पटना। बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) के अध्यक्ष आईपीएस आलोक राज ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि उन्होंने आयोग के अध्यक्ष के रूप में सिर्फ दो दिन पहले ही कार्यभार संभाला था। इतनी कम अवधि में इस्तीफे से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की अटकलें तेज हो गई हैं।
आलोक राज के अचानक फैसले ने न केवल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भर्ती प्रक्रियाओं और आंतरिक दबावों को लेकर भी चर्चाओं को हवा दी है। फिलहाल उनके इस्तीफे के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने सरकार और प्रशासन दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है।
आलोक चिक्कू-
यह सिर्फ एक इस्तीफा नहीं है। यह सत्ता के चेहरे पर पड़ा वह तमाचा है, जिसकी गूंज देर-सबेर सुनाई देनी ही है। बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) के अध्यक्ष पद से आईपीएस अधिकारी आलोक राज का इस्तीफा, चाहे जितना निजी कारणों के मुलायम आवरण में लपेट दिया जाए, लेकिन परिस्थितियां साफ़ इशारा कर रही हैं कि यह कहानी वैसी नहीं है जैसी बताई जा रही है।
आलोक राज उन अफसरों में शुमार हैं, जो ईमानदारी को आदत नहीं बल्कि स्वभाव की तरह जीते हैं। न विवादों से नाता, न दबाव में फैसले बदलने की फितरत। उनकी पहचान एक ऐसे अफसर की रही है, जो कुर्सी से बड़ा सिस्टम को मानता है और सिस्टम से बड़ा संविधान को। यही वजह थी कि जब आरएस भट्टी के बाद उन्हें बिहार का डीजीपी बनाया गया, तभी से सवाल उठने लगे थे कि क्या पुलिस हेडक्वार्टर की लॉबी और राजनीतिक गलियारों की जमात आलोक राज जैसे अफसर को पचा पाएगी?
हुआ भी वही, जिसका अंदेशा था। महज तीन महीने में उन्हें डीजीपी पद से हटा दिया गया। यह अलग बात है कि आईपीएस विनय कुमार के रूप में बिहार को एक सक्षम डीजीपी मिला, लेकिन आलोक राज को हटाए जाने की कहानी तब भी कई सवाल छोड़ गई थी।
अब सवाल उनके BSSC अध्यक्ष पद से इस्तीफे का है। एक जनवरी को नियुक्ति होती है। यह मानना होगा कि यह फैसला यूं ही फाइलों में सरक गया होगा। मुख्यमंत्री आवास तक लंबी माथापच्ची हुई होगी, बहस हुई होगी, सहमति बनी होगी। खुद आलोक राज ने पद स्वीकार किया होगा। तब जाकर नियुक्ति पत्र निकला होगा। और फिर।
महज पांच दिन बाद निजी कारणों का हवाला देकर इस्तीफा। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक बेदाग अफसर, जो जीवन भर सिस्टम के भीतर रहकर लड़ता रहा, उसने अचानक कुर्सी को ठुकरा देना बेहतर समझा?
प्रशासनिक तंत्र से जुड़े सूत्र बताते हैं कि BSSC से जुड़ा एक संवेदनशील ठेका मामला सामने था। दबाव यह था कि किसी खास एजेंसी को हर हाल में कॉन्ट्रैक्ट दिया जाए। ऐसी एजेंसी जिसे अन्य राज्यों में ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था। मामला इतना हाई-प्रोफाइल था कि ना कहना आसान नहीं था। संकेत साफ़ थे, अगर फैसला मनमाफिक नहीं हुआ, तो आलोक राज के अब तक बेदाग करियर पर दाग लगाने में देर नहीं लगेगी। यही वह मोड़ था, जहां एक अफसर ने कुर्सी को नहीं, बल्कि पूरे तंत्र को आईना दिखा दिया। ईमानदारी से पुलिस की नौकरी करने वाले आलोक राज ने समझौते की कुर्सी पर बैठने के बजाय, कुर्सी को ठोकर मारना बेहतर समझा। लेकिन यह ठोकर सिर्फ एक पद को नहीं लगी।
यह तमाचा है सरकार के गाल पर। यह चोट है उस व्यवस्था पर, जिसे यह भ्रम हो चला है कि दुनिया में हर चीज़ की कीमत तय की जा सकती है। यह झटका है उस सोच को, जो मान बैठी है कि हर अफसर बिकाऊ होता है।
शायद सिस्टम यह भूल गया था कि इस कलयुग और भ्रष्ट युग में भी ऐसे अफसर मौजूद हैं, जिनके लिए ईमानदारी की रोटी ही पेट भरने के लिए काफी है और जिनके लिए आत्मसम्मान, किसी भी पद से कहीं बड़ा होता है।
इस इस्तीफे ने यह फिर से साबित किया है कि बिहार में भ्रष्टचार किस प्रकार फैला हुआ है और भ्रष्टाचारियों का किस कदर मजबूत पकड़ है कि एक IPS को इस्तीफा दिलवा दिया।
अमरेंद्र के किशोर-
आलोक राज और सत्ता का असली चेहरा
बिहार में आख़िर ऐसा क्या है कि खाकी के सामने सिस्टम बेचैन हो उठता है और उसे चलाने वाले नौकरशाह अचानक असहज हो जाते हैं? सवाल केवल वर्दी का नहीं, उस सत्ता-संरचना का है जो जवाबदेही से भागने के लिए अफ़सरों की ढाल तलाशती है।
आम दिनों में नौकरशाही पर भ्रष्टाचार, निष्क्रियता और मिलीभगत के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन जैसे ही कोई असाधारण घटना घटती है, वही नौकरशाही सवालों के घेरे में आकर चुप हो जाती है। यह चुप्पी संयोग नहीं, संकेत है—कि व्यवस्था कहीं भीतर से सड़ चुकी है और सच्चाई उसके लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गई है।
यह केवल एक इस्तीफ़ा नहीं है। यह बिहार की प्रशासनिक आत्मा में लगी दरार की आवाज़ है। आलोक राज का जाना किसी एक अफ़सर का हटना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का अनावरण है जहाँ सत्ता का असली केंद्र संविधान से खिसककर राजनीतिक जोड़-तोड़ में जा बैठा है। जिस राज्य में उपमुख्यमंत्री—एक असंवैधानिक पद—नीति, नियुक्ति और पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने लगे, वहाँ मुख्यमंत्री का पद धीरे-धीरे औपचारिकता में बदल जाता है। बिहार आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखता है।
भारतीय संविधान मुख्यमंत्री को राज्य की कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख मानता है। मंत्रिपरिषद उसी के नेतृत्व में चलती है, और प्रशासनिक निर्णयों की अंतिम जिम्मेदारी उसी पर होती है। लेकिन जब किसी राज्य में उपमुख्यमंत्री सत्ता के समानांतर केंद्र के रूप में उभरने लगे, तब यह केवल राजनीतिक असंतुलन नहीं, बल्कि संवैधानिक विचलन बन जाता है। बिहार में यही हो रहा है। उपमुख्यमंत्री का हस्तक्षेप अब पर्दे के पीछे नहीं रहा; वह खुलकर प्रशासनिक निर्णयों, पुलिस अधिकारियों की भूमिका और नीति-निर्धारण को प्रभावित करता दिख रहा है।
आलोक राज जैसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का इस्तीफ़ा इसी विचलन का परिणाम है। यह मान लेना भोलेपन होगा कि इतने अनुभवी अधिकारी ने किसी व्यक्तिगत कारण से पद छोड़ा। यह इस्तीफ़ा उस दबाव का संकेत है, जो अब ईमानदार अफ़सरों के लिए असहनीय होता जा रहा है। जब निर्णय क्षमता छीनी जाए, जब पेशेवर विवेक को राजनीतिक आदेशों के आगे झुकने को मजबूर किया जाए, तब प्रशासनिक सेवा केवल एक कठपुतली बनकर रह जाती है। आलोक राज ने उस कठपुतली बनने से इनकार किया।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह नहीं कि एक उपमुख्यमंत्री हस्तक्षेप कर रहा है, बल्कि यह है कि मुख्यमंत्री लाचार दिखाई देने लगे हैं। लोकतंत्र में लाचारी कोई निजी कमजोरी नहीं होती; यह सत्ता-संरचना की विफलता होती है। यदि मुख्यमंत्री अपनी ही सरकार में निर्णायक भूमिका निभाने में असमर्थ हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि राज्य वास्तव में चल कौन रहा है। क्या बिहार का शासन मुख्यमंत्री के हाथ में है या किसी राजनीतिक समझौते की अदृश्य शर्तों में बंधा हुआ है?
आलोक राज की नियुक्ति मुख्यमंत्री सचिवालय से हुई थी, लेकिन सत्ता ने शुरू से ही इसमें ज़हर घोल दिया। उपमुख्यमंत्री की आपत्ति कोई प्रशासनिक चिंता नहीं, बल्कि नियंत्रण की हठधर्मिता थी। हकीकत यह है कि ऐसी नियुक्तियों में उपमुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं होती—यह पाँच साल का तय कार्यकाल होता है और आलोक राज उसी अवधि के लिए लाए गए थे। लेकिन खेल तब शुरू हुआ जब उपमुख्यमंत्री की फरमाइश पर उन्हें “अगले आदेश तक” कर दिया गया। यह शब्द नहीं, खुली धमकी थी। एक अदृश्य फंदा, जो हर वक्त कसने को तैयार था। संदेश साफ था—राजनीतिक फरमाइशें मानो या कुर्सी छोड़ो। नौकरशाही सत्ता की इस चाल को भली-भांति समझती है। यहीं से टकराव गहराया और उसी साजिशनुमा व्यवस्था की स्वाभाविक परिणति बना आलोक राज का इस्तीफ़ा।
अब सवाल है संविधान में किसी उपमुख्यमंत्री की हैसियत का। क्या यह सच नहीं है कि ऐसा कोई पद न संविधान जानता है, न न्यायपालिका उसे कोई विशेष दर्जा देती है। फिर भी बिहार में यह पद वास्तविक सत्ता का केंद्र बनता जा रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक असहजता नहीं पैदा करती, बल्कि पूरे तंत्र को भ्रमित कर देती है। अफ़सर यह नहीं समझ पाते कि आदेश किसका मानें—संवैधानिक प्रमुख का या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली उपमुख्यमंत्री का। इस भ्रम का सीधा असर कानून-व्यवस्था, निष्पक्षता और निर्णयों की गुणवत्ता पर पड़ता है।
बिहार की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ सत्ता हमेशा संस्थाओं से ज्यादा व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन आज जो हो रहा है, वह उससे भी आगे है। यह संस्थागत पतन का संकेत है। जब उपमुख्यमंत्री पुलिस अफ़सरों की पोस्टिंग, तबादले और कार्रवाई में दख़ल देने लगें, तब यह केवल राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर सीधा आक्रमण है। आलोक राज का इस्तीफ़ा इसी आक्रमण के विरुद्ध एक मौन प्रतिरोध है।
ईमानदार अफ़सरों का हतोत्साहित होना किसी भी राज्य के लिए सबसे ख़तरनाक संकेत होता है। भ्रष्ट अधिकारी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठा लेते हैं; उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप से दिक्कत नहीं होती। दिक्कत होती है उन अफ़सरों को जो नियम, प्रक्रिया और संविधान को सर्वोपरि मानते हैं। जब ऐसे अफ़सर हटते हैं, तो सिस्टम में खालीपन नहीं आता, बल्कि डर भर जाता है। डर की ईमानदारी अब जोखिम है।
बिहार में आज वही डर फैल रहा है। प्रशासनिक गलियारों में यह संदेश जा चुका है कि स्वतंत्र निर्णय लेने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह संस्थाओं की स्वायत्तता से चलता है। जब संस्थाएँ राजनीतिक दबाव में घुटने टेक दें, तब लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है।
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मुख्यमंत्री इस हस्तक्षेप को रोक क्यों नहीं पा रहे। क्या यह गठबंधन की मजबूरी है? क्या सत्ता बचाए रखने की कीमत प्रशासनिक आत्मसमर्पण है? यदि हाँ, तो यह स्वीकार करना होगा कि बिहार की जनता ने जिसे शासन का जनादेश दिया था, वह किसी और के हाथों में चला गया है। यह स्थिति केवल मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग की नैतिक विफलता है।
आलोक राज का इस्तीफ़ा आने वाले समय का संकेत है। यदि हालात नहीं बदले, तो यह एक शुरुआत भर साबित होगा। इसके बाद या तो ईमानदार अफ़सर चुपचाप सिस्टम का हिस्सा बन जाएंगे, या फिर एक-एक करके बाहर होते जाएंगे। दोनों ही स्थितियाँ बिहार के लिए विनाशकारी हैं। पहला रास्ता भ्रष्टाचार को वैध बनाता है, दूसरा प्रशासन को खोखला कर देता है।
बिहार पहले ही विकास, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर संघर्षरत रहा है। ऐसे में प्रशासनिक अस्थिरता आग में घी डालने जैसा है। उपमुख्यमंत्री का बढ़ता हस्तक्षेप केवल सत्ता-साझेदारी का मामला नहीं रह गया है; यह राज्य के भविष्य का सवाल बन चुका है। यदि अभी भी इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो बिहार एक ऐसे दौर में प्रवेश करेगा जहाँ निर्णय तर्क से नहीं, ताक़त से होंगे।
यह समय आत्ममंथन का है। मुख्यमंत्री को तय करना होगा कि वे संवैधानिक प्रमुख बने रहना चाहते हैं या केवल नाममात्र का मुखिया। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि सत्ता का संतुलन प्रशासन को कुचलकर नहीं साधा जा सकता। और जनता को यह देखना होगा कि जिनसे उसने शासन की उम्मीद की थी, वे शासन चला भी पा रहे हैं या नहीं।
आलोक राज का इस्तीफ़ा एक चेतावनी है। इसे केवल एक व्यक्तिगत निर्णय मानकर टाल देना आत्मघाती होगा। यह उस सड़ांध की ओर इशारा करता है, जो धीरे-धीरे बिहार की प्रशासनिक नसों में फैल रही है। सवाल यह नहीं है कि एक अफ़सर क्यों गया; सवाल यह है कि क्या बिहार इस रास्ते पर आगे भी चलता रहेगा।



