Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

आयोजन

गोरखपुर महोत्सव: कमर हिली व्यवस्था फिसली और पत्रकारों ने झेला अपमान!

गोरखपुर : गोरखपुर महोत्सव इन दिनों अपनी सांस्कृतिक गरिमा के लिए नहीं, बल्कि अव्यवस्था, VIP वाद और पत्रकार अपमान के लिए चर्चा में है। जिस आयोजन को जनता से जोड़ने का दावा किया गया था, वह ज़मीनी हक़ीक़त में जनता से कटकर VIP लॉज और “पास-परमिट संस्कृति” तक सिमट कर रह गया। सबसे ज़्यादा पीड़ा इस बार उन छोटे और मंझोले मीडियाकर्मियों को झेलनी पड़ी, जिनकी पत्रकारिता मोहल्लों और गलियों में तो भारी मानी जाती है, लेकिन महोत्सव के पास काउंटर पर पहुँचते ही उनका रुतबा ज़मीन चूमता नज़र आया।

“पास” के लिए दर-दर भटकते पत्रकारों ने न सिर्फ़ अपमान झेला, बल्कि यह भी देखा कि व्यवस्था में सम्मान नहीं, पहचान और चमचागिरी की वैल्यू है। रिश्तेदारों और परिचितों के बीच जिन पत्रकारों का दबदबा कल तक अपने को पत्रकार बताते हुए बयानबाज़ी में छलकता था…आज वही पत्रकार इस महोत्सव में खुद अपने लिए “पास” का जुगाड़ करने में “फेल” हो गए। यह दृश्य किसी व्यंग्य से कम नहीं था, बल्कि पत्रकारिता के आत्मसम्मान पर ऐसा तमाचा था जो अक्सर पड़ता है रहता है।

छोटे और मझोले पत्रकार, “पास” के लिए कभी “फोन घिसते” दिखाई दिए तो कभी “पहचान” याद दिलाते। कल तक जिन रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों की छाती चौड़ी थी कि, “फलाने पत्रकार से कह देंगे, तो पास तो मिल ही जाएगा”! पर आज वही “फलाने” पास के लिए “चिल्लाने” से लेकर “धकियाने” तक का “दंश” झेल रहे हैं और अपने ही “पास” के जुगाड़ में “फेल” होकर पत्रकारिता की सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती का “लाइव प्रसारण” बन गए हैं।

इस सामूहिक अपमान के बीच एक “धुरंधर पत्रकार” ने जब मंच के सामने खड़े होकर और अपना मोबाइल कैमरा ऑन कर वीडियो-सेल्फी जारी की…..तब “पास” प्राप्त होने से वंचित हुए कई “पासविहीन” पत्रकारों को यह हरकत उनके “जले पर नमक छिड़कने” जैसा महसूस हुआ। नतीजा यह हुआ कि “सोशल मीडिया” पर आरोपों की ऐसी बौछार हुई कि पत्रकारिता से ज़्यादा दरबारी “चरित्र प्रमाण-पत्र” बाँटे जाने लगे। “चरणचुंबक” से लेकर “चरणचाटन” तक तथा “मुफ्तखोर” से लेकर “मीरजाफ़र” जैसी उपाधियाँ देते हुए आरोपों की ऐसी “विद्रूप चार्जशीट” सेल्फी डालने वाले “धुरंधर पत्रकार” को थमा दी गई कि “IPC” भी शर्मा जाए।

उधर, महोत्सव में एक “पावर हाउस टाइप” के स्टार के आने की चर्चा ने कल खूब जोर पकड़ा और उम्मीद जगाई… लेकिन मंच पर पहुँचे “पावर हाउस टाइप” सितारे की प्रस्तुति ने यह साफ़ कर दिया कि “पावर हाउस टाइप” वाले सितारे की “करंट सप्लाई” बहुत पहले ही “विलुप्त” हो चुकी है। “पावर हाउस” वाले स्टार फिर उसी “कमरिया” से लेकर “नथुनिया’ से शुरू होते हुए “लपालप” से लेकर “धकाधक” तक में जाकर सिमट गए। वैसे भी आज तक कोई यह समझ ही नहीं पाया कि भोजपुरी गीत “भौजी”–”भतार”–”साली”–”सरहज” से शुरू होकर “चोली” “घाघरा” “कमरिया” “जांघिया” पार करता हुआ अंततः “अंगिया” “बदनिया” “करेजवा” और “लिपस्टिक” पर आकर ही दम क्यों तोड़ देता है?

महोत्सव के विषय में सोशल मीडिया पर चल रही रीलें महोत्सव का नहीं बल्कि अव्यवस्था का “उन्मुक्त कंठ” से गायन कर रही हैं और इस विकराल अव्यवस्था से परेशान गोरखपुर वासी ही सबसे ज़्यादा “तीखी प्रतिक्रिया” दे रहे हैं। कल शाम तो हाल यह हुआ कि “महोत्सव” कब “पीटोत्सव” में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला। भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर “वर्दी” ने इस कड़ाके की ठंड में जनता को “गरम” करना शुरू कर दिया। जनता बाहर “व्यवस्था की लाठियों” से “गरम” हो रही थी…”मंझोले पत्रकार” पास वितरण व्यवस्था को कोस रहे थे, और VIP अंदर बैठकर बुझ चुके “पावर हाउस” वाले सितारे की बिजली के सहारे “आई हो दादा…कइसन पियवा के चरित्तर बा” का “रसपान” कर रहे थे।

महोत्सव में “चरित्तर”..”चौहत्तर”..और “छिहत्तर” जैसे गीतों के जरिये शमां बांधने का प्रयास करना एक बार फिर से सांस्कृतिक दावों को लेकर की जाने वाली व्यर्थ के बयानबाजी की पोल खोलती है। कल विडंबना भी कुछ ऐसी थी कि.. जिस वक्त जनता ठंड में लाठियों से जूझ रही थी…उसी वक्त बाहर के घमासान से अंजान हमारे माननीय द्वारा “बार-बार दिन ये आए” गाकर जनता जनार्दन के लिए बड़ी शिद्दत से दुआएं मांगते हुए शुभकामनाएँ उड़ेली जा रही थीं।

महोत्सव का दृश्य सवाल खड़ा करता है कि क्या गोरखपुर महोत्सव अब जनता का उत्सव नहीं रहा? क्या यह केवल VIP, चहेतों और पासधारियों का निजी समारोह बन चुका है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहीं रीलें इस महोत्सव की सफलता नहीं, बल्कि अव्यवस्था का “सार्वजनिक ऑडिट” कर रही हैं। “भीड़ प्रबंधन की नाकामी” “अव्यवस्थित प्रवेश” पार्किंग और एग्जिट की समस्या के साथ ही आमजन की उपेक्षा हर फ्रेम में साफ़ दिखाई दे रही है।

अगर ऐसा ही है तो ईमानदारी से इस महोत्सव का नाम बदलकर..”गोरखपुर महोत्सव” से “VIP महोत्सव” कर देना चाहिए। क्योंकि जहाँ जनता बाहर धकेली जाए, पत्रकार लाइन में अपमानित हों, और व्यवस्था से लेकर सत्ता-संरक्षित वर्ग मंच के सबसे क़रीब हो…वहाँ उत्सव नहीं बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रदर्शन होता है …और ऐसे प्रदर्शन इतिहास में संस्कृति के नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता के स्मारक बनकर दर्ज होते हैं।

महोत्सव के कुछ दृश्यों की झलक देखें….

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन