चंद्र भूषण-
सूचनाओं की तह में जाने वाले लेकिन भड़कीले नतीजे निकालने से परहेज करने वाले किसी एक संपादक का चेहरा जेहन में बनाने को कहा जाए तो मुझे सबसे पहले मधुसूदन आनंद ही याद आएंगे। अपनी बनावट में वे पूरी तरह टाइम्स स्कूल की उपज थे और यह बात केवल 1974 में प्राप्त किए गए उनके प्रशिक्षण तक सीमित नहीं थी। कोई भी खबर, कोई भी एडिटोरियल लाइन सारा आगा-पीछा सोचकर ही सार्वजनिक की जानी चाहिए, यह बात उनके संस्कार में शामिल हो गई थी।

इस चीज ने उन्हें राजनीतिक अस्थिरता के दौर में नवभारत टाइम्स का नेतृत्व संभालने की अर्हता प्रदान की, जब केंद्र में हर एक-दो साल में सरकारें बन-बिगड़ रही थीं। मेरी मुलाकात उनसे इसी दौर में एक टीवी स्टूडियो में हुई थी, जहां वे एक फौरी एंकर की तरह बैठे हुए थे। उनके साथ काम करने का मौका इसके दस साल बाद मिला।
उन्होंने कहानियां और कविताएं लिखीं और कुछ समय तक एक साहित्यिक पत्रिका का संपादन भी किया, लेकिन उनके इस पक्ष से मेरी कोई निकटता कभी नहीं बन पाई। पढ़ने वाले इन रचनाओं को इनमें आए सहज जीवन अनुभवों के लिए याद करते हैं। इसके बजाय जर्मन रेडियो और वॉयस ऑफ अमेरिका के साथ काम करने का उनका तजुर्बा हमारे लिए हमेशा दृष्टि देने वाला साबित हुआ।
इजरायल-फिलिस्तीन समस्या हो चाहे ताइवान का मामला, मधुसूदन आनंद जी से बात करने पर इनके इतिहास-भूगोल में सदेह टहल आने जैसा एहसास होता था। अनुभव से हासिल यह बड़प्पन ही उन्हें संपादक पद को बहुत आराम से लेकर चलने लायक बनाता था। न वह खुद संपादकी का ज्यादा लोड लेते थे, न ही अपने रिपोर्टरों और डेस्क हैंड्स को ऐसा कोई लोड देते थे।
कम तनाव वाली यह दृष्टि और ऐसा जीवन पिछले बीस वर्षों में पत्रकार प्रजाति की पहुंच से बाहर होता गया है, और उसमें भी नेतृत्व वर्ग के लिए तो सपना ही हो गया है। मधुसूदन आनंद जी न केवल अपने जीवन की सहज लय का अपनी पत्रकारिता के साथ निबाह कर ले गए, बल्कि इधर कुछ समय से उतने सक्रिय न रहने के बावजूद मृत्युपर्यंत बतौर संपादक अपनी सार्वजनिक छवि को न धुंधला होने दिया, न ही उसपर कोई खरोंच पड़ने दी।
मूल खबर…
नवभारत टाइम्स के संपादक रहे मधुसूदन आनंद का निधन


