इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक अजीबो-गरीब बयान सामने आया है। यह बयान दिया है जज राम नारायण मिश्रा ने। यह जज महोदय वही हैं जो बीते वर्ष विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में एक विवादित भाषण देकर चर्चा में आए थे। इन्होंने क्या कहा है और लोग क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं? नीचे पढ़ें…


सुप्रिया श्रीनेत-
यह कहना है इलाहाबाद हाईकोर्ट जज राम नारायण मिश्रा का
जो क़ानून एक औरत की सुरक्षा के लिए बना है उससे क्या उम्मीद रखे इस देश की आधी आबादी
रवीश कुमार-
औरंगज़ेब पर बहस ने भारत को प्रखर बनाया है। कुछ आप भी कहिए इस बात पर कि यह दुष्कर्म के प्रयास का मामला कैसे नहीं है?
अशोक कुमार पांडेय-
तो ये सारी हरकतें क्यों की जा रही थीं? पुलिया के नीचे कोई फ़िल्म चल रही थी क्या जो दिखाने ले जा रहा था?
ऐसे फ़ैसले, ऐसी टिप्पणियां पीड़िता को हतोत्साहित करने और अपराधी को प्रोत्साहित करने वाली नहीं लगतीं आपको?
रणविजय-
- लड़की के स्तनों को पकड़ना
- लड़की के पायजामे का नाड़ा तोड़ना
इसे रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते.भारत की एक कोर्ट ने 11 साल की लड़की के मामले में ये कहा है
दाराब फारुकी-
ये आदमी राम मनोहर नारायण मिश्रा हाईकोर्ट जज है। इंसान अभी बन नहीं पाया है, लेकिन आदमी है और जज है, ये पक्का है।
अनिल कुमार-
राम मनोहर नारायण मिश्र जज साहब ने फैसला दिया है तो गलत थोड़े ही होगा। इज्जत लूटने का तरीका अलग होता है।
पहले रेपिस्ट को जोर से हा हा हा हा हंसना होता है, फिर कहना होता है, ”अब बचकर कहां जाओगी?”
इसके बाद गुंडा को दरवाजा का सिटकिनी बंद करना होता है। फिर पीडि़ता को चिल्लाना पड़ता है, ”बचाओ, बचाओ, कोई तो बचाओ।”
”अब तुम्हें यहां कोई नहीं बचाने आयेगा। तुम रंगा के चंगुल में पूरी तरह फंस चुकी हो,” गुंडा ऐसे बोलेगा।
फिर पीडि़ता कहेगी, ”भगवान के नाम पर मुझे छोड़ दो। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? प्लीज भगवान के लिये मुझे छोड़ दो।”
फिर अंदर से तरह तरह की आवाज आयेगी। आउँ करते हुए गुंडा बाहर आयेगा। पीडि़ता आधे अधूरे कपड़े में पड़ी रहेगी।
सीन 2…
फिर पीडि़ता छत से कूदने जायेगी, हीरो बनकर कोई बचायेगा, तब जाकर माना जायेगा कि पीडि़ता के साथ रेप या रेप की कोशिश हुई है।
है कि नहीं जज साहब?

सुजाता-
आप एक कॉमेडियन के शो में श्लील-अश्लील की बहस को ले आते हैं, लेकिन जिनके पास सत्ता है उनके निर्णयों की अश्लीलता पर विचार ही नहीं करते. मैं सोचती हूँ कोई भी लड़की किस तरह कोर्ट में अपना पक्ष रख सकती है अगर वह पहले से जानती हो कि अदालत जाने की रुसवाई के अलावा व्यवस्था हमलावर के बचाव के भी इंतज़ाम करेगी? नहीं रख सकेगी.
एक नागरिक को हतोत्साहित करना कि वह न्याय की उम्मीद न रखें, लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है. लेकिन हम तो अभी धर्म के काल्पनिक ख़तरे से सड़कों पर निपटने में व्यस्त हैं जिसमें बहुसंख्यक होने के अहंकार का फूहड़ प्रदर्शन चल रहा है. यथार्थ समस्याओं पर बात करने के लिए अभी हम ख़ाली नहीं हैं.
यह सिर्फ़ स्त्री-द्वेष और विरोध नहीं है, यह एक क्लासिफ़ाइड एप्रोच है जो पूरी न्याय व्यवस्था को जड़ से बदल देने की आकांक्षी है.


