गोविंद सिंह-
कथाकार और नवभारत टाइम्स के संपादक रहे मधुसूदन आनंद नहीं रहे। वे नजीबाबाद के मूल निवासी थे। मधुसूदन आनंद नवभारत टाइम्स में हमारे अग्रज थे। अभी अभी विष्णु नागर जी के फेसबुक वाल से पता चला कि वे नहीं रहे। बड़ी हृदय विदारक सूचना है।
मुझ से दो चार साल ही बड़े थे। साहित्य, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय विषयों में उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने नवभारत टाइम्स से अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत की। कुछ समय जर्मनी के रेडियो डॉयचे वेले में रहे। थोड़े समय के लिए जागरण दिल्ली के संपादक रहे।
कुछ साल पहले नवभारत टाइम्स से रिटायर होने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय का संपादन कर रहे थे। कोई साल भर पहले हम उनसे मिलने उनके घर गए। उनका स्वास्थ्य थोड़ा कमजोर लगा। मिलकर बहुत खुश हुए।
उन जैसे शालीन स्वभाव वाले अग्रज का असमय चले जाना वाकई कष्टकारी है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और आदरणीया ज्योत्सना जी को दुःख की इस घड़ी से उबरने की ताकत दे।
अरे बहुत दुखद ख़बर। गहरे सदमे की तरह। जल्दी चले गए। शानदार और प्यारे इनसान और दोस्त बिछड़ते जा रहे हैं। यह ज़रूर था कि अब मिलना कम से कम था। सभा, समारोहों में और फ़ेसबुक में कभी कभार । लेकिन आईटीओ के दिनों का मेलमिलाप और सघन आत्मीयता से हमेशा प्रकाश और ऊष्मा मिलती रही और मिलती रहेगी। उनकी सौम्य, शालीन व स्नेही छवि कभी भूलेगी नहीं। उनके परिवार के साथ हार्दिक सम्वेदना। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
-मनोहर नायक
बहुत गम हुआ मधुसूदन आनंद साहब के गमन को लेकर।
नब्बे के दशक में रात को वाॅयस ऑफ अमेरिका की हिन्दी सेवा में भारत की महत्वपूर्ण खबरों के लिए उनकी विशेष रिपोर्ट को प्रसारित किया जाता था।
बहुत अफसोस हुआ उनकी मृत्यु को जानकर।
अब ऐसे निष्ठावान संपादक रहे कहाँ?
ओम शांति।-भूपेंद्र कुमार
दु:खद। अच्छे कहानीकार, अच्छे इन्सान, बेहद योग्य सम्पादक, ख़ास बात यह कि कभी फ्लॉर पर किसी भी अधीनस्थ की किसी कमी के बारे में बात नहीं करते थे। कुछ बात है तो अपने कक्ष में अकेले में कहते थे।
-धीरेश सैनी
ओह! उनके साथ काम करते हुए कभी नहीं लगा कि वे हमारे बॉस हैं। यही लगा कि वे हमारे बड़े भाई की तरह हैं। वे हमेशा प्रोत्साहित करते रहे। नवभारत टाइम्स से निकलने के बाद वे नया ज्ञानोदय में आए। उसके बाद भी उनका स्नेह मिलता रहा। अब ऐसा संपादक होना असंभव है। विनम्र श्रद्धांजलि।
-संजय कुंदन
अत्यंत दुखद समाचार। आनंद जी का जाना मेरे सर से बड़े भाई का स्नेहिल हाथ चले जाने के बराबर है। उन्होंने न केवल मुझे खूब लिखने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि नवभारत टाइम्स के NCR एडिटर के तौर पर नियुक्त कर मुझपर जो भरोसा जताया, उसके लिए सदैव आभारी रहूंगा। विनम्र श्रद्धांजलि!
-अभय किशोर



adarsh prakash singh
February 19, 2026 at 5:22 am
आनंद जी के साथ पहली बार नवभारत टाइम्स लखनऊ में काम करने का मौका मिला था . वह १९९३ का समय था . वह हमारे रेजिडेंट एडिटर थे . बहुत ही सज्जन इन्सान थे . फिर नयी दुनिया के दिल्ली ऑफिस में उनके साथ कम किया . वह २००९ का समय था .मधुसुदन आनंद जी को मेरी विनम्र श्रदांजलि . ॐ शांति