
कृष्णपाल सिंह-
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ईमानदारी का बहुत दम भरती है लेकिन बिडंवना यह है कि इस सरकार में तमाम ऐसे ईमानदार अधिकारी हैं जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है जबकि इन अधिकारियों की सक्षमता में भी कोई संदेह नहीं है बल्कि योगी सरकार ने बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर जिन अधिकारियों को कृतार्थ कर रखा है उपेक्षित अधिकारी क्षमता में उनसे कई गुना आगे हैं। 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी आशीष गुप्ता को अपना कार्यकाल समाप्त होने के 22 माह यानी लगभग दो वर्ष पहले मजबूरी में वीआरएस लेकर रूकसती करनी पड़ रही है उससे यह विषय चर्चा के लिए फिर से प्रासंगिक हो गया है।
बात पुलिस की है तो पुलिस विभाग को ही देखा जाये। केन्द्र की पसंद होने के कारण प्रदेश के डीजीपी बनाये गये मुकुल गोयल को राजनीतिक तनातनी के कारण योगी सरकार ने बे आबरू करके कुर्सी से उतार दिया। इसके लिए मनगढ़ंत आरोप लगाये गये और जब संघ लोक सेवा आयोग ने इस बारे में पूछा तो उन आरोपों को कोई प्रमाण न होने से राज्य सरकार को खामोश हो जाना पड़ा।
इसके बाद उन्होंने डीजी नागरिक सुरक्षा के रूप में सेवा पूरी की। मुकुल गोयल को कई जिलों में पुलिस प्रमुख, इसके बाद महत्वपूर्ण रेंजों में डीआईजी, जोनल आईजी, एडीजी ला एंड आर्डर के बाद बीएसएफ में आईजी से एडीजी तक कार्य करने का लंबा अवसर मिला। जाहिर है कि उनके पास फील्ड में कामयाबी के साथ काम करने की लंबी पृष्ठभूमि थी जिससे वे शानदार डीजीपी साबित हो सकते थे लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक चहेते आईएएस अधिकारी के अवांछित दखल को मंजूर न करने की सजा उन्हें भुगतनी पड़ी।
मुख्यमंत्री का यह चहेता आईएएस अफसर अत्यंत विवादित माना जाता है और उस पर भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। उसकी देखरेख में बनवाये गये बुंदेलखण्ड एक्सप्रेसवे के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लोकार्पण के तत्काल बाद ही दरारे आ गई थी जिससे सीएम की बड़ी किरकिरी हुई थी लेकिन पता नहीं उस अफसर में ऐसे कौन से लाल लगे हैं जिससे योगी ने रिटायरमेंट के बाद भी उस पर कृपा बरसाना बंद नहीं किया है और अभी भी उसे अपनी टीम में जोड़े हुए है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शैली से रूल आफ ला की लोकतांत्रिक शासन की कार्यप्रणाली कराह रही है। फिर चाहे वह कानून व्यवस्था के क्षेत्र में कार्यवाही का मामला हो और चाहे प्रशासनिक सेटप का। उन्होंने शासन की पूरी व्यवस्था अपने चहेते अधिकारियों के भरोसे छोड़ रखी है जिससे सारे विधायक और पार्टी कार्यकर्ता क्षुब्ध हैं। दूसरी ओर गिरोहबंद कार्यप्रणाली के चलते वे अधिकारी जो निजी तौर पर उनसे नहीं जुड़ पाये हैं धक्के खाने को मजबूर हैं।
सीनियर अधिकारियों में जिनकी पोस्टिंग गोरखपुर में रही हो और उस दौरान योगी से उन्होंने अच्छी ट्यूनिंग रखी हो मुख्यमंत्री की सारी रेवड़ियां ऐसे ही अधिकारियों को चीन्ह-चीन्ह कर दी जाती हैं। ऊपर मुख्यमंत्री के जिस चहेते की चर्चा की गई है उनकी नापसंदगी के एक और शिकार ज्योति नारायण हैं। वे अपनी साफ सुथरी और शत प्रतिशत न्यायपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण हर सरकार के कोप के शिकार होते रहे हैं। इसलिए पूर्व की सरकारों में वह कुछ महीने या दिन ही टिक पाते थे और उनका तबादला हो जाता था। लेकिन वे जिस जिले में रहे जनता उनकी बहुत मुरीद रही।
बाद में उन्होंने एनआईए में उच्च पदों पर लंबी सेवायें दी जिसमें उनका दायरा कई राज्यों तक विस्तृत रहा। इस दौरान आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी तत्वों के नेटवर्क को ध्वस्त करने में उन्होंने शानदार काम किया। इस प्रोफाइल को देखते हुए उम्मीद यह थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन्हें अपने बरदहस्त लायक पुलिस अधिकारियों में सर्वोपरि रखेंगे। जब वे लखनऊ लौटे तो इसी अपेक्षा के मुताबिक पहले तो योगी ने उनको प्रोत्साहित किया, उन्हें आईजी ला एंड आर्डर बनाया लेकिन जल्द ही अंतःपुर के षणयंत्रों के चलते वे बेपटरी हो गये।
इसके बाद जब वह एडीजी ट्रैफिक बने तो मुख्यमंत्री को गुरूमंत्र देने वाले आईएएस अधिकारी ने अपनी एनजीओ के लिए उन्हें इस्तेमाल करना चाहा लेकिन वे इसकी बजाय उनकी मंशा में बाधक हो गये और नतीजतन लंबे समय से जालौन जिले के मंगरौल पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में उन्हें वक्त गुजारना पड़ रहा है जबकि उन जैसे तेज तर्रार अधिकारी का इस्तेमाल अगर योगी ने किसी अग्रिम मोर्चे पर किया होता तो वे उनके लिए बेहद लाभदायक सिद्ध हो सकते थे। एडीजी नवनीत सिकेरा भी उन्हीं की तरह की नियति में जकड़े हुए हैं।
सिकेरा ने यादव होते हुए भी अखिलेश सरकार में नाजायज राजनैतिक दबाव के आगे झुकना कुबूल नहीं किया था जिससे अखिलेश के समय भी उन्हें सरकार का गुस्सा झेलना पड़ा और अब वर्तमान में भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले नवनीत सिकेरा को भी कानून व्यवस्था के कठिन मोर्चा पर लगाने की बजाय उनसे उन्नाव पीटीएस में मास्टरी करायी जा रही है।
पीपीएस से आईपीएस बने अधिकारियों में जो विरले अधिकारी ऊंची सत्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं उनमें अरविन्द चतुर्वेदी टाप पर हैं। अरविन्द चतुर्वेदी के पिता गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे और जिन दिनों आरएसएस की विचारधारा का समर्थन करना गुनाह माना जाता था उन दिनों वे आरएसएस के साथ में गहराई से जुड़े से हुए थे और अपने क्षेत्र में संघ के विस्तार में उन्होंने बहुत योगदान किया था। लेकिन अरविन्द चतुर्वेदी दो तीन जिलों में एसपी रहने के बाद अपनी दो टूक कार्यशैली के कारण सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं से भिड़ गये तो योगी ने उनको सतर्कता विभाग में पहुंचाकर डंप कर दिया।
पहले की सरकारों में स्थानीय कारण से अगर किसी अच्छे अधिकारी को हटाने की नौबत आ जाती थी तो उसका जलावतन का समय सीमित होता था और इसके बाद उसकी उपयोगिता के मद्देनजर फिर उसकी पुनर्वास कर दिया जाता था। पर अरविन्द चतुर्वेदी को तो डीआईजी बन जाने के बाद भी विजिलेंस से उद्धार नहीं हो पा रहा है।
अब डीजी स्तर के अधिकारियों को लें। अभय कुमार प्रसाद को बेहद ईमानदार अधिकारी माना जाता है। शुरू में योगी सरकार ने उन्हें राजधानी में एडीजी जोन बनाया। वे दलित हैं जबकि उनकी टीम में आईजी और एसएसपी दोनों ठाकुर थे और इस कारण अभय कुमार प्रसाद को कोई भाव नहीं देते थे। अभय कुमार प्रसाद ने कानून व्यवस्था बिगड़ने पर कई बार दोनों अधीनस्थों को चेताया लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। अंततोगत्वा लखनऊ में जब हालात खराब हो गये तो आईजी और एसएसपी के साथ एडीजी को भी नाप दिया गया। बाद में आईजी और एसएसपी की तो मेनस्ट्रीम में वापिसी करा दी गई लेकिन अभय कुमार प्रसाद लूप लाइन में ही पड़े रहे। वे वर्तमान में डीजी नागिरक सुरक्षा हैं जिसमें उनके अलावा कोई आईपीएस अधिकारी नहीं हैं।
यह तय है कि ईमानदारी का सिला यह सरकार उनको इसी विभाग में रहते हुए उन्हें रिटायर कर देने के बतौर देने के लिए कटिबद्ध है।
बात आशीष गुप्ता की जो 1989 बैच के आईपीएस हैं। उनकी पहली पोस्टिंग एसपी ललितपुर के पद पर हुई थी तभी से उन्होंने साफ सुथरी और नियम कायदे के तहत काम करने वाले अधिकारी की बनायी थी। वे केन्द्र में भी प्रतिनियुक्ति पर रहे जहां उन्होंने नेटग्रिड के सीईओ की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। दिसम्बर 22 में उनकी वापिसी प्रदेश में हो गई थी लेकिन साढ़े छह माह तक उन्हें प्रतीक्षारत रखा गया। इसके बाद पोस्टिंग भी दी गई तो रूल एंड मैनुअल के डीजी की जिसमें अमिताभ ठाकुर को रखा गया था। इस पोस्टिंग को काले पानी की सजा माना जाता है।
वैसे तो अमिताभ ठाकुर की सपा संस्थापक से जो लड़ाई थी उसमें कोई भी न्यायप्रिय मुख्यमंत्री उनका साथ देता लेकिन मुलायम सिंह के प्रति अपने व्यक्तिगत कर्ज को अदा करने के लिए योगी सरकार ने अमिताभ ठाकुर का कैरियर तबाह कर दिया और इसका तरीका उनकी रूल एंड मैनुअल में पोस्टिंग के रूप में अपनाया गया। आशीष गुप्ता को भी नौकरी छोड़कर भागने के लिए मजबूर करने के दृष्टिगत रूल एंड मैनुअल का डीजी बनाया गया हैं। इसलिए सरकार की मंशा के अनुरूप आशीष गुप्ता ने पलायन का रास्ता अपनाया और 22 माह पहले ही वीआरएस की अर्जी डाल दी जो मंजूर भी हो गई है।
इसी बैच के एक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आदित्य मिश्रा को भी एक माह से प्रतीक्षा में रखा जा रहा है जबकि अविनाश चन्द्रा के रिटायरमेंट से डीजी अग्निशमन का पद खाली है जिसमें कोई पोस्टिंग अभी तक नहीं की गई है। शायद उन्हें भी वीआरएस की ओर धकेल ले जाने की मंशा है। हालांकि आदित्य मिश्रा की पत्नी रेणुका मिश्रा जो कि 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं वे डीजी भर्ती बोर्ड हुई हैं जो कि सम्मानित पद माना जाता है। आशीष गुप्ता की पत्नी तिलोतमा वर्मा भी 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं। नौकरी की शुरूआत में वे एसपी सिटी झांसी के पद पर रही थी तो उन्होंने सत्ता पोषित गुंडों और उनसे जुड़े सत्तारूढ़ पार्टी के थानाध्यक्षों की तबियत हरी कर दी थी। होना तो यह चाहिए था कि उनके उत्तर प्रदेश की पहली महिला डीजीपी बनाया जाता।
वे फिलहाल डीजी ट्रेनिंग हैं और नवम्बर 2025 में उनका रिटायरमेंट होने वाला है। वर्तमान डीजीपी प्रशांत कुमार की भी रिटायरमेंट कुछ ही महीनों बाद है और इनकी जगह योगी सरकार जिस अधिकारी को उत्तर प्रदेश पुलिस की कमान सौंपना चाहती है वे अत्यंत जूनियर हैं। उनके लिए एक तो वरिष्ठ अधिकारियों को वीआरएस के लिए मजबूर कर रास्ता बनाया जा रहा है, दूसरे हाल में डीजीपी की तैनाती के लिए राज्य सरकार ने नई नियमावली जारी कर दी है जिसमें कई शर्तों से उसमें अपने को आजाद कर लिया है। यह दूसरी बात है कि आगे चलकर अगर किसी ने इसे कोर्ट में चुनौती देने का साहस दिखा दिया तो इसकी वैधता खतरे में पड़ सकती है।
अकेले पुलिस में ही नहीं शासन में भी सरकार की गिरोहबंदी नीति का प्रभाव देखा जा रहा है। यही वजह है कि अपर मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव स्तर के लगभग तीन चैथाई अधिकारी महत्वहीन पदों पर हैं जबकि शासन की कुंजी समझे जाने वाले विभाग आठ दस आईएएस अधिकारियों तक सिमटे हैं। इस व्यवस्था के कारण अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार के पास गृह और वित्त सहित चार बड़े विभागों की कमान थी। हालांकि दीपक कुमार चाहते थे कि उन्हें केवल गृह विभाग सौंपा जाये और इसके लिए वे सर्वाधिक उपयुक्त भी थे लेकिन जब उन्हें हलका करने की बात आयी तो उनसे गृह विभाग वापस लेकर फिर से उन संजय प्रसाद को सौंप दिया गया जो पहले से ही ओवर लोडिड हैं।
इस कार्यप्रणाली से शासन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और तमाम अधिकारियों की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। भ्रष्टाचार व मनमानी बढ़ने के पीछे भी केन्द्रीयकरण का यही कारक मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। क्या मुख्यमंत्री को अपनी नीति के दुष्परिणामों का भान है और वे निजी संबंधों की बजाय रूल आफ ला के तकाजे के लिए सभी अधिकारियों को उनकी क्षमता और सत्यनिष्ठा के आधार पर जिम्मेदारियां बांटने की सोचेंगे।



Narendra kumar
March 17, 2025 at 4:47 pm
Dandvat pranam hai sir aapko patrkarita mein aapke jaisa ja baj sipahi pure district Jalaun mein to chhodo Uttar Pradesh mein bhi koi nahin hoga solute hai sar aapko