राजेश जोशी-
अपनी “असफलताओं” का बखान कौन करता है? या तो वो करता है जिसमें अदम्य साहस, अशेष आत्मविश्वास और ख़ुद के साधारण मनुष्य होने का गहरा एहसास हो। या फिर सफलताओं के चरम को छू लेने वाला व्यक्ति ही अपनी विगत असफलताओं का बखान करता है।
ये एक सरपंच की असफलताओं की कहानी है। अमित ने दिल्ली के अखिल भारतीय संचार संस्थान (IIMC) से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद नोएडा के टीवी चैनलों की दमक की बजाए उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के अपने गाँव का रुख़ करना ठीक समझा। गाँव में पंचायत का चुनाव लड़ा। जीता। आदर्श से भरे इस नौजवान को यकीन था कि व्यवस्था के भीतर पहुंचकर भी सुधार लाए जा सकते हैं। कहीं एक मज़बूत यकीन था कि अगर ईमानदारी से काम किया जाए तो गांव के हालात बदले जा सकते हैं। शायद ये यकीन इसलिए भी था कि ये नौजवान हिंदुत्व की भावना से ओतप्रोत था। सोचा होगा केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ हैं ही। ये असली देशभक्त हैं। समाज को बदलना चाहते हैं। भारत माता को “परम वइभव” तक ले जाना चाहते हैं। ऐसे प्रखर नेताओं के आशीर्वाद से बदलाव लाना संभव होगा।
ये एक संभावना से भरे नौजवान के हताश होने की कहानी है। दरअसल ये उसकी हताशा नहीं बल्कि हमारे समाज की हताशा की कहानी है।
पढ़िए अमित को!
अमित-
पंचायत के पांच साल; असफलताओं के साथ पूरा हुआ कार्यकाल
पांच साल पहले, मई-2021 को हमने एक जनप्रतिनिधि के तौर पर अपनी पंचायत को गांधी जी के ग्राम स्वराज और डॉ.कलाम के PURA पर आगे बढ़ाने की यात्रा शुरू की थी। इस 26-मई-2026 को हमारा निर्धारित कार्यकाल समाप्त हुए। इन बीते इन पांच सालों में हम असफल ही रहे हैं।
अक्सर लोग हमें, पंचायत के कार्यों का मूल्यांकन करने के लिए कहते हैं। दरअसल, दूसरों को बताने के लिए खुद का मूल्यांकन नहीं होता। होता है तो सिर्फ खुद के लिए होता है। हम कहने लगे कि सब कुछ अच्छा हुआ। तमाम कार्य गिनवाने लगें, 100 में 100 नंबर देने लग जाएं तो कौन मान लेगा? खुद अपनी छाती पीटने लगें तो कौन मान लेगा?
लेकिन पूछने वाला जब बार-बार दोहराता है तो हम अगर बहुत करें भी तो 30/100 से ज्यादा नहीं दे पाते। एक तिहाई को ‘पासिंग मार्क्स’ मानते हुए हमें सिर्फ 30 अंक मिलने चाहिए। यानी हम फेल हुए हैं।
सड़कें, नालियां, इमारतें, चटक रंग-रोगन, हैंडपंप, लाईटें, क्रॉसिंग्स, पुलिया आदि जैसी आधारभूत माने जाने वाली संरचनाओं को हम ‘विकास/Development’ नहीं मान पाते। समय और श्रम बचाने की कोशिशें इस धरती को सिर्फ और सिर्फ बुरा ही बनाएंगी। ये कहना अटपटा लगता है, लेकिन हम यही मानते हैं। जितना कम से कम हो, इन सबसे काम चलाया जाना चाहिए क्योंकि इनके पीछे पागल हो जाने की कोई ऊपरी सीमा नहीं है। हम हमेशा ये बात कहते आए हैं। हर राष्ट्रीय त्यौहार पर, हर ग्राम सभा में और हर सार्वजनिक मसले पर इस बात को बार-बार दोहराया गया है।
ये अवसर पंचायत में हुए उन कार्यों को गिनवाने का नहीं है जिन्हें विकास माना जाता है। उन कार्यों और उसमें हुए खर्च की जानकारी के लिए एक अलग से ब्लॉग (वेबसाइट) बनाया गया है। जिसे www.GPMalakpura.in पर देखा जा सकता है। हम यहां सिर्फ अपनी असफलताएं रख रहे हैं क्योंकि वही महत्वपूर्ण लगती हैं।
हमारे लिए विकास के मायने पर्यावरण संरक्षण से हैं। जल संरक्षण से हैं। साफ हवा के लिए हैं। इंसानों सहित सभी जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के संरक्षण से हैं। प्रकृति के संरक्षण से हैं।
हमारे लिए मनुष्यों का निर्माण ही विकास है। हम चाहते रहे कि लोग इंसान बनें। वे नागरिक बनें। लोगों के बीच सहिष्णुता हो। बंधुत्व हो। वे गांव के सार्वजनिक मसलों को लेकर नीति-निर्णयन में भागीदारी करें।
लोगों की समस्याओं का समाधान गांव में ही हो। लेकिन ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी लगातार घटती रही। लोगों की समस्याओं का गांव में समाधान नहीं करवा पाए। गांव में निस्तारण होने वाली समस्याओं के लिए लोगों को आज भी पास के नगरों में भागना पड़ता है।
हमने शिक्षा को इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण माना जो न सिर्फ आज बल्कि कल का निर्माण भी करती है। इसीलिए शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर देने की नीति अपनाई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को पंचायत के अनुकूल लागू करने की कोशिश की। हम चाहते ही रह गए कि लोगों में शिक्षा के प्रति एक लगन, एक भूख उत्पन्न हो। वे यक़ीन करें कि शिक्षा से देश-दुनिया बेहतर बनती है। बच्चों को गांव के विद्यालयों में ही बेहतर शिक्षा मिले। उन्हें बाहर न जाना पड़े लेकिन लेकिन पांच सालों में ऐसा नहीं हो पाया। स्कूलों में पढ़ने वालों की संख्या लगातार घटती रही और हम सिर्फ देखते रहे। शिक्षा के मामले में हम हार गए।
हम चाहते थे कि गांव हरा-भरा हो। हरियाली बढ़े। जल की बर्बादी न हो। लोग अपनी सीमाएं और जिम्मेदारी समझें। अनावश्यक कूड़ा-करकट उत्पन्न न हो। सिंगल-यूज़-प्लास्टिक का इस्तेमाल न हो। जहां जरूरत नहीं है, वहां कतई इस्तेमाल न हो। लेकिन कुछ नहीं हुआ। गांव को साफ रखने के लिए सफाई-कर्मी हो सकते, संसाधन झोंके जा सकते हैं लेकिन अगर हम खुद चाह लें तो मोहल्ले और गांव कम से कम गंदे हो सकते हैं। हम अपने लोगों को नहीं समझा पाए कि क्या करना है, क्या नहीं करना चाहिए और सफाई-कर्मी किसके लिए हैं। वे भी इंसान हैं। उनकी भी सीमाएं हैं। हमारे तालाब और नाली-नालियां प्लास्टिक और पॉलिथीन से पटे जा रहे हैं। इस मामले में हमारे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया। साफ-सफाई के मामले में भी हम अपने को हारना ही कहेंगे।
पंचायत में सबसे अच्छे पौधे, पूरी जिम्मेदारी और सुरक्षा के साथ पौधा लगाने, ढाई-तीन सालों तक नियमित उनकी देखभाल करने की नीति अपनाई और चलाई गई लेकिन नाममात्र के परिणाम दिखे। पूरा जोर लगाने के बाद भी दस-बीस फीसदी से ज्यादा कुछ नहीं बच पाया। हम अपने गांव को हरा-भरा बनाने के प्रयासों में भी हार गए। जिन लोगों ने हमें संसाधन दिए, उनसे माफ़ी मांगने के अलावा हम और कुछ नहीं कर सकते। हम नेतृत्व दे रहे थे तो जिम्मेदारी हमारी ही हुई। हम फिर से हार गए।
हमने सपना देखा कि लोग आर्थिक समृद्धि के लिए खुद काम करें। घर बैठे अपना छोटा-मोटा कार्य उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना सकता है। महिलाओं को इस परिकल्पना के केंद्र में रखा गया था। पहले महिलाओं को जोड़ा गया। संख्या एक सौ के पार पहुंची। फिर उनके परिवार के पुरुष सदस्यों को भी शामिल करने की कोशिशें की जाती रहीं। लेकिन इन पांच सालों में हम इस मामले में भी हार गए।
हमने सपना देखा था कि पंचायत अपने आर्थिक संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर बने। बिजली बनाने की योजना बनाई। जनपद से लेकर लखनऊ दिल्ली तक भागना होता रहा। जनपद में जिलाधिकारियों से लेकर दिल्ली में मंत्रालय में सचिव और मंत्रियों तक से गुहारें लगाई जाती रहीं। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी अपीलें की, मुख्यमंत्री को कई-कई पत्र लिख डाले गए। लेकिन पांच साल में इसमें भी असफलता ही मिली। स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा के दूसरे स्रोंतों को अपनाने में भी हम असफल ही रहे।
हमने लोगों को समझाने की कोशिश की कि गांव सामूहिकता से चलते हैं। सार्वजनिक धन आता है, उसके अलावा अन्य लोग आपके और आपके बच्चों लिए कुछ न कुछ दे रहे हैं। आप भी आगे आइए। अपने गांव के लिए। कम से कम अपने बच्चों के लिए ही आगे आ जाइए। लेकिन नाममात्र की शुरुआत के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। हम समझाने में फिर से असफल रहे।
इन सबके लिए लोगों की भागीदारी की जरूरत थी। पंचायत ने इन सभी में अच्छा-खासा धन खर्च किया लेकिन हम लोगों को साथ ना ला सके। परिणामस्वरूप सब कुछ सपनों से बहुत पीछे रहा। हम इस मामले में भी हार गए।
हमने पंचायत को उसकी अपनी आवश्यकताओं पर ले जाने की नीति अपनाई। लोग जो चाहते हैं, वह होना चाहिए। लेकिन राजधानियों, खासकर लखनऊ से सब कुछ ऊपर से थोप देने की नीति अपनाई जाती है। लखनऊ में बैठे लोगों को लगता है कि वे जो कहें, उसे बिना किसी सवाल जवाब के लागू कर दिया जाना चाहिए। ज़मीनी आवश्यकताओं और हक़ीक़तों का उनके लिए कोई मायने नहीं है।
इससे असहमति जताते हुए हम लगातार अपने आउटकम, फीडबैक और समस्या-सुझावों को दर्ज़ कराने की कोशिश करते रहे, बदलावों की अपेक्षा करते रहे लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था। किसी ने नहीं सुना। बस सूचनाओं और आदेशों की इकतरफा चाल बनी रही। अपने गांव की जरूरतों को ऊपर तक पहुंचाने में हम असफल ही रहे।
हम तहसील एवं ब्लॉक स्तर से लेकर जनपद और लखनऊ के अधिकारियों को अहम् को शांत न कर पाए। एक जनप्रतिनिधि होने के नाते हम पंचायती राज, ग्रामीण विकास, राजस्व, पुलिस, लोक निर्माण, ग्रामीण अभियंत्रण, नहर, नलकूप, बिजली, समाज कल्याण, कृषि, उद्यान, वन, जन संस्थान/निगम, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, न्याय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, आबकारी आदि विभागों से सामना हुआ। हमने सब कुछ सामने से देखा कि अंग्रेजों की बनाई गई इस्पाती चौखटें अभी भी कितनी निरंकुश बनी हुई हैं। ऐसा नहीं कि सब के सब निरंकुश या बुरे थे लेकिन अच्छों की संख्या इतनी कम या उनकी नियुक्ति अप्रभावी पदों पर थी कि उनके पास संवेदनशील होकर कुछ क्रियान्वित करने की शक्ति न के बराबर ही रही। हां, दिल्ली में जो लोग मिले उनमें कुछ बहुत अच्छे लोग मिले। अपेक्षाकृत उनकी संख्या भी अधिक रही। वे लोग हमेशा हमारे मार्गदर्शक और हमारी कमियों को सुधारने वाले बने रहे और रहेंगे।
पंचायत के हितों के लिए हम तमाम अधिकारी और कर्मचारियों को मना नहीं सके। ये नेतृत्वकर्ता के रूप में हमारी असफलता रही।
यहां एक बच्चे का जिक्र करना भी ज़रूरी है, जिसने पंचायत का सहयोग किया लेकिन उसकी मांग पूरी न कर पाए। कक्षा 8 तक गांव के विद्यालय में पढ़ने वाला एक बच्चा कोमेश हर बार पंचायत के सहयोग के लिए आगे आया। गांव का सबसे होनहार और आदर्श बच्चा। उसकी मांग थी कि उसके घर के सामने वाला रास्ता पक्का बन जाए। ग्राम सभा में प्रस्ताव की औपचारिकता और पर्याप्त संसाधन होने के बाद भी हम उसकी ये मांग इन पांच सालों में पूरा नहीं कर पाए। ये हमारी असफलता है।
सबसे अंत में… हम लोगों को समझाने में असफल रहे कि समाज निर्माण एक सामूहिक गतिविधि है। गांव भी वैसे ही चलते हैं जैसे परिवार चलते हैं। एक मुखिया होता जो दिशा देता है लेकिन परिवार के सभी सदस्यों को अपना-अपना योगदान देता होता है। सबकी हिस्सेदारी होती, सबकी जिम्मेदारी होती। सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। लेकिन हम नहीं समझा पाए। समझा पाए तो बहुत थोड़ा। उतना ही जितना पानी से भरे हुए घड़े को अगर मिट्टी में दबाकर रख दिया जाए तो जितनी गति से वह आसपास की मिट्टी में नमी पहुंचा पाता है। इससे ज्यादा नहीं।
गांधी का ग्राम-स्वराज अधूरा रह गया, डॉ.कलाम का PURA अधूरा रह गया। हम नेतृत्वकर्ता की भूमिका में थे तो इसकी जिम्मेदारी हमारी है। हम असफल हुए। दिवंगत मित्र शशांक द्वारा दिए गए हौसले या प्रोत्साहन के अनुरूप हम चल नहीं पाए।
इन पांच सालों के पहले तमाम किताबों ने हमें जो रौशनी दी थी, जो उम्मीदें दी धीं, उन उम्मीदों के अनुरूप चलना नहीं हो पाया। ये हमारी हार है।



