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काशी के घाटों पर पत्रकारों की होली का अनोखा रंगोत्सव

राजनीति के पेंच, प्रशासन की उलझनें और ब्रेकिंग न्यूज की भागदौड़—सब रंगों में घुलकर सरल हो गईं. किसी ने चुटकी ली—“आज हेडलाइन यही है”

सुरेश गांधी-

सुबह की पहली किरण जब माँ गंगा की लहरों पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, तब वाराणसी के घाटों पर एक अलग ही हलचल थी। यह सिर्फ होली का उत्सव नहीं था, यह शब्दों के साधकों—पत्रकारों—की मस्ती, मित्रता और मुक्त हँसी का महापर्व था। दशाश्वमेध घाट से लेकर अस्सी घाट तक रंगों की फुहारें उड़ रही थीं। कैमरे जो रोज़ सियासत की सख्त तस्वीरें कैद करते हैं, आज गुलाल की धुंध में मुस्कानों को सहेज रहे थे। माइक, जो आम दिनों में तीखे सवालों से गूंजते हैं, आज ठहाकों की गूंज से सराबोर थे।

कोई वरिष्ठ पत्रकार कनिष्ठ रिपोर्टर को अबीर लगाते हुए कह रहा था—“आज खबर नहीं, सिर्फ खुमार चलेगा!” तो कोई फोटो जर्नलिस्ट गंगा किनारे खड़े होकर रंगों में भीगी टोली की तस्वीरें उतारते-उतारते खुद ही रंगों का हिस्सा बन जा रहा था। भांग की हल्की ठंडाई, बनारसी गुझिया की मिठास और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच संवाददाताओं की टोली ने जैसे पूरे साल की थकान गंगा में विसर्जित कर दी। राजनीति के पेंच, प्रशासन की उलझनें और ब्रेकिंग न्यूज की भागदौड़—सब आज रंगों में घुलकर सरल हो गईं। किसी ने चुटकी ली—“आज हेडलाइन यही है—

‘पत्रकारों ने तोड़ी खबरों की दीवार, रंगों से लिखी दोस्ती की इबारत!’

घाटों की सीढ़ियों पर बैठकर पुरानी कवरेज के किस्से छिड़े। किसने किस मंत्री से तीखा सवाल पूछा, किस रिपोर्ट ने तहलका मचाया—सब पर हंसी के छींटे पड़ते रहे। पर आज किसी में प्रतिस्पर्धा नहीं थी, केवल अपनापन था। गंगा की लहरें भी जैसे मुस्कुरा रही थीं। काशी की फिज़ा में रचा-बसा यह रंगोत्सव बता रहा था कि पत्रकार भी इंसान हैं—संवेदनाओं से भरे, रिश्तों को संजोने वाले। शाम ढलते-ढलते जब रंग हल्के पड़ने लगे, तब भी मन के रंग गाढ़े हो चुके थे। विदा लेते हुए हर किसी के चेहरे पर यही भाव था— “कल फिर खबरों की दुनिया में लौटेंगे, पर आज की यह रंगभरी याद हमारी कलम को और जीवंत बना जाएगी।” काशी के घाटों पर पत्रकारों की यह होली सिर्फ उत्सव नहीं, एक संदेश थी— कि शब्दों की दुनिया में भी रंग जरूरी हैं, तभी तो रपट में भी राग रहेगा और खबर में भी खुशबू।

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