सुशील सुमन-
अनिल यादव की कहानियों की नयी किताब ‘अन्य कहानियाँ और अप्रेम’ जब मुझे मिली तो सबसे पहले इसी कहानी के साथ इस किताब को पढ़ने की शुरूआत हुई। हालांकि इस कहानी को मैं आज से बारह-तेरह बरस पहले पढ़ चुका था, जब यह ‘जलसा’ में छपी थी। कहानी के सघन और साहसिक कथानक और प्रभावशाली भाषा के कारण इसे पढ़ने की याद मेरे पाठक मन में गहरे बसी हुई थी, भले कहानी के सारे प्रमुख बिन्दु याद न रहे हों! आज जब इस कहानी को दुबारा पढ़ा तो सोचा कि अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया को भी यहाँ दर्ज कर दूँ, जिसे तब कहीं कह या लिख नहीं सका था।
‘अप्रेम’ इस अर्थ में एक अनूठी और साहसिक अभिव्यक्ति वाली कहानी है कि इसमें साधारण चलन के उलट एक ऐसे पुरुष कैडी (पात्र) की परेशानियों को व्यक्त किया गया है, जिसे प्रेम में एक स्त्री छाया के द्वारा धोखा मिलता है। छाया एक दिन अचानक रिश्ता तोड़ लेती है और अपने मंगेतर के पास वापस चली जाती है काफ़ी भदेस ढंग से यह कहते हुए कि तुम मुझसे केवल सेक्स करना चाहते हो!
कैडी इस बात को समझ नहीं पाता है कि आख़िर सेक्स की चाहत में ऐसी क्या समस्या है, जिसे इस तरह का मुद्दा बनाया जा सकता है! बाद में उसे यह समझ में आता है कि वह केवल सीढ़ी था, छाया के वापस मंगेतर तक जाने का। वह कैडी के साथ रहकर अपने उस अमीर मंगेतर के भीतर ईर्ष्या पैदा करना चाह रही थी, जो उससे मुँह फेर चुका था। जाते हुए छाया ने एक ऐसा आरोप कैडी पर मढ़ दिया, जिससे पूर्णतः असहमत होते हुए और उसे झूठ मानते हुए भी, कैडी छाया को जवाब नहीं दे सका! उसके इस आरोप को लगाने की भाषा और अंदाज़ पर न केवल हक्का-बक्का रह गया, बल्कि यहीं से उसके भीतर एक प्रकार के अवसाद में जाने की शुरूआत हो गयी।
जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया कि अधिकांश बेवफ़ाई की कहानियों या प्रसंगों में पुरुष की बेवफ़ाई पर बात की जाती है या उसे रिश्ता तोड़ने का जिम्मेदार ठहराया जाता है। एक स्त्री को कारक मानते हुए कम कहानियाँ लिखी जाती हैं। इसमें एक प्रकार के पॉलिटिकल करेक्टनेस का भी मामला रहता है, क्योंकि यह तो तथ्य है कि पावर स्ट्रक्चर में पुरुष के होने के कारण आमतौर पर प्रेम के मामलों में भी ज़्यादातर स्त्रियाँ ही शोषित होती हैं या ठगी जाती हैं। लेकिन यह कहानी इस मामले में भिन्न है कि यहाँ बहुत संजीदगी के साथ एक स्त्री के द्वारा की गयी बेवफाई पर बात की गयी है।
ज़ाहिर है कि इस क्रम में कहानी में पुरुष का पक्ष ही ज़्यादा दिखायी पड़ता है। ख़ासकर वह बिन्दु, जहाँ एक स्त्री प्रेम में इस बात को मुद्दा बनाती है कि तुम्हें बस सेक्स की पड़ी है, उस बिन्दु को यह कहानी बहस के केन्द्र में लाती है। इस कहानी का मुख्य पात्र कैडी एक दिन नशे में स्वगत यह सोचता और बात करता है कि वह छाया से यह बात क्यों नहीं कह सका कि “तुम्हारा प्यार कोमल, अबोध, सपनीला और घनघोर वासनामय सब एक साथ है। अपनी प्रेमिका के साथ सेक्स के लिए अधीर होने में ऐसा क्या अप्राकृतिक और अपमानजनक था जो तुम शर्म से ज़मीन में गड़ गए।
औरतें लाखों सालों से अपने प्रेमियों पर जो झूठा लांछन लगाती आई हैं कि वे उन्हें सिर्फ़ शरीर समझते हैं, उसका जवाब कितना सहज है लेकिन तुम सोच भी नहीं पाए। सिर्फ़ प्यार के ईथर से बनी कोई अशरीरी औरत कैसी होती होगी।” हालांकि इस कहानी का पात्र कैडी ये बातें छाया से कह नहीं सका था, जैसाकि आमतौर पर तमाम प्रेमी अपनी प्रेमिका के जब मन तब ऐसे आरोपों के लगाने के बाद ये बातें कह नहीं पाते, लेकिन अनिल यादव ने इस कहानी में ऐसे बेतुके किन्तु कभी भी वार खाली न जाने वाले बाण पर एक गंभीर बहस छेड़ने की कोशिश की है।
यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि ऐसे प्रेमियों या पतियों की बात इस कहानी में नहीं है जो अपनी प्रेयसी या पत्नी से आये दिन सेक्स के लिए जबरदस्ती करते हैं और उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं। ऐसे बहुसंख्यक मामलों को कहीं से भी कमतर करने का प्रयास यह कहानी नहीं करती। यह कहानी सिर्फ़ यह कोशिश करती है कि उन अल्पसंख्यक मामलों पर भी बात हो सके, जहाँ स्त्रियाँ प्रेम में सेक्स की स्वाभाविक इच्छा पर भी जब उनका जी चाहे ऐसे हमलावर होती हैं, मानो उनके प्रेमी ने इस चाहत का इजहार करके कोई पाप कर दिया हो!
आमतौर पर इस आरोप का इस्तेमाल एक फरेब के साथ प्रेमी को मोरली डाउन करने के लिए किया जाता है। बहुत बार उससे दूर होने के लिए झूटे बहाने के रूप में। किसी रिश्ते से दूर होने में कोई समस्या नहीं है, समस्या इस तरह के ग़लत और पाखंड से भरे आरोप में है।
प्रेम में धोखा खाने और ग़लत या कहें कि अतार्किक आरोप को सहने के बाद एक व्यक्ति के अवसादग्रस्त होते जाने की यह कहानी तो है ही, एक लेखक के बनने के संघर्ष की भी कहानी है। साथ ही एक बेहतरीन मैत्री की भी कहानी है। चूँकि अनिल जी ने अपने इंटरव्यूज में अपने कुछ व्यक्तिगत प्रसंगों ख़ासकर नौकरी छोड़ने और लेखक बनने की यात्रा से जुड़ी बातों को रख दिया है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि इस कहानी में लेखक के निजी जीवन के कुछ पहलू और शाश्वत जी से उनकी मैत्री की झलक भी दिखायी देती है।
इस कहानी पर और विस्तार से तथा ठहरकर बात करने की गुंजाईश है, शायद पूरा संग्रह पढ़ने के बाद अन्य कहानियों की चर्चा के साथ कहीं की जाएगी। लेकिन फिलहाल एक सवाल लेखक से किये बगैर रहा नहीं जा रहा कि उन्होंने पेंग्विन को कुछ जगहों पर एडिट करने और ‘…’ लगाने की इजाजत कैसे दी, जबकि जहाँ तक मुझे याद है कि ‘जलसा’ में कहानी बिना किसी तरह की सेंसरशिप के प्रकाशित हुई थी! और एक बात कि गौरी, छाया कैसे हो गयी!

बहरहाल…प्रिय दोस्त और लेखक अनिल यादव को इस दूसरे कहानी संग्रह के लिए बहुत बधाई! हम जैसे उनके शैदाई इसकी प्रतीक्षा लम्बे समय से कर रहे थे।



