृहमंत्री ने विमान दुर्घटना को ऐसा एक्सीडेंट कहा है जिसे कोई रोक नहीं सकता दूसरी ओर, आज ही अमर उजाला में खबर छपी है कि दिल्ली के एक थाने से ढाई करोड़ की हेराइन गायब है। ठीक है कि इस मामले में कार्रवाई हुई है और माल जब्त भी हो गया है और खबर भी यही है। मुद्दा यह है कि ढाई करोड़ की हेरोइन में से सिन्दूर की पुड़िया के बराबर हेरोइन भी न सिर्फ कीमती होगा बल्कि उसे रखना, ले जाना, बेचना, देना-लेना सब अपराध है फिर भी अंजाम दिया जा सका। वहां जो सीधे अमित शाह के नियंत्रण में है। इसके बारे में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि इसे कोई रोक नहीं सकता। नशे के नुकसान से लेकर इसके पैसे का उपयोग आतंकवाद में किये जाने की संभावनाओं के कारण इसकी सुरक्षा सर्वोपरि थी फिर भी सिन्दूर बराबर नहीं, पूरी डेढ़-दो किलो की जब्ती गायब हो गई। पुलिस की सुरक्षा से। ऐसे पुलिस वाले क्यों नौकरी में हैं और कार्रवाई सिर्फ निलंबन क्यों? नशे की खेप पहले भी बरामद हुई है उसका क्या हुआ और तस्करी रोकने के लिये क्या किया गया – नहीं बताया गया है। दूसरी ओर कुछ साल पहले मुंबई में एक फिल्म अभिनेत्री के पास कुछ ग्राम की बरामदगी पर उसका जो हाल पुलिस और मीडिया ने किया था वह ऐतिहासिक है। कहने की जरूरत नहीं है कि नशे के सेवन से ज्यादा जरूरी उसकी तस्करी को रोकना है और खबर से लगता है कि पुलिस वाले इसमें शामिल हैं। यह भी संभव है कि वे अपने ऊपर के लोगों के लिए या उनके साथ मिलकर यह काम करते हों। गृहमंत्री का काम है कि इसे रोकें। इसलिये इसपर आपका बयान अपेक्षित है।



