प्रचारकों की, प्रचारकों द्वारा, प्रचारकों के लिए हो रही पत्रकारिता पर एक नजर

संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ अखबारों में से पांच – इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड एक ही है। शीर्षक कुछ अलग हैं उसे आगे देखेंगे। अंग्रेजी के अखबारों में सिर्फ एक, दि एशियन एज की लीड अलग है। इसका शीर्षक है, मोदी 20 जून से बिहार अभियान तेज करेंगे। यहां बैंगलोर हादसे के लिए की गई सरकारी कार्रवाई की खबर सेकेंड लीड है। यहां यह बताना जरूरी है कि आज एक खबर है, प्रधानमंत्री कटरा-श्रीनगर वंदे भारत ट्रेन का उद्घाटन करेगें। नवोदय टाइम्स ने इसे सेकेंड लीड बनाया है। मुख्य शीर्षक है, श्रीनगर तक रेल का सफर कल से। दि एशियन एज ने इस खबर को पांच कॉलम में छापा है। शीर्षक है, मोदी आज ऐतिहासिक जम्मू व कश्मीर रेल लिंक की शुरुआत करेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि खबर चाहे जितनी बड़ी और महत्वपूर्ण हो, सरकार का प्रचार है। 2014 से पहले ऐसी सरकारी खबरों के लिए पत्रकारों के दल को (प्रधानमंत्री के साथ विमान से भी) ले जाया जाता था। वे अपनी खबरें लिखते थे। बाद में बताया जाने लगा कि संबंधित रिपोर्टर सरकारी खर्चे पर या संबंधित कंपनी के सौजन्य से गया था। अब वह सब ताक पर है। ट्रोल सेना ने यह प्रचार किया था कि नरेन्द्र मोदी को पत्रकारों की जरूरत नहीं है इसलिए वे पत्रकारों को विदेश दौरे पर साथ नहीं ले जाते हैं। बाद में पता चला कि वे मित्र उद्योगपतियों को ले जाते रहे हैं। मिलवाने और ठेके दिलाने के काम भी हुए हैं। जो ढंग से खबर भी नहीं बनी जांच वांच तो भूल जाइये।
हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में बैंगलोर हादसे के लिए की गई वहां की सिंगल इंजन सरकार की कार्रवाई लीड नहीं है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राफेल का ढांचा होगा Made In India. अमर उजाला में भी यही खबर लीड है, अब भारत में ही बनेगा राफेल लड़ाकू विमान का मुख्य ढांचा। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों ही शीर्षक एक सरकारी प्रचार वाली खबर के लिए हैं और भले ही प्रचार के स्तर और उसकी गुणवत्ता में अंतर हो। कुल मिलाकर बैंगलोर में एक हादसा हुआ, राज्य सरकार ने उसपर कार्रवाई की है और अंग्रेजी के तमाम अखबारों ने उसे प्रमुखता दी है। हिन्दी वालों ने नहीं दी तो यह प्रसार क्षेत्र और घटना स्थल की भाषा का मामला हो सकता है पर हादसा क्रिकेट प्रेमियों के साथ हुआ है और क्रिकेट प्रेमियों में हिन्दी वाले कम नहीं होते। मामला राजनीति का है और उसमें तो हिन्दी ठूंस-ठूंस कर भरी है भले सिन्दूर की पुड़िया जैसा बिल्कुल नहीं है।
अमर उजाला ने इस लीड के बराबर में टॉप पर सिंगल कॉलम की खबर लगाई है और इसका शीर्षक है, मोदी ने पीएम आवास पर लगाया सिन्दूर का पौधा। इसकी नीचे प्रधानमंत्री की फोटो है जिसमें पेड़ लगाकर कुदाल से मिट्टी भर रहे हैं। इस खबर से प्रधानमंत्री की राजनीति और अमर उजाला की पत्रकारिता का पता चलता है। रोज सारी दुनिया कह रही है कि प्रधानमंत्री सिन्दूर की राजनीति कर रहे हैं और भले वे इससे वोट पा जायें लेकिन हिन्दू समाज में सिन्दूर का मामला सिर्फ पतियों तक सीमित होता है। प्रधानमंत्री अपनी राजनीति कर रहे हैं, करें अखबार को भ्रम फैलाने वाले संदेश फैलाने की क्या जरूरत है। वैसे भी, किसी हरे-भरे, अच्छे खासे, महंगे लॉन में सिन्दूर का पौधा लगाना राजनीति नहीं तो क्या है? क्या आपने कभी कहीं ऐसा देखा है, कभी सुना है? मैंने तो ना देखा ना सुना। जो भी हो, यह खबर तो है ही इसलिये इसे मैं गलत नहीं कर रहा और मैं सिर्फ अमर उजाला के संपादकीय निर्णय को रेखांकित कर रहा हूं, उसपर अपनी राय रख रहा हूं। मुझे अमर उजाला की इस स्वतंत्रता और उसके उपयोग से कोई दिक्कत नहीं है और ना मैं उसका किसी भी तरह विरोध कर रहा हूं। उसे ईनाम मिले तो भी मैं विरोध नहीं करूंगा। रेखांकित जरूर करूंगा।
बैंगलोर का मामला आप जानते होंगे। आईपीएल की नई चैंपियन आरसीबी टीम के जश्न में बेंगलुरु में लोगों की काफी भीड़ जमा हो गई। इस वजह से वहां चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भगदड़ मच गई। इसमें कई लोग मारे गए थे। यह अलग बात है कि हादसे के तुरंत बाद पुलिस ने रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन के खिलाफ गैर इरादतन हत्या की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली थी। खबरों के अनुसार भारी भीड़, कम पुलिस फोर्स, मोबाइल जैमर और अव्यवस्था पांच बड़े कारण हैं जो इस हादसे की वजह बने। यह खबर खूब प्रमुखता से छपी थी और मैंने अपनी टिप्पणी में इसकी चर्चा नहीं की। सच्चाई यह है कि कुम्भ तो छोड़िये, नई दिल्ली स्टेशन पर हादसे में कितने लोग मरे इसकी जानकारी आधिकारिक तौर पर नहीं दी गई है और हंगामा न मचे इसलिये रेलवे ने पहली बार नकद मुआवजा बांटा। बाद में लोगों ने कहा कि मुआवजे की भारी राशि का पता होता तो वे भगदड़ में मरना पसंद करते। जो भी हो, सच्चाई यह है कि भाजपा राज में हादसों की जांच तो छोड़िये, खबर भी नहीं दी जाती है लेकिन दूसरी जगह कोई हादसा हो जाये तो भाजपा के लोग इस्तीफा मांगने लगते हैं। गलती उनकी है भी नहीं सिर्फ निन्दा और कड़ी निन्दा करने वाले लोग कह चुके हैं कि उनके यहां इस्तीफे नहीं होते। लेकिन अखबार? उनकी निष्पक्षता कहां चली जाती है? या इसका हिसाब कौन रखता है? कांग्रेस के जमाने में सरकारी समाचार चैनलों से भी निष्पक्षता की उम्मीद की जाती थी और वे अभी के निजी चैनलों की तरह पक्षपाती नहीं हो पाये। अभी के सरकारी चैनलों का हाल मैं नहीं जानता क्योंकि देखता ही नहीं और जब निजी चैनल देखने लायक नहीं है तो सरकारी से क्या उम्मीद।
आइये, शीर्षक से आज की खबर पहले जान लें। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, मुख्यमंत्री ने पुलिस प्रमुख को निलंबत किया, न्यायिक जांच के आदेश दिये; पुलिस ने आरसीबी, राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के खिलाफ मामला दर्ज किया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, स्टेडियम में हुई मौतों के लिए आरसीबी के खिलाफ एफआईआर, बैंगलोर के पुलिस प्रमुख निलंबित। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, बैंगलोर की मौतें : आरसीबी, अन्य के खिलाफ मामला, सर्वोच्च पुलिस अधिकारी निलंबित। द हिन्दू का शीर्षक है, बैंगलोर के पुलिस प्रमुख बाहर; आरसीबी के खिलाफ एफआईआर दर्ज। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, आरसीबी के खिलाफ गिरफ्तारी आदेश फ्लैग शीर्षक है, भगदड़ के लिए टीम पर एफआईआर, जिनके खिलाफ कार्रवाई हुई उनमें पुलिस प्रमुख और अब दि एशियन एज का शीर्षक जो लीड नहीं है, भगदड़ को लेकर आरसीबी, केएससीए के खिलाफ एफआईआर। इससे स्पष्ट है कि भगदड़ मची, मौतें हुईं तो कार्रवाई भी हुई है और समय से हुई है। भाजपा राज्यों में ऐसा हुआ हो उसका कोई उदाहरण याद नहीं आता है। वह मुद्दा नहीं है पर हादसे के बाद मुख्यमंत्री इस्तीफा देकर पल्ला झाड़ सकते थे। पर तब क्या ऐसी कार्रवाई होती? किसके खिलाफ होती और कौन करता?
जो स्थितियां हैं उनमें मुख्यमंत्री इस्तीफा दें और सरकार गिर जाये (पहले गिराई जा चुकी है) से बेहतर और जरूरी है कि मुख्यमंत्री कार्रवाई करें और मिसाल कायम करें जो इस मामले में हुआ है। फिर भी भाजपा नेता, खासकर संबित पात्रा ने सवाल उठाये हैं। हालांकि यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन, ‘कर्नाटक हादसे पर भाजपा’ गूगल करने पर एनडीटीवी से लेकर दैनिक जागरण, अमर उजाला, एबीपी न्यूज से लेकर इकनोमिक टाइम्स और डेक्कल हेराल्ड की खबर है, बेंगलुरू भगदड़: भाजपा ने सीएम सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम शिवकुमार से इस्तीफा मांगा। भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि यह राज्य सरकार द्वारा निर्मित भगदड़ थी। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से इस दुखद घटना पर अपनी चुप्पी तोड़ने को कहा। आप जानते हैं कि संबित पात्रा भाजपा के तेज-तर्रार प्रवक्ता है। उनके जवाब में कांग्रेस से जुड़ने वाले प्रोफेसर गौरव बल्लभ ने पात्रा से पूछ दिया था कि ट्रिलियन में कितने शून्य होते हैं तो पात्रा कैसे परेशान हो गये थे। बेशक यह सवाल गौरव बल्लभ ही कर सकते थे और संभव है उनकी इसी योग्यता के कारण भाजपा ने उन्हें अपने पाले में कर लिया है पर सवाल मुश्किल नहीं था (पूछने का अंदाज परेशान करने वाला हो सकता है)। इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार…. तो बचपन में ही पढ़ा दिया गया था और यूनिट्स, टेन्स, हंड्रेड्स, थाउंजैंड्स …. तो हिन्दी मीडियम में पढ़कर पता है। पर पात्रा चित्त हो गये थे। पर वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। मैं यह बताना चाहता हूं कि उसी संबित पात्रा ने कल जो ‘मांग’ की थी वह अमर उजाला के अनुसार, बंगलूरू भगदड़ पर भाजपा ने कांग्रेस से पूछे तीखे सवाल, अल्लू अर्जुन विवाद का भी किया जिक्र। खबर के अनुसार पात्रा ने कहा था, जब अल्लू अर्जुन की फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान भगदड़ मची, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। अल्लू अर्जुन की गिरफ्तारी के उसी सिद्धांत पर क्या डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया को भी गिरफ्तार किया जाएगा?’
एबीपी न्यूज के अनुसार, “बीजेपी ने इस घटना को ‘सरकारी विफलता’ और ‘राजनीतिक लालसा’ का नतीजा करार दिया है। बीजेपी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, “यह केवल भगदड़ नहीं थी, बल्कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की आपसी खींचतान से पैदा हुई एक सरकार-निर्मित त्रासदी थी।” भाजपा और पात्रा की इस मांग का जवाब भूपेश बघेल ने दिया। देशबन्धु की रिपोर्ट के अनुसार, भूपेश बघेल ने जाति जनगणना, डीएपी संकट और बेंगलुरु हादसे पर भाजपा को घेरा, संबित पात्रा को ‘मानसिक रूप से पैदल’ बताया। मैंने यहां बताया था कि जनगणना का जो काम 2021 में पूरा हो जाना चाहिये था वह 2027 में पूरा होगा और कल कई अखबारों ने उसे ऐसे पेश किया था जैसे सरकार ने रूटीन काम समय से कर दिया हो या इतना बड़ा काम करने की घोषणा करके कोई बहादुरी की हो। आप जानते हैं कि जनगणना के साथ जाति जनगणना भी होनी है। जो भी हो, उसके बारे में कल बघेल ने कहा, इस पर तभी विश्वास किया जाना चाहिए जब इसकी वास्तविक शुरुआत हो। जनगणना के तुरंत बाद न तो रिपोर्ट आएगी और न ही एक झटके में परिसीमन हो सकेगा। पहले केंद्र सरकार को परिसीमन आयोग बनाना होगा, फिर राज्यों के साथ बैठकें होंगी, उसके बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। 2026 से जनगणना और परिसीमन की बात की जा रही है, लेकिन अगर जनगणना में देरी हुई तो परिसीमन भी खटाई में पड़ जाएगा।”
मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरी चिन्ता यह है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगा और वह खबर बनी। भाजपा खुद क्या करती है, कैसे कर रही है इसपर सवाल नहीं पूछे गये। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रियों को जेल में रखा उन्हें अपना काम करने के लिए परेशान किया और कर रही है। इस प्रक्रिया में आम आदमी पार्टी को इतना बदनाम किया गया कि मतदाता सूची में गड़बड़ी करके तमाम संवैधानिक संस्थाओं की नाक के नीचे आम आदमी को हरा दिया। इसका नतीजा यह होगा कि अच्छे लोग राजनीति में आने से डरेंगे। राजनीति में वही आयेगा जिसे भाजपा लायेगी चाहे वह जज हो या आईएएस। अपराधियों की बात ही नहीं है। ऐसे लोग सुरक्षा और ईनाम के लालच में आयेंगे, ब्लैक मेल किये जा सकेगें और इसका असर देश की राजनीति की गुणवत्ता पर पड़ेगा या पड़ ही रहा है। यह सब अखबारों और पत्रकारों को नहीं समझ में आ रहा है तो उसका कारण है और यह कारण भाजपा की रणनीति व कौशल है। जहां तक भाजपा समर्थक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की बात है, डबल इंजन वाले राज्यों में ऐसा हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं हुआ है।
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी विशेष खबर में (पेज 9) पर बताया है (पेज 1 पर प्रकाशित सूचना के अनुसार) कि मरने वालों में स्कूली छात्रा से लेकर इंजीनियरिंग के छात्र तक थे। शीर्षक है, मैं 50 लाख रुपये दूंगा क्या वे मेरे बेटे को वापस ला सकते हैं? सवाल सही है और इसका जवाब जरूरी है। यह उन लोगों के लिए जरूरी है जो समझते हैं कि मुआवाजा दे दिया काम हो गया। पर मुद्दा यह भी है कि कुम्भ में मरने वालों के लिए बाबा बागेश्वर ने क्या कहा था। आपको याद होगा, संगम पर कोई मरा नहीं है, मोक्ष मिला है…। कैसा मोक्ष? मोक्षमिला यह पता कैसे चलता है और चल जाये तो क्या दुख कम हो जाता है?नवभारत टाइम्स के अनुसार उन्होंने कहा था, ये महाप्रयाग है, मृत्यु सबकी आनी है। एक दिन मरना सबको है। लेकिन कोई गंगा के किनारे मरेगा तो उसे मोक्ष मिलेगा। उन्होंने आगे कहा कि यहां मरा नहीं है कोई, असमय चले गए तो दुख है। पर जाना तो सबको है। ये बात तय है कि कोई 20 साल बाद जाएगा तो कोई 30 साल बाद जाएगा। लेकिन जो लोग भगदड़ में मरे हैं उनको मोक्ष मिला है। तब इसे बेतुका बयान जरूर कहा गया था लेकिन सामाजिक तौर पर इसका विरोध नहीं हुआ था और व्यवस्था व सुविधाओं की बात नहीं हुई। सच्चाई यह है कि मरने वालों की सही संख्या भी नहीं बताई गई। अब यह खबर छप रही है तो यह अंतर डबल और सिंगल इंजन की सरकार के कारण है या मरने वालों के प्रोफाइल के कारण? अंतर यह भी लगता है कि तब लोगों के माता-पिता मरे थे और अब लोगों के बच्चे मरे हैं।
प्रधानमंत्री आतंकवाद खत्म करने के नाम पर 2019 में ‘घुस कर मारूंगा’ कह रहे थे। बालाकोट में 300 आतंकियों को मारने का दावा किया था और जम्मू कश्मीर विधान सभा चुनाव के समय यह प्रचार किया गया कि आतंकवाद खत्म हो गया है। फिर भी पहलगाम हो गया और एक आतंकी ने कहा, मोदी को बता देना तो ऑपरेशन सिन्दूर और उसके नाम पर पाकिस्तान से युद्ध हो गया। वह न सिर्फ अचानक खत्म हो गया बल्कि ‘अबकी बार ट्रम्प’ वाले अमेरिकी डोनल्ड ट्रम्प ने कई बार दावा किया है कि युद्ध विराम उन्होंने कराया है और सरकार उसके बारे में बताने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की बजाय मानसून सत्र की घोषणा समय से पहले करके मांग पूरी कर चुकी है। इस बीच ऑपरेशन सिन्दूर के प्रचार के लिए सफल-असफल रोड शो हुए हैं और इससे आप समझ सकते हैं कि आतंकवाद खत्म करने के प्रति सरकार और उसकी रणनीति कितनी गंभीर है। हालांकि मेरी चिन्ता वह नहीं है। मैं परेशान होता हूं कि मीडिया वालों को यह सब समझ नहीं आ रहा है या दिख नहीं रहा है या सब जानते समझते हुए वे तुष्टिकरण का विरोध और संतुष्टिकरण करने वाले का साथ दे रहे हैं। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री यह कह चुके हैं कि, तुष्टिकरण की राजनीति ने देश को टुकड़ों-टुकड़ों में बांटा है, इसलिए मोदी ने संतुष्टिकरण के रास्ते को अपनाया है। ऐसे में आज दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में छपी एक खबर के अनुसार पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने कहा है कि पाकिस्तान की आईएसआई और भारत के रॉ को मिलकर आतंकवाद से लड़ना चाहिये। यह खबर मुझे आज किसी अन्य अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी।



