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सुख-दुख

मातृभूमि अखबार के नेशनल ब्यूरो हेड आनंद व्यास जी सोये तो सोते ही रह गए!

विभूति नारायण चतुर्वेदी-

आनंद व्यास! ये तो वादा न था आपका। आपको तो बनारस आना था। परिवार के साथ। बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना था। यही तो फोन पर बात हुई थी आपसे। जब आप आना चाह रहे थे, तब आ न सके थे। आपने तैयारी के बाद अपनी योजना टाल दी थी।

वजह उस समय हो रही भीड़ थी। महाकुंभ के समय भी आप आना चाहते थे। वो प्लान भी ड्रॉप हुआ था। आप सिर्फ एक ही बात चाहते थे कि परिवार को कोई दिक्कत न हो। हमने भी कहा था कि कोई परेशानी नहीं होगी।

लेकिन ये क्या? सुबह सोशल मीडिया से मालूम हुआ कि आप सोये तो सोते ही रह गए। मेरे दिल्ली छोड़ने के सात साल बाद आपका फोन आया था। आपने कार्यक्रम बनाने और टालने से पहले मुझसे लंबी बात की थी। आप अपनी बात पर कायम नहीं रहे। आप और हम को एक ही वस्तु ने जोड़ा था। वो था पान।

हां! हम दोनों का पेशा एक था। दुकान एक थी। आप गुजराती समाचार पत्र मातृभूमि के दिल्ली में नेशनल ब्यूरो हेड के पद पर लंबे समय से कार्यरत थे। हम सियासत पर बात करते थे। नेताओं और नीतियों की बात करते थे, फिर भी हम अपने-अपने पैसे का पान खाते थे और घनश्याम से पैक कराकर ले भी जाते थे।

आप बनारस आते तो शायद पहली बार मैं अपने पैसे से पान ऑफर करता। दिल्ली महानगर से दूर बनारसी आतिथ्य करता। पर आपने मौका नहीं दिया। आपकी तस्वीर भी नहीं थी। आप इतने वक्त से पत्रकारिता के पेशे में थे लेकिन इंटरनेट पर भी कोई फोटो नहीं मिली।

दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार आनंद व्यास जी

अभी अचानक आपके नंबर से स्टेटस लगा देखा। वही दुखद सूचना दोबारा पढ़ी। और आपकी तस्वीर का स्क्रीन शॉट खींचा ताकि उसे यहां लगा सकूं। आपको विनम्र श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूं। आप जहां हों, वैसे ही अपने होंठ लाल रखना क्योंकि आईएनएस पर तो आप मिलोगे नहीं।

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