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सुख-दुख

हद है भाई; आज ये क्या छाप दिया भास्कर ने?

अरे भइया… दैनिक भास्कर नोएडा एडिशन अमरोहा न्यूज वालों को जरा सलाम ठोकिए! पत्रकारिता की दुनिया में इन्होंने एक नया आयाम गढ़ दिया.. और शीर्षक ही ऐसा चिपकाया कि पाठक पहले कान खुजाए, फिर सिर खुजाए, फिर अखबार मोड़ के सोचे कि भइया ये पढ़ क्या रहे हैं!

अब ज़रा शीर्षक देखिए और पेट पकड़कर हंसिए: “06 इन दोनों खबरों को फोटो सहित जरूर लगाएं, अगर पेज पर जगह न मिले तो पीडीएफ बनाए”

अरे वाह! क्या शुद्ध, पवित्र, असंशोधित, देसी एडिटोरियल मैनेजमेंट है! साक्षात् पत्रकारिता का सूत्र आदेश ही पहले पन्ने पर प्रकट हो गया। जैसे कोई गुरु जी ने क्लास में कह दिया हो.. ये वाला होमवर्क करना.. नहीं तो खिड़की के पास खड़े रहना!

और नीचे खबर क्या? बिहार में प्रचंड जीत, भाजपाइयों ने मिठाई बांटी, पटाखे फोड़े, चेयरमैन बोली.. जनता ने झूठ की राजनीति को नकारा… मगर जनता ने किसको ज्यादा नकारा—झूठ की राजनीति को या अखबार में चिपके हुए एडिटोरियल आदेशों को—ये इतिहास बताएगा!

ये खबर कम, प्रिंटिंग प्रेस का प्रेमपत्र ज्यादा लग रहा!

लगता है पेज डिज़ाइनर भैया रात को जाग गए थे, और सोचा होगा कि कल जो भी हो, आज तो आदेश चिपकाकर ही सोएंगे। और संपादक जी? शायद सुबह चाय पीते-पीते यह पेज छपने भेज दिया और बोले.. अरे रहने दो, जनता भी देख ही ले कि सिस्टम कैसे चलता है।

हम तो यह भी सोच रहे हैं कि कहीं अगली बार ऐसे शीर्षक न दिख जाएं:

  • “07 नगर निगम की खबर में फोटो बड़ी लगा देना, चेयरमैन नाराज़ हो जाती हैं”
  • “08 विज्ञापन वाला पेज खाली मत छोड़ना, वरना महीने की सैलरी कट जाएगी”
  • “09 संपादक साहब की भांजी की शादी की फोटो कल छापना, जरूरी है”

अगर ऐसा चल गया तो अखबार से ज्यादा मज़ा तो पाठकों को अखबार के अंदर छिपे ऑफिस के झगड़े पढ़ने में आने लगेगा!

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2 Comments

2 Comments

  1. यायावर

    November 18, 2025 at 11:34 am

    भारी काम के दबाव, जल्द से जल्द एडिशन छापने की हड़बड़ी, अपने केबिन से घुरघराते संपादकीय प्रभारी की सरेआम लताड़ के भय से मात्र 15-20 हजार के उप संपादक से ऐसी गलतियां हो जाना स्वाभाविक है। आरामतलब और नौकरी से ऊबे अन्यमनस्क मुख्य उप संपादक भी पन्ने पर एक नजर डालकर छोड़ो भाई जल्दी छोड़ो की हिदायत देने की मानसिकता में ऐसी चूक को नहीं पकड़ पाते। लेकिन इस शीर्षक में दूसरी वाली पंक्ति काबिले गौर है। रिपोर्टर ने पन्ने में जगह न मिल पाने पर पीडीएफ ही बना देने का आग्रह किया है। यह पत्रकारिता का नया टोटका है। जिन अखबारों का किसी शहर में प्रसार नहीं है या दिखाने भर की दस – बीस कॉपी आती हैं, वहां के रिपोर्टर खबर लगे न लगे, लेकिन क्लाइंट पार्टी की खबरों की डेस्क से ऐसी पीडीएफ बनवा लेते हैं। सुबह यह पीडीएफ पार्टी को व्हाट्सएप से भेज दी जाती है। क्लाइंट पार्टी भी खुश कि मेरी खबर छप गई और रिपोर्टर भी गदगद कि पार्टी पकड़ में है। बोल बाबा पराड़कर की जय।

  2. Jitendra

    November 19, 2025 at 8:55 pm

    यायावर भाई ये तो कुछ भी नहीं है। झज्जर में जो हुआ उसके सामने

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