नदीम अख्तर-
पत्रकारिता का सबक। गिरोह बनाकर संपादकी करने वाले लोगों ने समी भाई जैसे होनहार पत्रकारों को निगला है। ये याद रखा जाना चाहिए कि पत्रकार की निष्ठा अपने संपादक के प्रति नहीं, अपने पेशे के प्रति होनी चाहिए। पर भारत की पत्रकारिता में संपादक और उसका गिरोह ही चलता है। जहां संपादक जाएगा, पूरा गिरोह लेकर जाएगा।
समी अहमद-
यह तस्वीरें पत्रकारिता की पढ़ाई करने वालों के लिए बेहद अहम हैं। संक्षेप में जानकारी यह है:
- 28 मई को भास्कर ने एक खबर छापी जिसका मोटे तौर पर मतलब यह था कि ऑपरेशन सिंदूर को भुनाने के लिए भाजपा घर-घर सिंदूर लेकर जाएगी।
- भास्कर ने 31 मई को दूसरी खबर छापी कि ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं। अपनी खबर के लिए खेद जताया और यह भी लिखा कि भाजपा का वक्तव्य नहीं लेना इसकी चूक थी।
- इससे पहले 30 मई को बीजेपी आईटी सेल के अमित मालवीय ने इसे फेक न्यूज़ बताया।
- इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने घर-घर सिंदूर बांटने के कार्यक्रम पर तीखे सवाल किए।
याद रखने की बात: इस कार्यक्रम पर ममता ने ही नहीं कई राजनीतिक-सामाजिक लोगों ने सवाल उठाए।
ध्यान देने की बात: 28 मई को खबर छपी। भास्कर के अलावा दूसरी जगहों पर भी यह खबर चली। उस दिन बीजेपी ने इसे फेक न्यूज़ नहीं बताया। 29 मई को भी बीजेपी ने इसे फेक न्यूज़ नहीं बताया। 30 मई को दोपहर बाद खंडन आया, फेक न्यूज़ का दावा किया गया। यह इस कार्यक्रम के भारी विरोध का तीसरा दिन था।
सीखने की बात: ऐसा नहीं है कि भास्कर या दूसरे अखबारों में अपुष्ट खबरें नहीं आतीं। ऐसा भी नहीं है कि भास्कर ने इससे पहले अपुष्ट खबरें न छापी हों। भास्कर की यह ख़बर रिपोर्टर के नाम से छ्पी। बड़े-बड़े विद्वान संपादकों की सहमति के बाद छ्पी। यह खबर हर संस्करण में छ्पी। ज़ाहिर है इस खबर का संकेत बीजेपी से ही मिला होगा। तो सीखने की बात यह है कि संकेत चाहे जितने मज़बूत हों, अपने बचाव के लिए संबंधित पक्ष का बयान लेने की कोशिश करें। न मिले तो यह बात लिख दें। लेकिन एक्सक्लूसिव के लालच में या यह सोचकर कि छाप दो-देखा जाएगा, ऐसी खबरें भी छ्प जाती हैं।
अखबार/मीडिया में आखिरी फ़ैसला मालिक का होता है। उसके बाद संपादक का। मालिक दबाव में आकर अपनी ही खबर को गलत बताए तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए, अपवाद को छोड़कर। रक्षा में हत्या की कहावत तो आपने सुनी ही होगी।
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