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साहित्य

गंभीर बनाम लोकप्रिय साहित्य की बहस हिंदी में होती कब थी?

राजशेखर त्रिपाठी-

जानकीपुल के संपादक प्रभात रंजन प्रभात रंजन की एक छोटी मगर अहम टीप के बहाने ये पाती लिखी। ये पत्र प्रभात को ही भेजा था मगर उनके यहां वाजिब जगह नहीं थी। मामूली लंबी है। पढ ले जाएंगे। प्रभात की टिप्पणी भी संलग्न है चाहे तो पहले वही देखें। तब पढें।

भाई प्रभात रंजन!

फेसबुक पर तुम्हारी एक छोटी सी भटकी हुई पोस्ट देखी। दरअसल इस त्रिशंकु समय में तुम एक अटकी हुई आत्मा हो। जिसे काबा छूट जाने की आशंका और कलीसे पहुंचने की ख़्वाहिश दोनों है। मास्टरी का ‘फरेबी ईमां’ तुम्हें रोकता है, और हँसते हिंदी साहित्य का कुफ़्र अपनी ओर खींचता है।

वर्ना ये न होता कि ‘जानकीपुल’ जैसा डिज़िटल साहित्यक मंच खड़ा कर देने वाला संपादक – ‘लोग क्या कहेंगे’ की फ़िक्र में दिखता!

भाई, तुम रचने की नयी एनर्जी से भरे जवानों की लगातार तलाश करते हो। इतनी मशक्कत के बाद क्या ये अहसास नहीं होता कि-

हमारा हिंदी साहित्य एक थका हुआ खांसता बूढ़ा है। एक सीलन भरा नीम अंधेरा कमरा है। कमरे में सिगरेट का धुंआ भरा है। जिसमें अकेला बैठा वो तमाम दुनिया को कोसता है। हालांकि हिंदी का साहित्य इतना बूढ़ा था नहीं – जितनी तेज़ी से बीते तीन दशकों में हुआ है।

खैर…साहित्य आजतक में संजीव पालीवाल के बहाने हर साल एक बहस छिड़ती है। फिर अपनी मौत मर जाती है। जिस ‘बाइनरी’ की बात तुमने हिचकते हुए कही, लो मैं वो और खुल के कह देता हूं। जो बुलाए जाते हैं उन्हें साहित्य का मेला लगता है, जो नहीं बुलाए जाते उन्हें दूसरों का कैरेक्टर ढीला दिखता है। कभी रजनीगंधा दिखता है, तो कभी उर्फ़ी जावेद दिखती है।

लेकिन अगर सचमुच कोई बाइनरी है तो वो है नयी ‘ऊर्जा से भरे जवानों’ और ‘पके हुए पुरानों’ की। विचारधारा की ‘आर्टीफीशियल लाइन’ तो लगातार ब्लर होती गयी और अब मिटने की कगार पर है- मगर मुश्किल ये है कि हमारा हिंदी साहित्य अब तक उसी अतीत में उदास है, हँस नहीं पा रहा।

तुम तो ‘बातों-बातों में‘ खुल कर खिलखिलाने वाले ‘बोहेमियन’ मनोहर श्याम जोशी के चेले हो। साहित्य के हँसने से मेरा आशय क्या है – बखूबी समझ रहे होगे!

अच्छा तुम्हीं बताओ, गंभीर बनाम लोकप्रिय साहित्य की बहस हिंदी में होती कब थी? ऐकेडमिक आडंबर के शिकार हिंदी साहित्य में गुलशन नंदा और रानू जैसों का नाम तो महादलितों की तरह लिया जाता था। भले घरों के बच्चों के हाथ में नॉवेल (यूं ही धिक्कारने का चलन था) बंक मार कर सिनेमा देखने, या सिगरेट तंबाकू के सेवन जैसा था। साहित्य की बेंत से समाज का संतुलन सधा हुआ था। ये हम सबने देखा है।

अरे साहब, नीरज को कवि और के पी सक्सेना को हास्य व्यंग्यकार मानने को लोग तैयार न थे। भला हो राजेन्द्र यादव का जिस आदमी ने हंस के संपादकीय में ‘गुलशन नंदा’ और ‘वर्दी वाला गुंडा’ की चर्चा की। उस चर्चा का अव्वल मकसद भी ‘लुगदी का बड़ा बाज़ार’ था, लेखक की लोकप्रियता दोयम।

तुमने कह तो दिया, कि लेखन के एक छाते के नीचे सारी किताबें आ गयी हैं। सभी की एक तरह की स्वीकार्यता है। मगर अपनी पोस्ट के जवाब में संपादक श्रेष्ठ ओम थानवी जी का जवाब पढ़ ही लिया होगा। शेक्सपियर को पढ़ते हुए वो शेक्सपियर के बराबर होते हैं। अब उतनी ऊंची पीठ से भला नीचे कौन आता है ? रहा बाज़ार और प्रचार का सवाल, तो ये सबसे ज़रूरी सवाल आज भी हिंदी के बड़े हलके में एक टैबू है। लाहौल पढ़िए जनाब, अब हिन्दी लेखक किताब लिखे भी और बेचे भी!

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