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आज के कई अखबारों ने हिन्दू होने का धर्म निभाया है, नहीं बताते कि वक्फ कानून से सुप्रीम कोर्ट नाराज है

संजय कुमार सिंह

आप जानते हैं कि देश में चुनावों से पहले हिन्दू-मसलमान को हवा देने के मकसद से संसद में पास करवाकर जल्दबाजी में लागू किये गये वक्फ संशोधन विधेयक पर सुप्रीम कोर्ट में कल चर्चा हुई। खबरों के अनुसार चर्चा आज भी जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई आदेश नहीं दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि केंद्र सरकार ने इस मामले में न सिर्फ कैविएट दाखिल किया है बल्कि भाजपा शासित छह राज्य वक्फ कानून के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। दूसरी ओर, वक्फ कानून का विरोध करने वाले सांसदों को भी (व्हाट्सऐप्प / सोशल मीडिया प्रचार में) हिन्दू विरोधी कहा जा चुका है। दूसरी ओर, इसके खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। प्रचारित यह किया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल सरकार करवा रही है और यह भी कि इस हिन्दू विरोधी हिन्सा का (किन) हिन्दुओं ने विरोध नहीं किया है। कुल मिलाकर सरकार ने इस मामले को हिन्दू मुसलमान में बांटने का पूरा इंतजाम किया है और उसके समर्थक-प्रचारक इस काम में भक्तिभाव से लगे हुए हैं। आज के अखबारों की खबर से यह बात स्पष्ट है और शर्मनाक है कि एक धर्म निरपेक्ष देश में इस तरह खुलेआम हिन्दू मुसलमान हो रहा है। यह बात आज की खबरों से भी साबित होती है आइये देखें। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून के तीन मुद्दे उठाये : सामान्यतया हम स्टे नहीं करते… यह एक अपवाद है”। उपशीर्षक में तीन मुद्दे हैं – 1) वक्फ बाई यूजर (उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ), वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम, कलेक्टर के अधिकार की समीक्षा होगी इसके साथ की एक और खबर का शीर्षक है, मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को कुछ जवाबों के लिए मजबूर किया, याचिकाकर्ताओं के लिए कुछ लाइनें हासिल कीं। कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम ये तीन आपत्तिजनक मुद्दे तो छांटे ही हैं और मुद्दा यह है कि ऐसा कानून क्यों नहीं रद्द होना चाहिये या बनाया ही क्यों गया है। सत्तारूढ़ पार्टी यह सब करे तो मुद्दा यही होगा और अभी भी है। दूसरी ओर, अमर उजाला का शीर्षक है, वक्फ संशोधन कानून में सुप्रीम कोर्ट ने रखा बदलाव का प्रस्ताव, केंद्र का विरोध। पहली नजर में मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसे काम नहीं होता है। वहां सौदेबाजी नहीं होती है विरोध होता नहीं है और होता भी होगा तो सुना भी नहीं जाता है, सीधे आदेश दिया जाता है। यह सब मैं खबरों से ही जानता हूं। सुप्रीम कोर्ट के मामले में मैं यही जानता हूं कि उसकी रिपोर्टिंग करने के लिए निर्धारित योग्यता जरूरी है और यह राजनीति नहीं है कि कोई भी कर ले। या कुछ भी बोल दे।

उपशीर्षक में अमर उजाला ने लिखा है, कानून पर तत्काल रोक से शीर्ष कोर्ट का इनकार, मगर इन प्रावधानों पर आपत्ति….। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक कह रहा है, सामान्यतया हम स्टे नहीं करते… यह एक अपवाद है। इससे तो लगता है कि वह इस मामले को अपवाद मानकर स्टे करने के लिए तैयार है और अगर ऐसा हुआ तो सरकार की भरपूर किरकिरी होने वाली है (भले सोशल मीडिया के प्रचारक और ट्रोल संभाल लें)। पर उसने इनकार किया ऐसा भी नहीं है और अमर उजाला ने ही लिखा है, केंद्र का विरोध। इससे यही लगता है कि जो तीन मुद्दे उठाये गये हैं उसे ठीक नहीं किया गया तो स्टे कर दिया जायेगा। खबर यही है कि केंद्र सरकार की ओर से सोलिसीटर जनरल ने उन्हें भी सुनने की मांग की इसलिए आदेश जारी नहीं हुआ और उन्हें आज सुना जायेगा। अदालत की भाषा में यह विरोध नहीं अपील या निवेदन है। लेकिन हिन्दी अखबार मौके पर हिन्दू हो जाते हैं यह पुराना रोना है।  नवोदय टाइम्स का उपशीर्षक है, वक्फ की घोषित संपत्तियों को डी नोटिफाई करने पर रोक का प्रस्ताव। हालांकि, इसका मुख्य शीर्षक है, वक्फ कानून के विरोध में हिंसा गलत। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि पश्चिम बंगाल की हिंसा को अखबारों ने बढ़ा-चढ़ा कर रिपोर्ट किया है और ऐसा ही डॉक्टर की हत्या के समय (तथा दूसरे मामलों में भी) किया गया था और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल के समय में अगर किसी मामले में स्वतः संज्ञान लिया है तो वह पश्चिम बंगाल का ही मामला था और हत्या की सीबीआई जांच में कुछ नया नहीं निकला और नतीजा वही रहा जो स्थानीय पुलिस ने घटना के कुछ समय बाद कहा था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा को गलत कहा है तो वह सही ही है पर इतनी बड़ी खबर नहीं है कि लीड बन जाये। सबको पता है और पहले से है।

नवोदय टाइम्स ने सरकार से दो सुप्रीम सवाल शीर्षक से दो सवाल छापे हैं जो इस प्रकार हैं – 1) केंद्र से पूछा : क्या मुस्लिम लोग हिंदू ट्रस्ट का हिस्सा होंगे। इसके तहत कहा गया है, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने वक्फ बोर्ड में हिंदुओं के प्रवेश पर सवाल उठाए तो चीफ जस्टिस ने तुषार मेहता से पूछा कि क्या हिंदू संस्थाओं में मुस्लिमों को प्रवेश मिल सकता है। मिस्टर मेहता, क्या आप कह सकते हैं कि अब से हिंदू संस्थाओं में मुस्लिमों को भी एंट्री मिल जाएगी। वे उसका हिस्सा हो सकते हैं। इसका जवाब आप साफ-साफ दें। इससे पहले कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि वक्फ बोर्ड में अब 22 में से 10 ही मुस्लिम सदस्य होंगे। यह अनुच्छेद 26 के तहत मिली स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है। दूसरा सवाल है – कलेक्टर को पावर देने पर सवाल : अदालत क्यों नहीं दे सकती फैसला। इसके तहत कहा गया है, चीफ जस्टिस ने वक्फ संपत्ति विवादों में कलेक्टर को निर्णय की पावर देने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा आखिर वक्फ संपत्तियों पर फैसला अदालत क्यों नहीं दे सकती। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ संपत्ति के रजिस्ट्रेशन की पावर कलेक्टर को मिली है। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कपिल सिब्बल का कहना है कि नया कानून मुतवल्ली को जेल में डालने वाला है। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि ऐसा तभी होगा, जब वक्फ संपत्ति का रजिस्ट्रेशन न हुआ हो। खबर में लिखा नहीं है पर जाहिर है कि रजिस्ट्रेशन की शर्त क्यों और सिर्फ मस्जिदों या मुस्लिम संपत्ति के लिए क्यों? जाहिर है कानून (या उसके सभी प्रावधान) धर्म निरपेक्ष नहीं हैं। इसके बाद संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर आदेश दिया जा सकता था। पर खबर है कि सरकार की ओर से जवाब देने के लिए समय मांग लिया गया। इसे सरकार का विरोध नहीं कहा जा सकता है। जो भी हो, आज पता चलेगा (नहीं भी चल सकता है) कि जवाब क्या आया। लेकिन रिपोर्टिंग या प्रस्तुति निष्पक्ष नहीं है। नवोदय टाइम्स ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष और सरकार का पक्ष भी छापा है। यह केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों के आधार पर है। इसके अनुसार मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग वक्फ अधिनियम के तहत शासित नहीं होना चाहता। अदालत उस कानून पर सुनवाई कर रही है, जिसे विचार-विमर्श के बाद लाया गया है। इस कानून को बनाने के लिए जेपीसी का गठन किया गया था। 1923 से ही वक्फ का पंजीकरण वैधानिक रूप से अनिवार्य है। उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ को भी बिना पंजीकरण के मान्यता नहीं दी जा सकती। ऐसे कई फैसले हैं, जो कहते हैं सरकार ट्रस्टी के रूप में ऐसी संपत्तियों को विनियमित कर सकती है। कोई संपत्ति सरकारी है तो कलेक्टर इसका निर्धारण करेगा यह प्रावधान इसलिए लाया गया ताकि कोई विवाद न हो। कहने की जरूरत नहीं है कि इन दलीलों में दम नहीं है और सरकार की नीयत साफ दिख रही है। अखबार नहीं बताना चाहते हैं वह अलग बात है।

मेरे आठ में से दो हिन्दी अखबारों की रिपोर्टिंग आपने देख ली। इंडियन एक्सप्रेस की भी बात हो गई। आइये अब अंग्रेजी अखबारों की बात करें। दि एशियन एज में पहले पन्ने पर फोटो के साथ एक खबर है – “ममता ने कहा, भाजपा ने बंगाल में वक्फ दंगे की योजना पहले बना ली थी”। उपशीर्षक है, मोदी से शाह को नियंत्रित करने की अपील की। द टेलीग्राफ में आधे पन्ने का विज्ञापन है। यह खबर वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट की खबर के साथ सिंगल कॉलम में है। इसका शीर्षक है, मुख्यमंत्री ने अमित शाह की खबर ली, मोदी को बख्श दिया। दि एशियन एज की खबर के साथ छपी फोटो का कैप्शन है, बुधवार को कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वक्फ (संशोधन) अधिनियम के बारे में मुस्लिम समाज के नेताओं के साथ एक बैठक में अपनी बात रखते हुए। इस खबर से आप समझ सकते हैं कि ममता बनर्जी वक्फ कानून और उसके बाद के बंगाल दंगे को राज्य और सरकार पर भाजपा के हमले के रूप में ले रही हैं और मीडिया इसकी खबर नहीं दे रहा है और प्रचारक चुन-चुन कर हिन्दू विरोधी हिन्दुओं की पहचान करने का काम कर रहे हैं। अखबार ने मुर्शिदाबाद के जांगीपुर में नई हिंसा की खबर दी है और बताया है कि टीएमसी नेता के भाई की दुकान में आग लगा दी गई। वक्फ कानून पर द टेलीग्राफ की खबर का फ्लैग शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून में बदलावों पर स्टे का संकेत दिया और परेशान करने वाले सवाल पूछे। मुख्य शीर्षक है, हिन्दू बोर्ड में मुसलमानों को जगह दीजिये? दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा, वक्फ की संपत्ति को डीनोटिफाई मत कीजिये; अंतरिम आदेश की संभावना”।

      

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट सरकार से : क्या आप हिन्दू ट्रस्ट में मुसलमान को रहने देंगे?” इंट्रो है, इतिहास का पुनर्लेखन नहीं हो सकता है और न वक्फ की पुरानी संपत्तियों पर नये सिरे से चर्चा हो सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीन प्रमुख कोट एक साथ छापा है। पहले मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ का है दूसरा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का और तीसरा नेशनल कमीशन फॉर वीमेन (एनसीडब्ल्यू) यानी राष्ट्रीय महिला आयोग का। इनमें मुख्य न्यायाधीश का कोट अगर हिन्सा के लिए उनकी चिन्ता जताता है तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। आम तौर पर महिलाओं के तमाम मामले में चुप रहने वाला महिला आयोग इस मामले में बोल रहा है। यह भी दिलचस्प है। आयोग ने कहा है, मुर्शिदाबाद में महिलाओं को उनके घरों से निकाल दिया गया है, वे डर और अनिश्चितता में जी रही हैं, अकल्पनीय आघात और नुकसान का सामना कर रही हैं। मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा है, एक बात बहुत परेशान करने वाली है – हिंसा जो हो रही है (वक्फ विरोध पर)। एक बार जब मामला अदालत के समक्ष निर्णय के लिए आ जाता है, तो माहौल को खराब करने वाले काम नहीं किये जाने चाहिए। आज के अखबारों से साफ है कि कुछ तो ऐसा कर ही रहे हैं और यह सत्तारूढ़ पार्टी के उकसावे पर न हो तो समर्थन  में है ही। ममता बनर्जी ने मुस्लिम संगठनों से कहा है, मैं बंगाल को उबलने नहीं दूंगी। पूरे राज्य में सबों से संपर्क करूंगी। हम आपके साथ हैं। अगर भाजपा भड़का रही है, तो उन्हें अदालत में चुनौती दें।

इस मामले में भाजपा और तृणमूल पर आरोप प्रत्यारोप चल रहा है तो आज हिन्दुस्तान टाइम्स ने एक खबर छापी है, पार्टियां जब एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं तब सुप्रीम कोर्ट ने चिन्ता जताई। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में अगर दोनों ही दल राजनीति कर रहे हैं तो यह स्पष्ट है कि तृणमूल को भाजपा के जवाब में करना पड़ रहा है और भाजपा अगर केंद्र में सत्ता में रहते हुए कर रही है और अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है तो मामला न सिर्फ अनैतिक है, शर्मनाक भी है लेकिन खबर ऐसी नहीं है। और वह भी बहुत कम है। हिन्दस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून के प्रमुख प्रावधानों में बदलाव की चर्चा की। और कानून के तीन प्रावधानों को रेखांकित किया। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार ने चुनाव के समय सोच समझकर बनाये गये कानून में ये मुद्दे छोड़े हैं और ये लागू रहें तो और नहीं रहें तो भी, चुनाव से पहले हिन्दू-मुसलमान करना और विरोधी नेताओं तथा दलों को हिन्दू विरोधी साबित करने का काम हो रहा है और भाजपा की राजनीति चल रही है जिसका असर भविष्य के चुनावों में हो सकता है और मेरा मानना है कि ईवीएम तथा मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों के बीच ऐसा हो या नहीं, पता ही नहीं चलेगा और यह चुनाव जीतने की भाजपा की अनैतिक कोशिश का भाग  रहेगा और भले सुप्रीम कोर्ट इस कानून को रद्द कर दे, भाजपा के लिए मुद्दा बना रहेगा। आज की एक बड़ी खबर यह भी है कि कर्नाटक के राज्यपाल ने मुस्लिम कोटा बिल को राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा है। तमिलनाडु के राज्यपाल की कार्रवाई पर हाल का विवाद और सुप्रीम कोर्ट का आदेश आपको याद होगा। उसके बाद यह खबर भी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में आदेश देने से पहले राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट की सलाह लें। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण का कर्नाटक का मुद्दा केंद्र में भाजपा के शासन के समय दिलचस्प हो सकता है और बड़ी खबर है। जब सरकार देश भर में योजनाबद्ध ढंग से हिन्दू मुसलमान करवाती नजर आ रही है तो यह मामला क्या रूप लेगा कहा नहीं जा सकता है। राज्यपाल इसे सहमति देते या नहीं देते यह राज्य का मुद्दा रहता पर अब राष्ट्रीय हो सकता है।

हिन्दू की लीड का शीर्षक बहुत स्पष्ट है। हालांकि यह भी सुप्रीम कोर्ट के बयानों, तर्कों और टिप्पणियों से ही है। इसके अनुसार – “सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, वक्फ बाई यूजर (कानून का) डीनोटिफिकेशन ‘भारी समस्या’ होगी”। इससे समझा जा सकता है कि केंद्र सरकार क्यों परेशान है, क्यों कैविएट लगवाई गई है और क्यों समर्थक राज्य सरकारों से अपील करवाई गई है। ज्यादातर अखबारों ने इसे कायदे से रिपोर्ट नहीं किया है और इस तरह केंद्र सरकार, भाजपा या संघ परिवार की राजनीति चल रही है। देखना है फैसला क्या आता है लेकिन अखबारों और व्यवस्था ने तो अपना रंग दिखा ही दिया है। कृष्णदास राजगोपाल की बाईलाइन के साथ द हिन्दू की खबर इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के प्रावधानों पर सवाल उठाए, जिसमें संपत्ति की “स्थापित” वक्फ-बाई यूजर (उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ) श्रेणी को मान्यता नहीं दी गई है, गैर-मुस्लिमों को वक्फ प्रशासनिक निकायों में शामिल होने की अनुमति दी गई और राज्य को यह निर्धारित करने की शक्ति दी गई कि कोई संपत्ति वक्फ की है या सरकार की (अदालत की जरूरत ही नहीं रही)। इसपर आज सरकारी वकील को जवाब देना है और उनके जवाब के बाद फैसले का इंतजार है जो अब बहुत स्पष्ट है लेकिन क्या आयेगा पता नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के खड़े किये इस विवाद के कारण आज एक ही खबर की चर्चा में मैं अपनी शब्द सीमा पार कर गया और दूसरी खबरों की चर्चा नहीं हो पाई जबकि सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीति की चर्चा होनी ही चाहिये और उसमें तमिलनाडु में एआईडीएमएमके से भाजपा का गठजोड़ और दो दिन बाद शादी से पहले तलाक जैसी खबर की चर्चा नहीं हो पाई। दूसरा बड़ा मामला फर्जी डॉक्टर के मामले में अस्पताल का लाइसेंस रद्द किये जाने की बड़ी खबर है। अमेरिकी टैरिफ और उसका मामला रह ही गया। भारत की लाचारी उसमें देखने, समझने और जानने लायक है। हेराल्ड मामले में सरकार की कार्रवाई और कांग्रेस का पक्ष अपनी जगह है ही। उसकी भी चर्चा न अखबारों में है और ना मैं कर पाया। आज ‘किताबी राजनीति’ का एक मामला भी है। इसके जरिये फारूक अब्दुल्ला पर आरोप लगाया गया है। उसकी खबर खूब छप रही है लेकिन पूर्व सेना प्रमुखों की दो किताबें रोक दी गई हैं उसकी चर्चा नहीं है। और किताब रोकने के आधार-कारण की कोई चर्चा नहीं है। इमरजेंसी में सेंसर अखबारों पर ही था अभी तो किताबों पर भी है लेकिन कोई खबर-कोई विवरण गोदी वालों ने दिया? आज नासिक में एक दरगाह को तोड़ने में 21 पुलिस वालों के घायल होने की भी खबर है। इससे पहले नागपुर की हिंसा भी बंगाल की हिंसा से ज्यादा ही थी। पर उसकी खबरें और उसे लेकर चिन्ता बंगाल से कम रही। उर्दू को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी पढ़ने-बताने और जानने लायक खबर है। इन दिनों जब दहेज कानून और पुरुषों को इसके तहत प्रताड़ित किये जाने की खबर है तब आज एक मृत पूर्व फौजी के 16 साल बाद वापस आने की खबर भी टाइम्स ऑफ इंडिया में है। इस बीच फौजी की विधवा को पेंशन मिलती रही और फौजी दहेज से संबंधित आरोपों के कारण फरार रहा। हिन्दुओं का भला करने सत्ता में आई सरकार तीन तलाक पर कानून बनाती रही। हिन्दुस्तान टाइम्स में जांच एजेंसी के हवाले से हेरल्ड मामले में एक आरोप है जो बताता है कि तमाम मामलों में जांच एजेंसियों के हवाले से तमाम लोगों को बदनाम करने के बाद अब यह हेरल्ड मामले में आजामाया जा रहा है। हाल में आपने खबर पढ़ी होगी कि यात्रियों से भरे विमान को लैंड कराने के बाद युवा पायलट की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर है कि मेडिकल इमरजेंसी प्रोटोकोल की समीक्षा होगी। लेकिन किसी  को यह चिन्ता नहीं है कि युवाओं की हार्ट अटैक से मौत के मामले बढ़ क्यों गये हैं या बढ़े भी हैं कि नहीं?

यही नहीं, सेबी ने दो भाइयों अनमोल और पुनीत सिंह जग्गी पर प्रतिबंध लगाया है और इसके खिलाफ ब्लूस्मार्ट टैक्सी कल हड़ताल पर रही। टाइम्स ऑफ इंडिया ने प्रतिबंध और हड़ताल की खबर छापी है जबकि इंडियन एक्सप्रेस ने सेबी के आरोपों के आधार पर खबर छापी है। 2014 से पहले इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर सरकारी एजेंसियां कार्रवाई करती थीं अब सरकारी कार्रवाई को इंडियन एक्सप्रेस सही बताने के लिए खबर छाप रहा है। मैं नहीं कहता कि खबर गलत है या आरोप गलत है। मैं यह कहना चाहता हूं कि ऐसा हो रहा था तो इंडियन एक्सप्रेस को खबर क्यों नहीं मिली और सेबी को कैसे मिल गई जिससे खबर छिपाई जानी थी। जर्नलिज्म ऑफ करेज ठीक तो चल रहा है? अनमोल, ब्लूस्मार्ट (टैक्सी सेवा) के सह संस्थापक हैं। पहले सेबी का यह प्रतिबंध बहुत कम लगता था। अब आम है लेकिन सेबी प्रमुख के खिलाफ आरोपों का क्या हुआ कोई नहीं जानता, उनने सरकारी सेठ को बचा ही लिया या सरकारी सेठ के मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है कोई पूछने वाला नहीं है। आज मौका था तो सब हेडलाइन मैनेजमेंट में ही उलझे रह गये। और ऐसे में अमर उजाला का आज का बॉटम है, विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 25% घटी। इससे लगता है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था अचानक बहुत अच्छी और सस्ती हो गई है। पर ऐसा कुछ है तो नहीं ही। संख्या घटने का कारण दूसरे देशों से भारत  के संबंध ही रहे होंगे। अखबार ने गिरावट की कई वजहों को भी हाईलाइट किया है। 

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