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हेडलाइन मैनेजमेंट – कसाब को बिरयानी खिलाने से आरिफ को माफी न मिलने तक

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज कुवैत की इमारत में आग लगने से 40 से अधिक भारतीयों की मौत सबसे बड़ी खबर है लेकिन जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं की खबरों की प्रस्तुति चर्चा के लायक है। आप जानते हैं कि 2016 की नोटबंदी के फायदों में वेश्यावृत्ति कम होने से लेकर आतंकवाद पर नियंत्रण का हवा-हवाई दावा किया गया था लेकिन तीसरे कार्यकाल के शपथग्रहण के दिन ही तीर्थयात्रियों की बस पर हमला हो गया। वेश्यावृत्ति रोकने के लिए ऐसे नियम बना दिये गये हैं कि होटलों में ठहरना मुश्किल हो गया है। भाई-बहन (भले रिश्ता साबित किये बिना) एक कमरे में नहीं ठहर सकते। पुरुष महिला सहेली के साथ या महिला पुरुष मित्र के साथ तो नहीं ही ठहर सकता है। इलाके की पुलिस इसे वेश्यावृति मान सकती है। इसलिए होटल वाला कमरा नहीं देगा और पुलिस को जो अधिकार थे उनमें बेतहाशा वृद्धि हुई है पर अभी यह मुद्दा नहीं है क्योंकि मामला संस्कार आदि से भी जोड़ दिया गया था। उसमें जीएसटी के बाद ऐसे नियमों से होटल उद्योग का बाजा बजता है तो बजे। यह राजनीति नहीं है।

यह सब इसलिये हो पाया है कि संबंधित खबरें और मामले अखबारों में नहीं छपते हैं। या बहुत कम छपते हैं। सूचना भर छापकर लोग फॉलो नहीं करते। इसी क्रम में शपथग्रहण के दिन तीर्थयात्रियों की बस पर आतंकवादी हमले की खबर वैसे नहीं छपी थी जैसे छपती रही है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि अखबार के पन्ने को सुंदर और संग्रहणीय बनाना हो। इतिहास को बदलने वाले लोग वर्तमान का बेहतर प्रबंध कर ही सकते हैं। पर वह अखबारों में ही हो रहा है और मीडिया ही कर रहा है। कल मैंने बताया था कि समर्थकों का एक वर्ग इस बात से परेशान है कि भाजपा ने चुनाव से पहले स्वतंत्र रूप से काम करने वाले यूट्यूबर्स पर लगाम कसने के लिए कुछ नहीं किया या कुछ नहीं कर पाई।  

हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, जम्मू में आतंकवादी हमले 26 घंटे में तीन जगह गोलियां चलीं। इस खबर में बताया गया है कि इतवार को तीर्थयात्रियों की बस पर हमले में 9 मारे गये और 42 जख्मी हुए थे। उसके बाद मंगलवार की शाम एक वारदात में दो आतंकवादी मारे गए और एक नागरिक की मौत हो गई। इसमें सीआरपीएफ के एक जवान की भी मौत हुई। मंगलवार-बुधवार की रात आतंकवादियों के एक हमले में पांच सैनिक और एक एसपीओ जख्मी हुए। खबर के अनुसार यह मुठभेड़ सारी रात चली। चौथा मामला बुधवार की रात का है। इसमें आतंकवादियों ने एक पुलिस टीम पर गोली चलाई जिसमें एक पुलिस अधिकारी जख्मी हुआ है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज इस लीड के साथ पहले पन्ने पर दो कॉलम में एक खबर है, विपक्ष ने सरकार पर हमला किया आतंकी वारदातों पर राजनीतिक विवाद”। सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, हाईअलर्ट पर : जम्मू के जिले नए प्रभाव क्षेत्र के रूप में उभरे”

कहने की जरूरत नहीं है कि मामला पर्याप्त गंभीर है और खबर तो महत्वपूर्ण है ही। इसलिए भी कि सरकार ने न सिर्फ नोटबंदी से आतंकवाद खत्म करने का दावा किया था बल्कि सत्ता में हो तो आतंकवाद को नियंत्रित रखने का भी दावा करती है। यही नहीं, कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया और 17 मई को लोकसभा चुनाव के दौरान रक्षा मंत्री (तबके और अबके भी) ने कहा था, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर हमारा था, हमारा है और हमारा रहेगा। एनडीटीवी की एक खबर के अनुसार, चीन के मुद्दे पर विपक्षी दलों पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, भारत ने कुछ खोया नहीं है। भारत का हम कुछ खोने नहीं देंगे। इस समय समान स्तर पर बातचीत का सिलसिला चल रहा है। विश्वास है कि इसका समाधान निकलेगा। लगता है, सैनिकों की मौत को वे खोना नहीं मानते हैं। जो भी, कश्मीर का जो हिस्सा भारत के पास है, वहां विधानसभा का चुनाव सरकार पांच साल में नहीं करा पाई है। अनुच्छेद 370 हटाने या हटाने के बाद भी। लोकसभा की पांच सीटों के लिए मतदान पांच चरण में हुआ। घाटी में तो भाजपा ने चुनाव ही नहीं लड़ा और जो दो सीटें भाजपा ने जीती है वह आतंकवाद का नया केंद्र बना हुआ है। 

अखबारों का काम निष्पक्ष होकर खबर देना है पर 10 साल से इनका पक्षपात देखने लायक है और इसमें चीन के मुद्दे पर विपक्षी दलों पर भ्रम फैलाने के आरोप को प्रचारित करना शामिल है। आज भी यह खबर दूसरे अखबारों में ऐसे नहीं छपी है जैसा मामला है और जो छपा है वह आप देख सकते हैं। चूंकि सबके लिए सब अखबार देखना संभव नहीं है इसलिए मैं कोशिश करता हूं कि कुछ खास खबरों के जरिये मीडिया का पक्षपात आपके समक्ष रख सकूं और आप सही निर्णय़ कर सकें। शुरुआत अमर उजाला से करता हूं। दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, जवान बलिदान, पाकिस्तान का दूसरा आतंकी भी ढेर”। उपशीर्षक है, 15 घंटे मुठभेड़ : हथियार, गोला-बारूद, नकदी बरामद”। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक सरकारी खबर है, आतंकियों का लगा रहे पता। पुलिस अधिकारी ने कहा कि मारे गये दोनों आतंकी पाकिस्तानी बताये जा रहे हैं। पता लगाया जा रहा है। यहां भी डोडा के हमले की खबर है लेकिन बोल्ड उपशीर्षक के साथ और यह नहीं बताया गया है कि लगातार हमले हो रहे हैं। अमर उजाला में जम्मू की आतंकवादी घटनाओं से संबधित इस खबर के साथ एक और खबर है, खालिस्तान समर्थकों ने जी-7 बैठक से पहले इटली में तोड़ी गांधी प्रतिमा। उपशीर्षक है, पीएम मोदी को करना था लोकार्पण, भारत ने की कार्रवाई की मांग।

कहने की जरूरत नहीं है कि देश भक्ति से ओतप्रोत रिपोर्टर खबर ऐसे ही लिखेंगे और वे नुकसान स्वीकार नहीं करेंगे। आतंकी पाकिस्तानी लगता है से अपनी लाचारी छिपाने में मदद मिलती है पर संपादकीय विवेक हो तो समझ में आना चाहिये कि तीसरी बार सरकार बनने के बाद हमले बढ़ गए हैं तो उसका मतलब है। खबर है। नौ तीर्थयात्रियों के मारे जाने की खबर पहले पन्ने पर नहीं छप पाई तो अब हिन्दुस्तान टाइम्स की तरह हमलों को गंभीरता से देखें और बतायें। पर बताया जा रहा है, दूसरा आतंकी भी ढेरनवोदय टाइम्स में यह खबर फोल्ड के नीचे चार कॉलम में है। यहां शीर्षक है, कठुआ में दो आतंकवादी ढेर, सीआरपीएफ जवान शहीद। यहां भी यही दिखाने की कोशिश है कि उनका दो मरा, हमारा एक। लेकिन हमारा एक हमारा है, ड्यूटी पर था, देश सेवा में लगा था और देश उसे बचा नहीं पाया। वे दो तो मरने ही आये थे। बच जाते तो शर्म होती अभी अपना एक मारा गया वह ज्यादा महत्वपूर्ण खबर है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, जम्मू में 15 घंटे चले ऑपरेशन में सीआरपीएफ जवान और दो आतंकवादी की मौत। खबर में बताया गया है कि शुरुआत इतवार के बस हमले से हुई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया (और कुछ दूसरे अखबारों में भी) पहले पन्ने पर पाकिस्तानी आतंकवादी की माफी अपील खारिज किये जाने की खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकवादी हमले बढ़ रहे हैं और शपथग्रहण के दिन तीर्थयात्रियों पर हमले के बाद अगर माफी अपील खारिज की गई है तो यह हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग लगता है, भले न हो। आखिर सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद यह निर्णय लेने में 18 महीने क्यों लगे? 16 महीने या 20 महीने क्यों नहीं। जो भी हो, अब ऐसे सवाल नहीं उठते, जवाब तो खैर नहीं ही आते हैं

खबरों के अनुसार, 22 दिसंबर 2000 को लाल किला परिसर में तैनात सात राजपूताना राइफल्स की यूनिट पर गोलीबारी की गई थी। इसमें तीन सैन्यकर्मी मारे गए थे। अधिकारियों ने राष्ट्रपति सचिवालय के 29 मई के आदेश का हवाला देते हुए बताया कि 15 मई को आरिफ की दया याचिका प्राप्त हुई थी, जिसे 27 मई को खारिज कर दिया गया था। मौत की सजा बरकरार रखते हुए कहा गया है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे अपराध की गंभीरता कम होती हो। सुप्रीम कोर्ट ने तीन नवंबर 2022 को आरिफ की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी और मामले में उसे दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि मौत की सजा पाया दोषी अब भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत लंबे समय तक हुई देरी के आधार पर अपनी सजा में कमी के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। पर वह अलग मामला है। मुझे लगता है कि आज इस खबर का छपना कसाब को बिरयानी खिलाने की अफवाह और अफवाह फैलाने वाले का भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने जैसा मामला है। यह खबर भी हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकती है। न भी हो तो काम वही हुआ है।  

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि, यहां कई दूसरी दिलचस्प और महत्वपूर्ण खबरें हैं और इनमें एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड तथा आरटीआई की खबर, जानने का आपका अधिकार के तहत है। द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक टाइम्स ऑफ इंडिया जैसा ही है। हालांकि, ऐसा न्यूज एजेंसी की खबरों के कारण भी होता है। न्यूज एजेंसी का शीर्षक ठीक हो और खबर में ज्यादा बदलाव न हो, उसे किसी अन्य खबर के साथ जोड़ा नहीं जाये तो अमूमन ऐसा होता है। हालांकि, द हिन्दू में यह खबर तीन कॉलम में है। द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम में लेकिन बड़े और बोल्ड फौन्ट में तीन लाइन के शीर्षक के साथ है। शीर्षक है, हमलों में वृद्धि के बाद जम्मू में आतंकवाद विरोधी अभियान। टेलीग्राफ ने अपनी खबर में बताया है कि इन हमलों में एक डीआईजी और दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बच गये। जम्मू में यह चार दिनों में चौथा हमला था।

इस खबर में प्रधानमंत्री की चुप्पी पर राहुल गांधी का सवाल शामिल है। उन्होंने कहा है कि देश को यह जवाब चाहिये कि आतंकवादी पकड़े क्यों नहीं गये हैं। खबर के अनुसार राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा है (और कई अखबारों के लिए यह पहले पन्ने की खबर नहीं है), “नरेंद्र मोदी बधाई संदेशों का जवाब देने में व्यस्त हैं और जम्मू-कश्मीर में बेरहमी से मारे गए श्रद्धालुओं के परिवारों की चीखें भी नहीं सुन सकते।” मोदी ने अभी तक इन घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने जरूर इसपर दो कॉलम की खबर अलग से छापी है लेकिन इसमें भाजपा की प्रतिक्रिया पहले है। राहुल गांधी का यह आरोप बाद में। हिन्दुस्तान टाइम्स ने भाजपा के इस आरोप को भी प्रचारित किया है कि, इंडिया ब्लॉक की आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति है। एक पाठक के रूप में मेरी चिन्ता यह नहीं है कि इंडिया ब्लॉक की सहानुभूति है या नहीं। मेरी चिन्ता यह है कि भाजपा सरकार 10 साल में नियंत्रित क्यों नहीं कर पाई और नहीं कर पाई तो हार क्यों नहीं मान रही है और अखबार सच खुलकर क्यों नहीं बता रहे हैं।

अगर इंडिया ब्लॉक की सहानुभूति है तो माफी याचिका क्यों लंबित रही कम से कम उसे निपटाकर लटकाने की व्यवस्था तो बहुत पहले होनी चाहिये थी। यहां यह शंका होती है कि उसे हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए बचा कर रखा गया है और जरूरत हुई तो चुनाव के समय टांग कर फिर हेडलाइन मैनेजमेंट किया जायेगा। यह मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं। दस साल से यही चल रहा और मी़डिया इसकी पोल खोलने की बजाय सहयोग करता दिख रहा है।  

आइये, अब आज की कुछ और प्रमुख खबरों को देख लें। आप जानते हैं कि भाजपा और प्रधानमंत्री के सहयोगी तेलुगू देशम के नेता चंद्रबाबू नायडू की आंध्रप्रदेश में भव्य वापसी हुई है और कल शपथग्रहण था जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हुए। इसी तरह उड़ीसा में पहली बार भाजपा की सरकार बनी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इन दोनों शपथग्रहण की खबर को मिलाकर एक लीड बनाया है और दोनों अलग-अलग शीर्षक के साथ अलग खबरें हैं। इनका साझा शीर्षक दोनों खबरों का फ्लैग शीर्षक है लेकिन दोनों मिलकर लीड नहीं हैं। लीड तमिलनाडु की खबर ही है। मोहन चरण मांझी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई और मंत्रिमडल में 15 मंत्री शामिल किये गये। दूसरी लीड या लीड का आधा हिस्सा है। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर छपी एक खबर का शीर्षक है,राज्यों के महत्वपूर्ण विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा में बेचैनी।      

द टेलीग्राफ का आज का कोट भी राहुल गांधी का है। खबरों के अनुसार उन्होंने कहा है, (और यह पहले पन्ने की खबर नहीं है) “आपने देखा कि प्रधानमंत्री ने कैसे ‘400 पार’ कहा जो गायब हो गया और फिर ‘300 पार’ आया। उसके बाद, उन्होंने कहा, ‘मैं जैविक नहीं हूं। मैं कोई निर्णय नहीं लेता। मुझे परमात्मा ने भेजा है और वही निर्णय लेते हैं।’ द टेलीग्राफ का कोट संभव है हिन्दी से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया हो और मैं यहां अंग्रेजी से अनुवाद कर रहा हूं इसलिए थोड़ा अंतर हो सकता है पर भाव आप समझ जायेंगे और यह भी कि कई अखबारों में भाजपा का जवाब पहले छपता है और मूल खबर बाद में वह भी आधी-अधूरी। उन्होंने कहा है, मेरे पास यह सुविधा नहीं है क्योंकि मैं एक मनुष्य हूं और भगवान मुझे आदेश नहीं करते हैं …. मेरे भगवान भारत के गरीब लोग हैं। 

इंडियन एक्सप्रेस की खास खबरें

बिहार और आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा मिलने की संभावना क्यों कम है। इस खबर के अनुसार भाजपा के दो प्रमुख सहयोगियों, टीडीपी और जेडी (यू) ने क्रम से आंध्र प्रदेश और बिहार के लिए विशेष श्रेणी की मांग की है। लेकिन सरकार के भीतर की चर्चा से पता चलता है कि इसे पूरा करना मुश्किल होगा क्योंकि कई राज्य ऐसे हैं जिन्हें ज्यादा सहायता की आवश्यकता हो सकती है। यह उनके सामाजिक-आर्थिक तथा वित्तीय स्वास्थ्य को देखते हुए ही तय होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर यह सहायता मिलनी होती तो 10 साल में मिल गई होती। सहयोगी दल तो दोनों रहे ही हैं। अब जब भाजपा और नरेन्द्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो पुराने सहयोगियों ने साथ दिया और नरेन्द्र मोदी भाजपा के नेता से एनडीए के नेता हो गये। दोनों सहयोगी मुख्यमंत्री की  छवि जनादेश के खिलाफ जाने की नहीं बने इसके लिए राज्य के स्वार्थ यानी विशेष पैकेज का मुद्दा आगे कर दिया गया। बिहार में तो विधानसभा चुनाव भी होने हैं। इसलिए यह नीतिश कुमार की राजनीतिक मजबूरी है। पर ऐसा होगा नहीं या मुश्किल है इसे बताना सहयोगी दलों की राजनीति का खुलासा होगा इसलिए यह खबर दूसरे अखबारों में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की दूसरी खबर दिल्ली के स्कूलों की है पर एक शीर्षक दिलचस्प है या कहिये कि लीक से हटकर है, इसलिए उल्लेखनीय है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं यहां वही दोनों खबरें एक साथ छपी हैं पर शीर्षक है, आंध्रप्रदेश में सहयोगी की सत्ता में वापसी और उड़ीशा में अपनी पार्टी की पहली सरकार के शपथग्रहण में शामिल हुए मोदी।

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