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सुख-दुख

मार्क टली उस भारत से रुख़सत हुए हैं, जहां सच की आवाज प्रचार से दबाई जाती है!

अद्वैत बहुगुणा-

आज हमने अपने दौर के समाचार का विश्वास खो दिया। ये अस्सी का दशक था, हर शाम हर किसी के कान लगे होते थे, समाचार सुनाने वाले जैसे ही कहते थे, इस घटना को हमारे संवाददाता मार्क टाली ने रिपोर्ट किया और बताया कि…., या फिर अपने रेडियो फीचर को पूरा पढ़ने के बाद जब वो आखिर में बोलते मैं मार्क टली बीबीसी के लिये। तो समाचार की विश्वसनीयता पर मुहर लग जाती।

रेडियो जर्नलिस्ट मार्क टली 90 वर्ष की आयु में दिवंगत हो गये। मेरे जेहन में ऐतिहासिक गढ़वाल उप चुनाव की बहुत सी स्मृतियां दौड़ रही हैं, जब टली पौड़ी में डेरा जमा के बैठे थे। विनम्र श्रद्धांजलि डियर टली।


राणा यशवंत-

1988-89 का साल रहा होगा. पटना कॉलेज के सामने अशोक रोड के फुटपाथ पर किताब बेचनेवाले बैठे थे. आदतन रुक कर किताबें देखा करता था. उस रोज़ भी देखा. एक किताब दिखी – “अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल”. मार्क टुली और सतीश जैकब की लिखी किताब. मैंने ख़रीदी. उस किताब ने मेरी अपनी जो पढ़ायी थी उसका कमोबेश पाँच दिन अपहरण कर लिया. मार्क टुली से परिचय तब हुआ. उन दिनों वे बीबीसी के पत्रकार के रूप में जाने जाते थे. बीबीसी का रेडियो बुलेटिन ‘आजकल’ भारत के गाँव गाँव में सुना जाता था. मेरे गाँव में भी. राजनारायण भिसारिया, अचला शर्मा, कैलाश बधवार, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, सलमा ज़ैदी के नाम आज भी ज़ुबान पर हैं. मार्क उसी जमात के चमकते सितारे थे.

गिलियन राइट के साथ मार्क टुली की किताब ‘इंडिया इन स्लो मोशन’ भी कम से कम हर पत्रकार को तो पढ़ना ही चाहिए. इस किताब को मैं तीन दिन में कवर तो कवर पढ़ पाया था.

मार्क तुली का जाना भारतीय पत्रकारिता के शानदार अध्याय का समापन है. राजनीति, समाज और सत्ता की अंतर्क्रियाओं और उसके परिणाम को समझने का माद्दा जिन पत्रकारों में रहा है, मार्क की गिनती उन उम्दा पत्रकारों में होती है. आज भारतीय पत्रकारिता का शोक दिवस है. RIP Mark Tully


BBC मतलब मार्क टली हुआ करता था। या तो मार्क टली या सतीश जैकब। ऐसे निर्भीक, निडर और निष्पक्ष पत्रकार मार्क टली नहीं रहे। लेकिन उनकी यादें रहेंगी। -शंभुनाथ शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार


सौमित्र राय-

जिसने भी सुना, वह रो पड़ा। जिसने भी बताया, वह रो रहा था। मार्क टली दिल में यूं ही नहीं बसे थे। इस धारणा से एकदम उलट कि एक पत्रकार लोगों की नजरों में रहता है।

मार्क उस ज़माने के पत्रकार थे, जहां पत्रकार 24X7 सिर्फ़ खबरों में जिया करते थे। विज्ञप्ति और बयान के पीछे नहीं भागते थे। 90 साल की उम्र तक उन्होंने सिर्फ़ भारत को जाना और चाहा।

दुर्भाग्य से वे इस देश में मीडिया को बिकते, तलवा चाटते देखकर गुज़रे। उन्होंने यह भी देखा कि लोकतंत्र की जननी अभिव्यक्ति के अधिकार और पत्रकारिता के हक़ को कैसे कुचल सकती है।

मार्क नहीं रहे, लेकिन उस दुनिया में भी उनकी आत्मा भारत में पत्रकारिता के गिरते स्तर को देखकर रोएगी ज़रूर। मार्क टली उस भारत में नहीं आए थे, जहां सच बोलता था और सत्ता सुनती थी।

वे उस भारत से रुखसत हुए हैं, जहां सच की आवाज़ प्रचार से दबाई जाती है। अलविदा मार्क। अब जन्नत में मुलाकात होगी। श्रद्धांजलि।


रुचिर गर्ग-

आपातकाल के दौरान मार्क टली को 24 घंटे के अंदर भारत छोड़ने के निर्देश दिए गए थे। आपातकाल की तमाम कहानियां बतलाती हैं कि इस फरमान के पीछे तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल की भूमिका थी।

तब इंदिरा सरकार मार्क टली की पत्रकारिता से खासी नाराज थी। दरअसल मार्क टली ने आपातकाल में खबरें ‘क्लियर’ करवाने के सरकार के फरमान को मानने से और सेंसरशिप-अंडरटेकिंग देने से इनकार भी कर दिया था। कहा जाता है कि ऐसी पत्रकारिता को सबक सिखाने का जिम्मा तो विद्याचरण शुक्ल का था ही। मार्क टली के साथ–साथ सभी विदेशी संवादाताओं को भारत छोड़ने के लिए कहा गया था।

आपातकाल हटने के करीब डेढ़ दशक बाद किसी कार्यक्रम के सिलसिले में मार्क टली का रायपुर आना हुआ। रायपुर यानी विद्याचरण शुक्ल का गृह नगर। कार्यक्रम के आयोजक और हम दो तीन युवा पत्रकार उन्हें लेने एयरपोर्ट पहुंचे। गाड़ी में बैठते ही मार्क टली ने हल्की मुस्कुराहट के साथ पूछा – हमारे दोस्त विद्याचरण जी कैसे हैं?

दशकों तक भारत में पत्रकारिता कर चुके मार्क टली भारत के ही हो कर रह गए। आज 90 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में उनका निधन हो गया। अपनी पत्रकारिता से और अपने पत्रकारिक स्टैंड से उन्होंने इस देश के पत्रकारों के दिल में जगह बना ली है। सलाम मार्क टली!


पुष्प रंजन-

पादरी बनते-बनते रह गए. और फिर पत्रकार बन गए मार्क टली. Goodbye Mark. You were truly the best!

कोलकाता के टॉलीगंज में जन्में थे मार्क टली। उनके पिता विलियम स्कार्थ कार्लाइल टली, एक ब्रिटिश बिजनेसमैन थे. कलकत्ता में ‘गिलैंडर्स अर्बुथनोट’ नाम की एक मैनेजिंग एजेंसी में पार्टनर थे। मार्क टली ने अपने पिता को एक सख्त “नैतिकवादी” निरूपित किया था, जो स्वभाव से ग़ुस्सैल थे, और जिन्होंने अपने परिवार को भारतीय समाज से दूर रखा था।

बंगाल में बचपन गुज़ारने के बाद, स्कूली शिक्षा के लिए मार्क टली इंग्लैंड चले गए। उनका शिक्षण ट्वाईफोर्ड स्कूल, मार्लबोरो कॉलेज तथा ट्रिनिटी हॉल, कैम्ब्रिज में हुआ जहां उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया। मार्क को चर्च रास नहीं आया, चुनांचे पत्रकारिता को करियर के रूप में चुना।

मार्क टली बीबीसी में 1964 में शामिल हुए, और एक संवाददाता के रूप में कार्य करने के लिए 1965 में भारत आ गए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दक्षिण एशिया की सभी प्रमुख घटनाओं को कवर किया। अपने समय के स्टार थे मार्क टली. दक्षिण एशिया में मार्क टली की वजह से बीबीसी और रेडियो पत्रकारिता की साख़ मज़बूत हुई. रेडियो को उनके कालखंड में सबसे भरोसेमंद पत्रकारिता माना गया. आज खबर आई कि 90 साल के मार्क टली नहीं रहे.

पत्रकारिता में प्रतिबद्धता के प्रतीक थे मार्क टली. आपातकाल के दौरान भारत से निष्कासन के बावजूद वो डिगे नहीं। दर्जनों पुस्तकें लिखने वाले मार्क टली उस बदमाश गिरोह से नहीं बच पाए, जो निष्पक्ष पत्रकारिता करनेवालों पर कीचड़ उछालते हैं.

किसी गुमनाम शख्स द्वारा लिखित Hindutva Sex Adventure उपन्यास के मुख्य चरित्र Andrew Luyt और टली में काफी समानताएं हैं। मार्क ने स्वयं कहा था, “मैं चकित हूँ कि रोली बुक्स ने इस प्रकार की घटिया साहित्यिक चोरी को प्रकाशित किया और लेखक को एक छद्म नाम के पीछे छुपने दिया. यह पुस्तक स्पष्ट रूप से मेरे करियर पर आधारित है, यहां तक कि इसके मुख्य चरित्र का नाम भी मुझसे मिलता है। उस चरित्र की पत्रकारिता अत्यंत घटिया है, और हिंदुत्व तथा हिंदू धर्म पर उसके विचार किसी भी तरह से मेरे विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। मैं पूरी तरह से उनके साथ असहमत हूँ”.


महेश शर्मा-

श्रद्धांजलि-जाने-माने पत्रकार बीबीसी के लिए भारत में लंबी पारी खेलने वाले मार्क टुली का दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल में निधन हो गया। उनका पूरा नाम था विलियम मार्क टुली। 90 साल के थे। सच में पत्रकारिता का पर्याय थे मार्क टुली। उनको देखा तो नहीं था पर उनको पढा। उनकी खबरें बीबीसी पर ब्रॉडकास्ट होती थी। बीबीसी में मार्क टुली की हर रिपोर्टिंग उन्हें चर्चा में ला देती थी। वजह यही थी कि वह सबसे अलग देखे जाते थे। फिर चाहे देश में इमरजेंसी, ऑपरेशन ब्लू स्टार हो, 1984 के दंगे यह फिर अयोध्या में बाबरी विध्वंस। उनकी रिपोर्टिंग से वह देश में पत्रकारिता का मानक समझे जाते थे।

वह इसलिए चर्चित नहीं थे कि वे विदेशी थे, बल्कि इसलिए कि वे विदेशी होते हुए भी भारतीय नजर से भारत को देखते थे। बीबीसी के भारत संवाददाता के रूप में उन्होंने दिल्ली के सत्ता गलियारों से ज्यादा समय गांव, कस्बे, दंगे, अकाल, आस्था और आम आदमी के बीच बिताया। खास यह कि टुली की रिपोर्टिंग में औपनिवेशिक दंभ नहीं था

न ही मिशनरी सहानुभूति, और जो झलकती थी तो वह थी संवेदनशील यथार्थवादी दृष्टि। वरिष्ठजन बताते हैं कि मार्क टुली की खासियत यह थी कि वे ब्रेकिंग न्यूज़ से ज्यादा ब्रेकिंग अंडरस्टैंडिंग के पत्रकार थे।

टुली उन चुनिंदा पत्रकारों में थे जिन्होंने दिल्ली के दंगों को सिर्फ “कानून-व्यवस्था” नहीं, बल्कि राज्य की नैतिक विफलता के रूप में रिपोर्ट किया। उनकी रिपोर्टों में सत्ता की भाषा नहीं, पीड़ितों की आवाज़ थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार की रिपोर्टिंग में बीबीसी के माध्यम से दुनिया ने पहली बार जाना कि यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि आस्था, राजनीति और सत्ता का खतरनाक टकराव है। टुली ने न तो सरकार की लाइन दोहराई, न उग्रवाद का महिमामंडन किया। अयोध्या आंदोलन और बाबरी मस्जिद विध्वंस पर टुली की रिपोर्टिंग नारेबाज़ी से दूर थी। उन्होंने इसे “हिंदू-मुस्लिम संघर्ष” नहीं, बल्कि राजनीति द्वारा धर्म के इस्तेमाल की प्रक्रिया के रूप में समझाया। शायद यही कारण है कि उनकी रिपोर्टें आज भी रिफरेन्स बुक मानी जाती हैं।

आपातकाल में जब भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा झुका हुआ था, तब बीबीसी की आवाज़ और उस आवाज़ में मार्क टुली सत्ता को असहज कर रही थी। मार्क टुली भारतीय पत्रकारिता के लिए एक आईना थे। उनकी पत्रकारिता हम पत्रकारों को यही सिखाती है कि पत्रकारिता सत्ता से दूरी का नाम है, न कि नज़दीकी का। वे उस दौर के प्रतीक थे जब पत्रकारिता पेशा नहीं, प्रतिबद्धता हुआ करती थी। आज के युवा पत्रकारों को मार्क टुली को पढ़ना चाहिए। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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