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साहित्य

मैं वीगन क्यों हूँ!

सुशोभित-

नमस्कार, जीवदया और शाकाहार पर एकाग्र मेरी प्रतीक्षित पुस्तक अब प्रकाशित होकर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है! भगत सिंह की प्रसिद्ध किताब ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ की तर्ज़ पर इसका शीर्षक ‘मैं वीगन क्यों हूँ’ रखा गया है। लेकिन यहाँ ‘मेरे’ वीगन होने का इतना महत्त्व नहीं है, जितना कि इस बात का है कि कोई भी वीगन क्यों होता है या किसी को भी वीगन क्यों होना चाहिए।

इस ‘वीगन’ शब्द से धोखे में न आएँ। यह कोई विदेशी, आयातित या फ़ैशनेबल विचार नहीं है। वीगन होने का कुलजमा इतना ही अर्थ होता है कि मैं अपना जीवन इस तरह से कैसे व्यतीत करूँ कि उससे किसी अन्य जीवित प्राणी को कष्ट या पर्यावरण को क्षति न हो। आप ही बतलाइये- नैतिकता, शुचिता, संकल्प और आत्मत्याग की आभा से दीप्त यह विचार क्या विलायती है? क्या भारत में इस परम्परा की जड़ें नहीं हैं? ऐसा कहकर तो हम अपनी परम्परा को अवमूल्यित ही करेंगे कि ऐसे सुंदर और उदात्त विचार हमारे लिए पराये हैं।

मैं तो कहूँगा, इस तरह से जीवन व्यतीत करने का प्रण ही आज इकलौता धर्म है। आप भले किसी धर्म को न मानें, किन्तु प्राणियों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी हों, तो इतने भर से आप धर्मप्राण कहलाने के सुपात्र होंगे!

पशु-पक्षियों के जीवन की अस्मिता, और अस्मिता के साथ जीवित रहने के उनके अधिकार पर यह पुस्तक वर्षों से लिखी जा रही थी। कोई शताधिक लेख इस कड़ी में लिखे गए। उन लेखों में व्यक्त श्रेष्ठ, मार्मिक और प्रासंगिक विचारों को एक तारतम्य में गूँथकर, सम्पादकीय-विवेक के आलोक में सँजोकर यह पुस्तक रची गई है। यह एक महत्त्वपूर्ण नैतिक हस्तक्षेप करती है। यह पूरे बल से कहती है कि “मांसाहार या शाकाहार का प्रश्न खानपान या जीवन-शैली का नहीं, बल्कि जीवहत्या या जीवदया का प्रश्न है!” कोई भी ऐसा नैतिक, न्यायप्रिय और सत्यनिष्ठ व्यक्ति नहीं हो सकता, जो जीवहत्या को जीवदया से अधिक महत्त्व देता हो। जीवदया इस परिप्रेक्ष्य में हमेशा नैतिक रूप से बाध्यकारी होगी, जैसे संविधान के नियम सभी पर समान रूप से उनकी रुचि-अरुचि के बावजूद लागू होते हैं।

इस तरह से यह किताब मांसाहार-शाकाहार पर चलने वाली बहस को सिरे से उलटकर उसमें एक नैतिक अनुक्रम स्थापित करती है और उसके सम्यक् परिप्रेक्ष्यों को आलोकित करती है। वो यह भी बताती है कि मांसाहार धार्मिक आस्था और निजी चयन का नहीं, हिंसा और क्रूरता का विषय है और आप इससे कोई बहाना बनाकर नज़रें नहीं फेर सकते।

हिन्दी में शाकाहार-जीवदया आदि पर पुस्तकें होंगी, पर वीगनिज़्म के दार्शनिक-सिद्धांतों का निरूपण करने वाली यह पहली पुस्तक है। वीगनिज़्म में अहिंसा के विचार को शाकाहार से भी सूक्ष्म-स्तर पर अपने व्यक्तित्व में व्यवहृत किया जाता है, उस पर विस्तृत चर्चा पुस्तक में की गई है। पुस्तक का एक पूरा खण्ड मांसाहारियों द्वारा अपने पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों के अकाट्य खण्डन पर केंद्रित है। हर कोण से, और वैज्ञानिक रीति से उनके कुतर्कों का उन्मूलन कर दिया गया है। पुस्तक का एक अन्य खण्ड जीवदया के अध्यात्म पर है। एक खण्ड गायों, हाथियों, पक्षियों, मछलियों, साँपों जैसे प्राणियों के विशिष्ट व्यक्तित्वों पर है। एक में भारत में बढ़ते मांसाहार की कुवृत्ति पर विभिन्न दृष्टियों से विवेचना की गई है। एक खण्ड मनुष्य में करुणा के भाव को पुकारता है।

‘पशु’ शब्द की उत्पत्ति ‘पाश’ से हुई है। पाश यानी फंदा या बेड़ी या बंधन। सच में ही आज पशु मनुष्य की उपभोग-शृंखला के पाश में फँस चुके हैं और वे मदद के लिए चीत्कार कर रहे हैं। चूँकि वो ख़ुद अपने लिए बोल नहीं सकते- इसलिए यह किताब उनकी आवाज़ बनकर सामने आई है। इस आवाज़ को आपको सुनना ही होगा- अगर आप न्याय, नैतिकता और अहिंसा के लिए प्रतिबद्ध हैं!

यह पुस्तक पाठकों के नैतिक-आध्यात्मिक स्तर को उठाते हुए उन्हें जीवदया के संकल्प के लिए प्रेरित करेगी- लेखक को इसमें संदेह नहीं है! इसे मैं अहिंसा के एक प्रस्ताव की तरह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेरी दृष्टि में यह एक व्यावसायिक कृति नहीं, बल्कि लोकहितार्थ किया गया एक पुण्यशाली हस्तक्षेप है। यह ‘कमाई’ के लिए नहीं, ‘भलाई’ के लिए है, इसीलिए मैं पाठकों से आग्रह करूँगा कि इसे अधिक से अधिक संख्या में क्रय करके पढ़ें, अपने बच्चों को पढ़ाकर उनमें प्राणियों के प्रति संवेदना विकसित करें और अपने मित्रों को भी भेंट करें।

पुस्तक का सुरुचिपूर्ण आकल्पन और सत्वर प्रकाशन Hind Yugm Prakashan ने किया है, इसके लिए मैं Shailesh Bharatwasi जी और Vijendra S Vij जी का आभारी हूँ।

पुस्तक के आमुख पर गोमाता का रेखाचित्र है। मनुष्यों के नीचे की जो गूँगी दुनिया है, गाय उसकी प्रतिनिधि प्राणमूर्ति है। उसका दूध हमने पीया है, इसलिए वह हमारी माँ है। उसकी सेवा करना, उसके आर्तनाद को सुनना, उसे उसके बच्चों से अलग नहीं करना हमारा धर्म है, कर्तव्य है। इसी भावना के साथ।

किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है. ये रहा लिंक- मैं वीगन क्यों हूँ

सुशोभित
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