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वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा का घोर अपमान, कुलपति की हरकत से छिड़ा विवाद!

आशुतोष कुमार-

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति की बर्खास्तगी की मांग के विषय में मैं लेखकों द्वारा दिए गए इस ज्ञापन का पूरा समर्थन करता हूं। इस ज्ञापन को नत्थी करते हुए मैंने स्वयं भी इस मांग के समर्थन में राज्यपाल महोदय के पास एक मेल भेज दिया है। आप सभी लेखकों, पाठकों और जिम्मेदार नागरिकों से अपील है कि वे इस ज्ञापन को लगातार राज्यपाल महोदय के पास भेजते रहें।


अजय कुमार सिंह-

इस कुलपति के साथ-साथ उन लोगों की भी भर्त्सना की जानी चाहिए जो कथाकार Manoj Rupda के प्रति अपमानजनक वक्तव्य के बाद उस कार्यक्रम में बैठे रह गए थे। उनके नाम सार्वजनिक किया जाना चाहिए और उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। यह बात सिर्फ हिन्दी के लेखकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए हिन्दी के पाठकों को भी हिन्दी के लेखकों की गरिमा पर किए गए आघात का प्रतिकार करना चाहिए।


वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के घोर अपमान और उन्हें सभागार से बाहर निकाले जाने के बाद भी जो साहित्यकार और पत्रकार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग के कार्यक्रम में बैठे रहे, उन पर लानत भेजता हूं। – राजेश चंद्र


विश्वजीत वैभव-

बेहद शर्मनाक एवं अक्षम्य हरकत, साहित्यकार मनोज रूपड़ा के साथ छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति द्वारा किया गया है, जिसे पढ़ और यूट्यूब पर देख कर मन व्यथित है!

दरअसल कुलपति ने भाषण के क्रम में कहा कि मैं आप लोगों को बोर तो नहीं कर रहा? आगे की पंक्ति में बैठे अतिथि लेखक मनोज रूपड़ा ने इतना भर कहा कि विषय पर बोला जाय…इसके बाद कुलपति क्रोधित हो गए. उनका नाम पूछा और फिर कहा आप में वीसी से कैसे बात की जाय इसका विवेक नहीं है. वीसी ने उपस्थित आयोजकों से यह भी पूछा कि किसने इन्हें बुलाया. फिर कहा आप बाहर जाइए… इन्हें कभी नहीं बुलाना है… निकलिए, तुरंत निकलिए यहाँ से… और बाहर करा दिया… !

कल्पना कीजिए कि मोदी सरकार में कैसे-कैसे अनपढ़, अयोग्य एवं मवालियों को कुलपति बनाया जा रहा है…!


संजीव चंदन-

यह सच है कि मनोज रुपडा का अपमान हुआ। उन्हें हॉल से बाहर कर दिया गया। बिलासपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल कुम्हार हैं जाति से। ओबीसी हैं, बिहार में अति पिछड़ा। बोलते वक्त किसी महान साहित्यकार द्वारा उन्हें विषय से विमुख बताना उनका अपमान हो नहीं सकता क्योंकि वे तो ओबीसी हैं। वे किसी का अपमान भी नहीं कर सकते, क्योंकि वह व्यक्तिगत से ज्यादा सामूहिक अपमान हो जायेगा।

अपमान तो अशोक वाजपेई का हो सकता है, ब्राह्मण का हो सकता है या अशोक वाजपेई दूसरों का अपमान कर सकते हैं, उनका किया गया सामूहिक अपमान भी किसी का अपमान नहीं हो सकता। मनोज रुपडा व्यवसाई हैं अच्छे, कथाकार भी अच्छे हैं, उनका अपमान सामूहिक अपमान होना ही चाहिए।

इसके पहले न तो किसी का अपमान हुआ है और न ही साहित्य में कुछ अप्रिय घटा है। साहित्य अकादमी की महिला कर्मी के साथ वाला अप्रिय भी नहीं। नया ज्ञानोदय जैसी पत्रिकाओं द्वारा भी नहीं। तो हे आहत साहित्यकारों, एक काम करिए, जबतक बिलासपुर विश्वविद्यालय इस घटना के लिए माफी न मांग ले आप किसी भी केंद्रीय संस्थान में न जाने की, उनके बहिष्कार की घोषणा करिए।

हे आहत साहित्यकारों, जरा साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों, पुरस्कारों का बहिष्कार कीजिए, तबतक जबतक साहित्य अकादमी कुलपति के खिलाफ निंदा प्रस्ताव न लाए और पारदर्शी ऐक्शन न सुनिश्चित कराए। पिक एंड चूज अपमान या प्रगतिशीलता आपको अच्छा लग सकता है, सबको क्यों लगेगा भला?

यह आखिरी पोस्ट है इस प्रसंग में, अन्यथा तो सोचने के लिए सबरीमाला के खिलाफ होने वाली सुप्रीम सुनवाई है, सोमनाथ मंदिर का वितंडा है, और भी गम हैं जमाने में महानुभावों के सेलेक्टिव अपमान के सिवा!


मनीष सिंह-

लेखक का अपमान हो गया। आसमान टूट पड़ा है। खबर है कि किसी कुलपति ने किसी लेखक का अपमान कर दिया। व्यर्थ शोरगुल से समाज का माहौल बिगाड़ा जा रहा है। इस विषय की तात्विक विवेचना समीचीन है। परन्तु मितरों, विषय, बुरी चीज है। विषय व्यसन से दूर रहने, और विषयविकार से बचने के निर्देश वेद शास्त्रों में उल्लिखित है। गीता में कहा गया है

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते…

अर्थात विषय का ध्यान करने से पूजन भंग होता है। इसकी संगत से काम और क्रोध उत्पन्न होता है। स्वयं श्रीकृष्ण के कुरुक्षेत्र के धर्मक्षेत्र में डिलीवर्ड उपदेश को इग्नोर मारकर, लेखक ने कुलपति को विषय पर आने के लिए कह दिया। तो स्वाभाविक रूप से, कुलपति ने लेखक को धक्के मारकर, विद्वत सभा से निकलवा दिया। क्या गलत किया?

कुलपति, कुल का पति होता है। और पति, परमेश्वर होता है। ऐसे में आप लेखक हों, शिक्षक हो, छात्रगण हों, या एकाउंट ऑफिसर- सबको उसकी आज्ञाकारी पत्नी की तरह होना चाहिए। जो कहे, करना चाहिए। वह बोले, तो सुनना चाहिए। ध्यानमग्न होकर, एकटक उनके मुखमंडल को मुग्ध होकर देखते हुए, इम्प्रेस्ड होने का अभिनय करना चाहिए। वह उल जलूल बाते करें, सभा का समय नष्ट करे, तो यह उसका विशेषाधिकार है। सभा उसकी है। विश्व विद्यालय का धन उसमें लगा है। बैनर उसका, माइक उसका, बाउंसर उसके। इस बात का लेखक को ध्यान रखना चाहिए था। तो जब कुलपति ने पूछा- ” मैं बोर तो नहीं कर रहा, हें हें हें” तो समवेत स्वर में सभा को कहना था- प्रभो!! आप तो गीता के बाद, दूसरा महत्वपूर्ण सन्देश मानवता के लिए प्रसारित कर रहे हैं। आप महान हैं, दया निधान है, ज्ञानी हैं, ध्यानी है। सभा तो मानती है कि तो आप पुरूष ही नहीं हैं। महापुरुष हैं।

लेकिन धृष्ट लेखक बोल पड़ा – विषय पर आइये। विषय विचार सुन, कुलपति में विकार जागना था। सो जाग गया। लेखक जी धकिया दिए गए। दोबारा न आने की ताकीद दी। उचित है न..एक तो सभा बुलाना, विचार विमर्श करना, लेखकों का सम्मान वामपन्थी परम्परा है। घोर दक्खनी दयानिधान, हृदय पर शिला रखकर इस परंपरा का निर्वहन कर रहे थे। उसमें आपने यह व्यवधान क्यों डाल दिया। भला दूसरे लेखकों में तो यह चुल्ल न उठी। वे सब उस सभा में गांधी जी के तीन बंदरों की तरह बैठे रहे। कुछ ने बुरा नही देखा, कुछ ने बुरा नही सुना। किसी ने बुरा न बोला। तब उनका सम्मान हुआ, वे शॉल, श्रीफल, मोमेंटो लेकर खुशी खुशी घर को गए। वे अशर्फी छाप लेखक थे।

भगाया गया लेखक दो कौड़ी का था। लेखक, अब दो कौड़ी का ही होता है। रील, विडीयो, शॉर्ट्स, के जमाने मे दो किलोमीटर के लेख पढ़ने का समय किसके पास है। सबको 11 घण्टे की वेब सीरीज देखनी है। फिर, लेखन निम्न कोटि का काम है। भारत की परंपरा, श्रुत परम्परा रही। उपदेश, उपनिषद- सब पास बैठकर सुनने की तजवीज करते है। लिखना गलत काम है। इसमें कोई सबाब नहीं।। महाभारत लिखी गणेशजी ने, लेकिन सब नाम वेदव्यास का लेते हैं। ऐसा क्यों?

सेंट घेसिंगटन यूनिवर्सिटी, केम्ब्रिज नहीं है। वह जेएनयू भी नहीं है। उसे औकात में रहना चाहिए। व्हाट्सप यूनिवर्सिटी के जमाने में, आवश्यकता समाप्त होने के बावजूद यूनिवर्सिटी यदि ज़िंदा है, तो गनीमत है। वह है, ताकि कुलपतियों को रोजगार मिले, मंच मिले। मानसिक पायरिया से उपजा मुंह का मवाद, वे सभाओं पर उलीच सकें। विद्वतजनों को बुलवाकर, माइक को पिचकारी बनाकर, आपसे होली खेलें। रंग लगाएं, बदरंग करें।

इन जमीनी हकीकतों को दो कौड़ी के लेखक नहीं समझते। दौर बदल चुका है। अब उन्हें सम्मान, बौद्धिक विमर्श की आशा छोड़ देनी चाहिए। जमाने के रंग में रंग जाना चाहिए। कहना चाहिए- कुलपति देवता। आप महान हैं, दया निधान है, ज्ञानी हैं, ध्यानी है। सभा तो मानती है कि आप तो पुरूष ही नहीं हैं। महापुरुष हैं।


दयानंद पांडेय-

सुविधाओं के मारे गगन बिहारी लेखकों के अपमान, विरोध के साथ मीट की दुकान के पास खड़े रहने के किस्से….उस कुलपति ने तो जो अभद्रता की सो की पर साथ बैठे लेखकों ने जो धतकर्म किया, उस का क्या? लेखकों ने सामूहिक विरोध करते हुए पूरे कार्यक्रम का बहिष्कार क्यों नहीं किया? सारा विरोध और प्रतिरोध सोशल मीडिया और ज्ञापन तक ही सीमित रह गया है। यह लफ़्फ़ाज़ लेखक , प्रकाशक से अपनी रायल्टी मांगने के बजाय पैसा दे कर किताब छपवाते हैं और बाहर क्रांति का बिगुल बजाते हैं।

इन गगन बिहारी लेखकों के अनेक वाक़ये हैं। एक कार्यक्रम में विष्णु खरे के साथ अभद्रता हुई। कांग्रेस राज था। पर वह चुप रहे। क्यों कि जहाज का टिकट, होटल आदि फंसा था। जब सब भुगतान हो गया तो वापस घर जा कर चिट्ठी लिख कर विरोध भी दर्ज कर दिया। तो उपस्थित लेखकों के साथ भी फ़्लाईट, ट्रेन का टिकट, होटल आदि फंसा था। सोशल मीडिया, ज्ञापन और चिट्ठी का विरोध अपनी जगह है। आर्थिक नुक़सान कोई नहीं उठाना चाहता। सब कायर बन जाते हैं। ख़ामोश रह जाते हैं।

एक बड़े संपादक हुए हैं प्रभाष जोशी। उत्तर प्रदेश में तब राष्ट्रपति शासन था। मोतीलाल बोरा राज्यपाल थे। मध्य प्रदेश फ़ैक्टर था। सो जोशी जी को पसंद करते थे। तब के समय जोशी जी जनसत्ता के संपादक थे। मोतीलाल बोरा ने उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की गांधी समिति में सदस्य बनवा दिया। बाद में तब के समय ढाई लाख का हिंदी संस्थान का पुरस्कार भी घोषित करवा दिया। लेकिन जब पुरस्कार लेने का समय आया तब तक राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया। मायावती मुख्य मंत्री बन गई थीं। उन्हीं दिनों गांधी को शैतान की औलाद बताने का धतकर्म भी मायावती ने कर दिया। पर जोशी जी सम्मान समारोह में न सिर्फ़ आए बल्कि राजकीय अतिथि बना कर मोतीलाल बोरा ने बुलाया। राजकीय विमान से सपरिवार बुलाया। जोशी जी सपरिवार आए। राज भवन में ठहरे। समारोहपूर्वक सम्मान लिया। राजकीय विमान से सपरिवार लौटे। लौट कर मायावती के गांधी को शैतान की औलाद वाले बयान के विरोध में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की गांधी समिति से इस्तीफ़ा दे दिया।

ग़ज़ब था यह विरोध भी। ऐसे अनेक लोगों के अनेक उदाहरण हैं। पर एक क़िस्सा और अस्सी का दशक था। हरियाणा के तत्कालीन मुख्य मंत्री देवीलाल लखनऊ आए थे। मीरा बाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाऊस में ठहरे थे। वहीं प्रेस कांफ्रेंस की। इंडियन एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता थे एस के त्रिपाठी। देवीलाल से कुछ अप्रिय प्रश्न पूछ लिए। देवीलाल टाल गए तो सवाल फिर दुहराया त्रिपाठी जी ने। देवीलाल तैश में आ गए। अपनी हरियाणवी लंठई पर आ गए। बेहूदगी से बोले, चुप कर! त्रिपाठी जी चुपचाप उठ कर खड़े हो गए। जाने लगे। मैं बगल में ही बैठा था। पूछा क्यों जा रहे हैं? त्रिपाठी जी बोले, जिस बेहूदगी से इस ने चुप रहने के लिए कहा है, रुकना चाहिए?

मैं भी उठ कर खड़ा हो गया। मेरे बगल में यू एन आई के सुरेंद्र दुबे बैठे थे। उन्हों ने मुझ से पूछा क्या हुआ? बताया उन्हें, वह भी उठ कर खड़े हो गए। धीरे-धीरे सभी पत्रकार उठ कर खड़े हो गए। अब देवीलाल हक्का-बक्का! देवीलाल ने हाथ जोड़ कर पूछा, क्या हुआ? उन्हें सामूहिक रूप से बताया गया। देवीलाल की सारी हरियाणवी हेकड़ी निकल गई। जाट होने का गुरूर उतर गया। हाथ जोड़ कर बोले, ग़लती हो गई! माफ़ करो! लोग बैठ गए थे।

अगर इस कुलपति के सामने भी सारे उपस्थित लेखक एक साथ उठ कर खड़े हो गए होते। स्टैंड ले लिया होता तो कुलपति अरे, मुख्य मंत्री और राज्यपाल भी माफ़ी मांग लेते। हटा दिया जाता यह कुलपति। पर नहीं, रीढ़हीन लेखकों के पास स्वाभिमान नाम की चीज़ कब की ग़ायब हो चुकी है। यह सिर्फ़ लफ़्फ़ाजी जानते हैं। ज़रा सा आर्थिक हित टकरा जाए, पुरस्कार, यात्रा आदि की सुविधा ख़तरे में आ जाए तो थूक कर चाटने में अव्वल बनने की होड़ लग जाती है। फ़ेसबुक पर कुत्तों की तरह भौंकना आसान है। ट्रंप और मोदी को हवा हवाई गाली देना, रोज़ सरकार गिरा देने का दिवा स्वप्न देखने वालों को लोकतंत्र और स्वाभिमान से कोई सरोकार नहीं रहा।

क्या कहा, लेखकीय अस्मिता? यह किस चिड़िया का नाम है?

एक समय था राजस्थान के मुख्य मंत्री जगन्नाथ पहाड़िया ने महादेवी वर्मा के लिए अप्रिय टिप्पणी कर दी। लेखकों का विरोध आग की तरह फैला। जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। वह महादेवी तो प्रयाग में रहते हुए भी खुलेआम कहती थीं, नेहरू को हिंदी नहीं आती। नेहरू की अंग्रेजी पर उसी शहर में फ़िराक़ के सवाल अपनी जगह थे। तो महादेवी के पास नैतिकता, शुचिता और स्वाभिमान सब था। बेहिसाब था। जो मनोज रूपडा और वहाँ उपस्थित लेखकों के पास नहीं है। होता तो उस कुलपति की हैसियत नहीं थी, ऐसा कुछ करने की। लेखकों और पत्रकारों का मान-सम्मान क्यों गौरैया की तरह फुर्र हो गया है? लेखकों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए।

अच्छा विचारधारा! विचारधारा की नपुंसकता की दुहाई भी मत दीजिए। आर एस एस, भाजपा के पहाड़े पुराने पड़ गए हैं। फिर अगर यह पहाड़ा याद ही था तो वहां कौन सी क्रांति करने गए थे? कुछ साल पहले वामपंथी नेता डी राजा ने ऐन हिंदी दिवस के दिन कहा कि हिंदी, हिंदुओं की भाषा है। आज तक किसी वामपंथी लेखक ने डी राजा के इस बयान पर ऐतराज नहीं जताया। तो क्या सचमुच हिंदी, हिंदुओं की भाषा है? संस्कृत पंडितों की और उर्दू मुसलमानों की?

लेखक, ऐतराज भूल चुके हैं। तनी हुई मुट्ठी, छुपी हुई कांख के साथ कुत्तों की तरह जीने के अभ्यस्त हो गए हैं। कभी किसी मीट की दुकान के आसपास किसी कुत्ते को भौंकते देखा है? यह लेखक भी नहीं भौंकते। इन के अपमान के ऐसे अनेक किस्से हैं। सब के पास। हम कह देते हैं, लोग नपुंसक विरोध के क़ायल हैं और चुप रहते हैं। मीट की दुकान के बाहर इन के खड़े रहने का यही हासिल है।


प्रेमकुमार मणि-

लेखकों का मान……. मनोज रूपड़ा के साथ गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति ने जो व्यवहार किया उसे यूट्यूब पर देखा और बेहद क्षुब्ध हूँ. इस पर अनेक मित्रों ने अपना आक्रोश व्यक्त किया है जिसे समझ सकता हूँ. मैंने किसी द्वारा लगाई गई अखबारी कतरन भी देखी, जिस में कुलपति का कहानी पर दिया गया भाषण तो है, लेकिन मनोज के साथ दुर्व्यवहार की कोई चर्चा नहीं है. यह पत्रकारिता के पतन का नमूना है.

अब मनोज मामले पर आया जाय. कुलपति ने भाषण के क्रम में कहा मैं आप लोगों को बोर तो नहीं कर रहा? आगे की पंक्ति में बैठे अतिथि लेखक मनोज रूपड़ा ने इतना भर कहा कि विषय पर बोला जाय. कुलपति कुपित हो गए. नाम पूछा. फिर कहा आपमें वीसी से कैसे बात की जाय इसका विवेक नहीं है. वीसी ने उपस्थित आयोजकों से यह भी पूछा कि किसने इन्हें बुलाया. फिर कहा आप बाहर जाइए. इन को कभी नहीं बुलाना है. आदि आदि. वीसी का अंदाज एक गुंडे की तरह का था.

मैंने वीसी के भाषण पर गौर किया. वह अशुद्ध भाषा में अनर्गल बातें बोल रहे थे. लेकिन वह कुलपति थे. कुछ भी बोल सकते थे. इससे यह पता चलता है कि पूरे देश में कैसे लोग विश्वविद्यालयों में भरे हुए हैं. यह तो रही कुलपति की बात. मुझे क्रोध वहां उपस्थित साहित्यसेवियों पर आ रहा था. वे चुपचाप बैठे रहे. किस लोभ या भय से बैठे रहे? उनका सार्वजानिक वहिष्कार क्यों नहीं हो?

लेखकों की प्रतिष्ठा के मामलों का एक पुख्ता इतिहास है. कहते हैं मध्यकाल में कवि जायसी की धज पर तत्कालीन सुलतान ने हँसी लगाई थी क्योंकि कवि कुरूप थे. जायसी चुप रहने वाले नहीं थे. सुलतान से पूछा- ‘ मुझ पर हँस रहे हो या मुझे बनाने वाले पर? ‘ सुलतान को वाजिब जवाब मिल गया था. कहते हैं उसने मुआफी मांगी.

अष्टछाप के कवि कुम्भन दास की फकीराना उक्ति ‘ मोंसो कहाँ सीकरी सो काम .. ” तो प्रसिद्ध ही है. ग़ालिब के बारे में कहा जाता है कि वह दिल्ली कॉलेज में बुलावे पर शिक्षक के तौर पर गए, लेकिन वहाँ का प्रिंसिपल उनके स्वागत केलिए बाहर नहीं आया. वह गेट से ही लौट गए.

बहुतों किस्से होंगे. लेकिन एक किस्सा इसी ज़माने का है. 1967 का. और यह करारा जवाब देने का है. तब मोरारजी देसाई उपप्रधानमंत्री थे. उन्होंने दिल्ली के कुछ लेखकों को चाय पर बुलाया था. लेखकों में मोहन राकेश भी थे. परिचय कराये जाने के बाद मोरारजी देसाई प्रवचन की मुद्रा में लेखकों को उपदेश देने लगे. अगली पंक्ति में बैठे मोहन राकेश ने जेब से सिगरेट निकाली और सुलगा कर कश लगाईं. कट्टर गांधीवादी देसाई ने नाराजगी जताते हुए कहा – ‘राकेशजी, मैं बदतमीजी बर्दास्त नहीं करता. ‘ मोहन राकेश ने छूटते ही जवाब दिया, – ‘बदतमीजी कौन कर रहा है? मैं या आप? चाय पर बुला कर भाषण पिला रहे हो. मैं वहिष्कार करता हूँ.’ और इतना कह कर वह बाहर निकल गए. यह होता है लेखक का साहस. इस घटना का जिक्र उनके निधन पर रघुवीर सहाय ने अपने लेख में (दिनमान) किया था.

एक दूसरी घटना 1977 या 78 की है. किशोरीदास वाजपेयी को कोई पुरस्कार दिया जाना था प्रधानमंत्री के हाथों. प्रधानमंत्री वही मोरारजी देसाई थे. वाजपेयी जी सभागार में अगली पंक्ति में बिठाये गए थे. पुरस्कार ग्रहण करने केलिए उन्हें मंच पर बुलाया गया. वह नहीं गए. उनका मानना था कि जिसे पुरस्कार देना है वहाँ प्रदान करने वाले को जाना चाहिए. संस्कृति का व्याकरण तो यही कहता है. प्रधानमंत्री ने बात ताड़ ली. वह मंच से नीचे उतरे. वाजपेयी जी के पास आये. वाजपेयी जी ने उठ कर पुरस्कार ग्रहण किया. इस घटना पर रघुवीर सहाय ने दिनमान में सम्पादकीय अग्रलेख लिखा था.

लेकिन मैं अपने जमाने के लेखकों को देख रहा हूँ. जाने किस लोभ में पिलपिले हुए जा रहे हैं. सेठों के पैसों से होने वाले लिट-फेस्ट में शामिल हो कर दो घूंट दारू पिएंगे और आत्मसम्मान की बात करेंगे. मुझे स्मरण होता है 1982 में जयपुर में होने वाले प्रगतिशील लेखक सम्मेलन का. कोई माथुर साहब तब मुख्यमंत्री थे. उद्घाटन उन्हें करना था. लेखकों को यह अटपटा लगा. कोई लेखक उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हुआ. यह लेखकों का आत्मसम्मान होता है.

जयपुर की चर्चा हुई तब महादेवी जी के अपमान का भी स्मरण हुआ. संभवतः 1980 की बात है. जयपुर में मंच पर राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री पहाड़िया जी थे. महादेवी वर्मा जी भी थीं. मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में महादेवी जी पर कुछ अनाप- शनाप कह दिया. बात अखबारों में आई. इंदिरा गाँधी तक पहुँची. इंदिरा जी कुछ ही समय पहले प्रधानमंत्री हुई थीं. मुख्यमंत्री को तुरंत हटा दिया गया. यह समय भी इस देश में ही था. इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीति में संस्कृति का कोई शाइन बोर्ड नहीं लगाया हुआ था. आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बैनर लगाए हुए लोग क्या एक बद्तमीज वीसी को हटाने की हिम्मत रखते हैं? है कोई पूछने वाला?


खुशदीप सहगल-

देश में विश्वविद्यालयों का बेड़ागर्क कुलपति जैसे पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों ने भी किया है. इनका उद्देश्य शिक्षा और शिक्षार्थियों के हित में काम करना नहीं अपने और राजनीतिक आकाओं के स्वार्थ सिद्ध करना होता है…कुलपति जैसे सम्मानित पद को अपने बिगड़े बोलों, अहंकार और आत्ममुग्धता से कैसे कलंकित किया जाता है, गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल इसकी शाश्वस्त मिसाल हैं…

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में स्थित इस विश्वविद्यालय में आयोजित एक राष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान उस समय स्थिति विकट हो गई, जब कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल अपनी ही लौ में बोले जा रहे थे. जो भी बोल रहे थे वो आत्मकेंद्रित था. ऐसे में काफ़ी देर हो गई तो सभा में उपस्थित साहित्यकार असहज़ महसूस करने लगे. कुलपति को एहसास हुआ तो उन्होंने सामने की पंक्ति में बैठे और महाराष्ट्र से आए प्रतिष्ठित साहित्यकार मनोज रूपड़ा की ओर इशारा किया. साथ ही कहा- “भाईसाहब आप बोर तो नहीं हो रहे.” इस पर मनोज रूपड़ा ने विनम्रता से जवाब दिया- “मुद्दे की बात हो तो बेहतर होगा”…

रूपड़ा की यह टिप्पणी सुनते ही कुलपति को तो जैसे मिर्च लग गई. उन्होंने सख्त लहजे में कहा, “बहुत बड़े कहानीकार-विद्वान बताते हो, लेकिन तमीज नहीं कि कुलपति से कैसे बात करते हैं.“ यही नहीं रूपड़ा के लिए कुलपति ने कहा कि आपका यहां स्वागत नहीं है. फिर बड़ी बेरूखी से उन्हें सभा से फौरन बाहर जाने के लिए कहा. साथ ही विश्वविद्यालय की आयोजन टीम से कहा कि रूपड़ा को आमंत्रित किसने किया. ये भी कहा कि रूपड़ा को भविष्य में भी विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम में न बुलाया जाए…

कुलपति के इस दुर्व्यवहार से नाराज़ रूपड़ा उठ कर बाहर जाने लगे तो कार्यक्रम में मौजूद कुछ और साहित्यकारों और अतिथियों ने कुलपति से विरोध जताया. अपनी ही पिनक में कुलपति ने उन्हें भी बाहर जाने के लिए कह दिया…

दरअसल, विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में समकालीन हिंदी कहानी, बदलते जीवन संदर्भ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा सहित कई राज्यों के विद्वान शामिल हुए थे…

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. साहित्यकारों के एक समूह ने इस व्यवहार को तानाशाही करार देते हुए रायपुर के अंबेडकर चौक पर विरोध प्रदर्शन किया है…देश भर के सोशल मीडिया पर साहित्यकार और बुद्धिजीवी कुलपति आलोक चक्रवाल के बर्ताव की कड़ी भर्त्सना के साथ इस्तीफ़े की मांग कर रहे है. इस मामले में फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है…

आलोक चक्रवाल जुलाई 2021 में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के कुलपति नियुक्त किए गए. इससे पहले वो गुजरात के राजकोट में स्थित सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में वाणिज्य एवं व्यवसाय प्रशासन विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे….

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