
राजाराम त्रिपाठी-
अभी हाल ही में प्रदेश के “छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन” पत्रकारों के संगठन के “वार्षिक अधिवेशन तथा सम्मान समारोह” में अध्यक्षता का जिम्मा मिला। इस कार्यक्रम की कुछ विशेष बातों ने मेरा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया।
पहली बात तो यह की प्रदेश में जनता की सुरक्षा तथा अमन चैन कायम रखने में अहर्निश जुटी पुलिस के अधिकारियों का मंच पर सम्मान किया गया। यह एक बहुत अच्छी पहल है। पुलिस की आलोचनाएं तो बहुत होती है पर उनके अच्छे कार्यों पर उनकी पीठ भी अवश्य थपथपाई जानी चाहिए। अगर समाज को अच्छी पुलिसिंग चाहिए तो समाज को भी अपने पूर्वाग्रह बदलने होंगे। पुलिस और पब्लिक के बीच अभी भी बड़ी दूरी है यह खाई पाटे बिना बात नहीं बनेगी। इसके लिए पुलिस और पब्लिक दोनों को भी बहुत कुछ करना है पत्रकार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
दूसरी बात थी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर बलदेव भाई शर्मा (वाइस चांसलर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय) को पत्रकारिता की मानडंडों पर बेलाग बोलते हुए सुनना। तीसरी महत्वपूर्ण बात थी भाई डॉ सुधीर शर्मा का वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर निष्पक्ष व तथ्यपरक वक्तव्य। चौथी महत्वपूर्ण बात थी गोल्ड मेडलिस्ट कवियित्री शुचि भवि के मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत कविता संग्रह ‘बाहों में आकाश’ का विमोचन। पांचवी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि प्रदेश भर से आए हुए लगभग 300 पत्रकार गण कार्यक्रम के शुरू से अंत तक बिना ज्यादा हिले डुले, बिना बिखराव के कार्यक्रम के अंत तक डटे रहे।
हालांकि, इसके इसके पीछे के राज का पता नहीं चल पाया। लेकिन निश्चित रूप से यह भी अनेकता में एकता का अद्भुत प्रदर्शन था।
लोग प्रायः प्रश्न उठाते हैं कि पत्रकारों के ढेर सारे संगठन बन गए हैं, अथवा किसानों के सैकड़ो संगठन है तो एकता कैसे हो? अथवा इनकी दुर्दशा का यही कारण है कि यह एकजुट नहीं हैं, कोई एक समेकित शीर्ष संगठन नहीं है। जबकि मेरा मानना है कि हमारे देश के छोटे बड़े सभी प्रकार के नानाविध संगठनों में से अधिकांश में लोकतंत्र के जरूरी मूल तत्वों का अभाव है तथा यहां संगठन के नेताओं का अहं व स्वार्थ प्रायः संगठन हित से भी बड़ा हो जाता है। और यही कारण है कि अच्छा कार्य कर रहे संगठन भी कुछ समय बाद दो फाड़ हो जाते हैं, और यह प्रक्रिया अनवरत चलते रहती है। यह हमारे लोकतंत्र की बड़ी खामियों में से एक है।
हालांकि, मेरा यह मानना है की अगर मत स्पष्ट रूप से अलग-अलग हों तो अलग-अलग संगठन बनने में भी कोई दिक्कत नहीं है पर समान मुद्दों, समान लक्ष्य हेतु आपसी राजनीति व निज स्वार्थ को भुलाकर सभी संगठनों में मजबूत एकजुटता जरूरी है। विशेष कर तब जब आपका समूचा आस्तित्व ही दांव पर लगा हो। वैसे मेरे कथन का I.N.D.I.A या N.D.A से कोई संबंध नहीं है।



