आशीष मिश्रा-
दोस्तों, ईश्वर की असीम अनुकम्पा और आप सबकी दुआओं से कल देर रात मेरा आइफोन पुलिस ने बरामद कर लिया। फोन छीनने वाले दोनों बदमाश गिरफ्तार कर लिए गए। मेरे जीवन में दो बार ऐसे मौके आए जब मेरा कोई सामान चोरी हुआ है। दोनों बार सामान बरामद हुआ।
20 साल पहले पत्रकारिता की पहली सैलरी से टीवीएस विक्टर मोटरसाइकिल खरीदी थी। एक साल बाद मेरी लापरवाही से उसका इंश्योरेंस नहीं हो पाया था और दिसंबर, 2005 को वह घर के नीचे से चोरी चली गई। ठीक एक साल दिसंबर, 2006 को वह ठीक वैसी ही हालत में बरामद हुई जैसे वह एक साल पहले थी।
इस बार आइफोन की बारी थी। 28 फरवरी की रात 9 बजकर 36 मिनट पर दो बदमाश लखनऊ में गुलाब टाकीज के सामने से मेरा आइफोन छीनकर भाग गए। मैंने दौड़कर उनका पीछा करने की कोशिश की। थोड़ी दूर दौड़ा भी कि इसी बीच मोटरसाइकिल सवार एक मित्र (उनका नाम नहीं याद आ रहा है, संभवत: जीन्यूज में काम करते हैं) मिल गए। उनकी मोटरसाइकिल से बलरामपुर अस्पताल की गेट तक आया लेकिन तबतक बदमाश फुर्र हो चुके थे।
मेरे दोनों चालू नंबर उसी आइफोन में थे। मैं बदहवास घर आया। यहां दूसरे नंबर से एक-एक करके अधिकारियों को फोन किया। इसी कवायद में राहुल श्रीवास्तव जी का फोन उठा। मैंने उन्हें घटना की जानकारी दी।
इसके कुछ ही देर बार पुलिस चौकी हाता इंचार्ज शैलेंद्र गुप्ता और एसीपी वेस्ट विश्वजीत श्रीवास्तव का फोन आया। मैं घर के सामने रहने वाले छोटे भाई समान लवकुश पांडेय को लेकर वजीरगंज थाने पहुंचा। एफआइआर दर्ज कराई।
रात में ही शैलेंद्र गुप्ता और हम लोगों ने आसपास घरों में लगे सीसीटीवी कैमरे देखे जिसमें बदमाश दिखे। रात होने और तेज भागने के कारण उनकी बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही थी। बहुत देर रात तक तफ्तीश चलने के बाद मैं घर आ गया।
अगले दिन सुबह सात बजे डीजीपी पुलिए प्रशांत कुमार, लखनऊ पुलिस कमिश्नर अमरेंद्र कुमार सेंगर, प्रमुख सचिव गृह संजय प्रसाद और निदेशक सूचना शिशिर जी का फोन आया। सुबह से क्राइम ब्रांच की कई टीमों ने अलग-अलग खोजबीन शुरू की। एक टीम के साथ मैं भी था।
सीसीटीवी खंगाले जा रहे थे। सबमें बदमाश तो दिख रहे थे लेकिन काफी तेज गति से जाने के कारण उनका चेहरा और एक्टिवा का नंबर स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। देर रात तक यह घटना से जुड़े एक-एक पहलुओं की गहनता से पड़ताल की। करीब 48 घंटे तक सर्विलांस और जमीन पर क्राइम बांच के पुलिस कर्मियों के अथक प्रयास ने 3 मार्च की शाम को मेरा मोबाइल फोन बरामद कर लिया।
मेरे लिए यह समय बहुत कठिन था। लेकिन शुभचिंतक मेरे साथ चट्टान की तरह खड़े थे। जिससे जो हो सकता था वह कर रहा था। घर पर मेरी छोटी बहन बहुत परेशान थी। वह तो मेरे लिए नया फोन भी ले आई ताकि मैं घटना के सदमे से उबर सकूं। मुझे संबल देने वाले सभी लोगों और खासकर उन पुलिस कर्मियों का मैं आभार नहीं प्रकट करना चाहता। मैं जीवन भर आपका ऋणी रहना चाहता हूं।
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