अनिल सौमित्र हमारे लगभग डेढ़ दशक के मित्र हैं। इनके नाम में सौमित्र कैसे लगा, मैंने कभी पूछा नहीं, लेकिन हमारा अनुभव है कि, इसे सौमित्र जी चरितार्थ करते हैं। भोपाल में रहते मीडिया चौपाल के जरिये देश भर के संचारकों का जुटान करते रहे। सामाजिक तौर अति सक्रिय रहना उनका स्वभाव है। मूलतः संगठनात्मक व्यक्ति हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थान #IIMC में प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त हुए। उन्हें अमरावती केंद्र का निदेशक बनाकर भेजा गया। वहीं पर उनके ऊपर #SCSTAct का मामला दर्ज करा दिया गया। अब अनिल सौमित्र अदालत से बरी हो चुके हैं। इस समाचार को पढ़कर समझ आता है कि, यह कितना खतरनाक कानून है। हमने अमरावती से जम्मू केंद्र जाने के बाद तारीखों पर भागते और तनाव में जीते अनिल सौमित्र को देखा है। बहुत से लोग इस तरह के मानसिक उत्पीड़न को झेल भी नहीं पाते हैं। अच्छा है कि, इस झूठे मामले से उन्हें मुक्ति मिली, लेकिन इस तरह के झूठे मामले में कितने लोग झेल रहे हैं और ऐसे झूठे मामले चलाने वालों का क्या किया जाए? यह अत्यंत गंभीर विषय है। इस पर जमकर चर्चा होना चाहिए।
-हर्ष वर्द्धन त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) में प्रोफेसर और पूर्व रीजनल डायरेक्टर डॉ. अनिल कुमार सौमित्र पर SC/ ST ऐक्ट के तहत दर्ज़ एक आपराधिक केस को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने खारिज कर दिया।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला ऑफिस के कामकाज और अनुशासन से जुड़ा है, न कि जाति के नाम पर अपमान से।
जस्टिस प्रवीण एस पाटिल ने अपने आदेश में कहा कि यह कानून कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। ऑफिस के विवादों में इस्तेमाल के लिए नहीं। जस्टिस पाटिल ने कहा कि जबतक यह साफ न हो जाए कि किसी व्यक्ति को जानबूझकर उसकी जाति के कारण अपमानित किया गया है, तबतक इस कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
यह मामला IIMC के रीजनल कैंपस अमरावती से जुड़ा है। उस समय डॉ. सौमित्र इसके रीजनल डायरेक्टर थे। शिकायतकर्ता इसी कैंपस में कॉन्ट्रैक्चुअल असिस्टेंट प्रोफेसर थे। उनका आरोप था कि डॉ. सौमित्र ने उन्हें बार बार अपमानित और मानसिक रूप से परेशान किया, क्योंकि वे अनुसूचित जाति से हैं। इन आरोपों के आधार पर शिकायतकर्ता ने साल 2022 में SC/ST ऐक्ट की धाराओं के तहत थाने में मामला दर्ज कराया। पुलिस जांच-पड़ताल के बाद चार्जशीट दाखिल की।
डॉ. सौमित्र ने हाई कोर्ट में कहा कि शिकायतकर्ता कामकाज में लापरवाही कर रहा था। उसे कई बार सुधार के मौके दिए गए। कोई सुधार न दिखने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। डॉ. सौमित्र का कहना था कि शिकायतकर्ता से जो भी बातचीत हुई, वह पूरी तरह ऑफिस से जुड़ी थी। किसी भी स्तर पर जाति को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की गई।
हाई कोर्ट ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी कर्मचारी ने यह नहीं बताया कि शिकायतकर्ता को उसकी जाति के नाम पर अपमानित किया गया।
शुरुआती जांच में खुद शिकायतकर्ता ने माना था कि उसके साथ जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हुई है।
आईआईएमसी के पूर्व एकेडमिक कॉर्डिनेटर रघुविंदर चावला ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘सत्य की हमेशा जीत होती है, इसलिए सही कहा गया है सत्यमेव जयते। साथ ही उन्होंने लिखा कि हम सबको शुरू से ही लगता था कि सौमित्र जी को किसी साज़िश के तहत फंसाया गया है। आखिर सत्य की जीत हुई और झूठ की पराजय। इस कठिन समय में इतने संयम से काम लेने के लिए प्रो. सौमित्र बधाई के पात्र हैं।
कोर्ट के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर डॉ. सौमित्र के समर्थन में बड़ी संख्या में लोगों की प्रतिक्रिया आई।
कई छात्रों ने भी इसपर खुलकर अपना विचार रखा
IIMC के पूर्व छात्र रहे अंकित ने डॉ. सौमित्र के बारे में अपना अनुभव साझा करते हुए लिखा “यह केवल मेरा अनुभव नहीं था। आश्चर्य की बात यह थी कि उनका यह निश्चल भाव, ईमानदार प्रेम और समान व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के प्रति था। यदि मैं ईश्वर की सौगंध लेकर कहूं कि जो भावना उन्होंने मेरे लिए रखी, वही प्रत्येक व्यक्ति के लिए मैने अनुभव किया, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन 18 महीनों में मैंने उनके मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं देखा, बल्कि उन लोगों के प्रति भी नहीं, जो उनके लिए अशोभनीय या संकीर्ण सोच रखते थे।” हमे पहले से पता था यह आरोप उन्हें परेशान करने के लिए सुनियोजित तरीके से रचा गया षडयंत्र मात्र है।



