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सुख-दुख

अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 3) : राजीव गांधी के कार्यक्रम में उस दिन मुन्ना भाई न होते तो दोनों एसपी और मुझे अच्छी डांट पड़ती!

बद्री प्रसाद सिंह-

१९८० के चुनाव के बाद अरुण कुमार सिंह सत्ता की चकाचौंध से दूर थे। २३ जून १९८० को जब संजय गांधी दिल्ली फ्लाइंग क्लब में सुभाष सक्सेना के साथ हवाई जहाज़ उड़ा रहे थे तभी उनका जहाज़ अनियंत्रित होकर होटल अशोक के पास गिर गया, उन्हें इलाज हेतु राम मनोहर लोहिया अस्पताल लाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी। वैसे तो संतान का असमय दिवंगत हो जाना प्रत्येक माँ को दारुण दुःख देता है परंतु संजय गांधी राजीव गांधी की अपेक्षा राजनैतिक संघर्ष में अपनी माँ इंदिरा गांधी के नज़दीक थे इसलिए उनका जाना इंदिरा जी को बहुत व्यथित कर गया।

मुन्ना भाई इंदिरा गांधी के संपर्क में बने हुए थे और वह इंदिरा जी के कृपापात्र भी थे। संजय गांधी के दिवंगत होने पर इंदिरा गांधी जी ने उन्हें उ.प्र. विधान परिषद का सदस्य बनवा कर श्रीपति मिश्र जी के मंत्रिमंडल में १९८३ में राज्यमंत्री शहरी विकास बनवाया तत्पश्चात राज्यमंत्री ग्राम विकास हुए। १९८४ में हुई इंदिरा गांधी जी की हत्या से पूरा देश स्तब्ध रह गया। तत्पश्चात राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री बने जो संजय गांधी जी की मृत्यु के बाद अमेठी लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। मुन्ना भाई के राजीव गांधी जी से भी आत्मीय संबंध थे।

राजीव गांधी जी जब अमेठी/सुल्तानपुर का दौरा करते थे तो वह एक दिन में कई स्थानों पर जनसभा करते थे। अमेठी की जनसभा की व्यवस्था पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ अपने जिले के पुलिस बल से कराते थे। पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ यह दायित्व मुझे सौंपते थे क्योंकि मैं उनका विश्वस्त डिप्टी एसपी था।

अमेठी के एक कार्यक्रम में मंच के पीछे खड़ा एक व्यक्ति अपने को पीएम स्टाफ़ बता कर न तो अपना परिचय पत्र और न मजिस्ट्रेट की अनुमति पत्र दिखा रहा था। मैंने उसे ए पलनिवेल, पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ व मनोज कुमार, पुलिस अधीक्षक (सादा वस्त्र) से परेशान कराया था। जब राजीव गांधी जी मंच पर पहुँच गये तो मुन्ना भैया मंच के पास मुझसे बात करने लगे। मैंने देखा कि राजीव गांधी जी के ख़ास मंत्री अरुण सिंह उक्त दोनों एसपी को डांट रहे हैं और पीएम स्टाफ़ वाला व्यक्ति वहाँ खड़ा है। मैंने तुरंत मुन्ना भाई को पूरी घटना बताकर दोनों एसपी को बचाने को कहा। मुन्ना भाई मुझे लेकर वहाँ पहुँचे।

मुझे देखकर वह व्यक्ति चीख कर बोला कि यही मुझे परेशान किया है। इतने में मुन्ना भाई ने उसे डाँटकर कहा कि मैं उनका छोटा भाई हूँ। अरुण सिंह जी के पूछने पर मैंने बताया कि यह व्यक्ति अपना परिचय पत्र दिखाए बग़ैर मंच के पास रहना चाहता था जो पीएम सुरक्षा के लिए खतरा है। मंत्री अरुण सिंह ने उसे ही डाँट दिया। वह व्यक्ति राजीव जी का अमेठी क्षेत्र का मीडिया प्रभारी था। मुन्ना भाई ने उन दोनों एसपी को तत्काल मीटिंग की व्यवस्था देखने को कह कर वहाँ से हटा दिया।

उस दिन यदि मुन्ना भाई न होते तो दोनों एसपी तथा मुझे अच्छी डांट पड़ती। राजीव गांधी जी के समय अमेठी लोकसभा क्षेत्र की प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी उ.प्र. का एक कैबिनेट मंत्री होता था। संजय सिंह अमेठी के, अरुण कुमार सिंह गौरीगंज के, वीर बहादुर सिंह तिलोई के, प्रवीण चंद्र शर्मा जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी मंत्री थे, सलोन क्षेत्र के मंत्री दल बहादुर जी थे। अन्य मंत्री गण का इस क्षेत्र में प्रवेश सामान्यतः वर्जित था। राजीव जी को अपने क्षेत्र में मंत्रियों की भीड़ पसंद नहीं थी।

१९८५ में अमेठी के चुनाव चल रहे थे और मैं प्रतापगढ़ में सीओ था। एक रात लगभग १० बजे मुन्ना भाई पूर्व मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र व केंद्रीय मंत्री अरुण नेहरु को लेकर मेरे आवास पर आ गए और पत्नी से तत्काल खाने हेतु कुछ मांगा। रात का खाना समाप्त था और सरकारी कुक घर जा चुका था। पत्नी तत्काल पूड़ी, पराठा व सब्जी बनाने की बात की तो वह बोले कि समय नहीं है तत्काल कुछ खिला दो। घर में बच्चों के लिए डबल ब्रेड व मुर्गी के एक दर्जन अंडे रखे थे। भाई ने ब्रेड मक्खन व उबले अंडे देने को कहा। मैंने पत्नी के साथ ब्रेड बटर व अंडे तैयार किए और स्वयं परोस कर उन्हें खिलाया। मिश्र जी तो ब्रेड बटर लिए लेकिन अरुण नेहरु जी ने १० उबले अंडे व ब्रेड खाये, अरुण नेहरु विशालकाय थे भी। तत्पश्चात सभी अमेठी क्षेत्र के लिए निकल लिए।

१९८५ में अरुण कुमार सिंह कैबिनेट मंत्री बनकर सहकारिता विभाग सभांला और १९८८ में पशुधन मंत्री बने। १९८८ में विश्वनाथ प्रताप सिंह के इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह जी ने उन्हें माँड़ा विधानसभा का प्रभारी बनाया था। उस चुनाव के लिए गृहमंत्री गोपीनाथ दीक्षित चुनाव प्रभारी बनाए गए थे। दीक्षित जी आते ही क्षत्रिय, यादव, अनुसूचित जाति के ५ थानाध्यक्ष तथा ४ क्षेत्राधिकारियों का ग़ैर जिला स्थानांतरित कर उनके स्थान पर ब्राह्मण थानाध्यक्ष व क्षेत्राधिकारी ग़ैर जिले से लाए।

एक दिन एसएसपी डी पी सिन्हा ने मुझे बुलाकर कहा कि ३ दिन बाद आचार संहिता लगने वाली है और उन्हें सूचना मिली है कि आचार संहिता लगने से पूर्व मेरा ग़ैर जनपद स्थानांतरण हो जाएगा। मैं तत्काल मुन्ना भैया से बात कर लूँ जिससे मेरा स्थानांतरण न हो सके। मैं उनका विश्वस्त सीओ था। मैंने शाम को ही भाई को पूरी बात बता दी। उन्होंने कहा कि रात में कैबिनेट की मीटिंग है, वह मुख्यमंत्री से बात कर लेंगे, मैं निश्चिंत रहूँ।

रात १० बजे भाई ने फोन पर बताया कि कैबिनेट मीटिंग में उन्होंने अन्य जातियों के अधिकारियों का ग़ैर जिला ट्रांसफर व उनके स्थान पर अन्य जिलों से ब्राह्मण अधिकारियों को लाये जाने तथा मेरे होने वाले स्थानांतरण की बात बताकर हंगामा खड़ा कर दिया जिसका समर्थन अधिकांश मंत्रियों ने किया और दीक्षित जी अकेले पड़ गए। मुख्यमंत्री जी ने दीक्षित जी को स्थानांतरण में जातिवाद करने के लिए भर्त्सना करते हुए इलाहाबाद में किसी पुलिसकर्मी के स्थानांतरण पर तत्कालीन रोक लगा दी। मेरे कारण अन्य पुलिस अधिकारी भी बच गये। ने इस तथ्य से एसएसपी को अवगत करा कर उन्हें आश्वस्त कर दिया। उस समय मैं इलाहाबाद में सीओ कोतवाली नगर था।

वर्ष १९८९ के विधानसभा चुनाव में मुन्ना भाई रारी क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़े और सफल रहे। इस चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस की पराजय हुई और मुलायम सिंह यादव जी के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। १९८९ के बाद उत्तर प्रदेश में सपा, भाजपा, बसपा की सरकारें बनती रही लेकिन कांग्रेस पार्टी फिर कभी भी सत्ता का स्वाद नहीं चख पाई। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व ने नैराश्य में अकेले चुनाव न लड़कर कभी सपा, कभी बसपा के साथ चुनाव लड़ने से कांग्रेस के नेता तथा कार्यकर्ता अन्य पार्टियों का दामन थामने लगे और कांग्रेस का जनाधार खिसकता चला गया।

लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।

पिछला भाग…

अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 2) : डिप्टी एसपी चयनित होने के बाद मैंने मुन्ना भाई से इंदिरा गांधी से मिलाने को कहा, पहले तो वह डांटे फिर फिएट में बिठाकर 1 सफदरजंग मार्ग ले गए!

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