अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
महाकुंभ में हादसा हुआ और कुछ लोग इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश में जुट गए। वे इसे योगी सरकार की असफलता या प्रशासन की नाकामी बताकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगे।
जबकि भगदड़ की इस घटना को केवल प्रशासन की लापरवाही मानना उचित नहीं होगा। इसकी आशंका भी जताई जा रही है कि महाकुंभ में कुछ दिनों पहले लगी आग या यह भगदड़ किसी तरह की साज़िश का नतीजा हो।
दरअसल, जब लाखों लोग एक साथ किसी स्थान पर होते हैं, तब साजिशन फैलाई गई एक छोटी सी अफवाह भी भयानक परिणाम ला सकती है। अफवाह फैलते ही वहां मौजूद लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं। ऐसे में हादसा हो जाना स्वाभाविक है।
कुंभ में ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि पहले भी कई बार भगदड़ में मौतें हो चुकी हैं।
साल 2013 में अखिलेश यादव सरकार में भी कुंभ में मची भगदड़ में 36 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. उसके पहले 2010 और 2003 में भी भगदड़ से मौतें हुई थीं. कुंभ में भगदड़ से हुई मौतों की पहली बड़ी घटना आजाद भारत में 1954 में भी हुई थी।
यानी इतनी बड़ी भीड़ के जुटने के बाद किसी भी सरकार के लिए किसी त्वरित प्रतिक्रिया से हुई भगदड़ की घटना को रोक पाना लगभग असम्भव होता है।
लिहाजा इस महाकुंभ में मची भगदड़ और उसमें हुई मौतों के लिए तुरंत ही सरकार पर उंगली उठा देना घटिया दर्जे की राजनीति ही कही जाएगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की घटनाएं होती हैं. भारत से बाहर भी धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की इससे बड़ी घटनाएं देखने को मिल चुकी हैं। मसलन, हज के दौरान मक्का में 2015 की भगदड़ में 2,000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
घटना दुखद है और किसी भी कीमत पर रोकने के हर संभव इंतजाम भी लिए जाने चाहिए। लेकिन इंतजाम में खामी थी या किसी अफवाह या साजिश से यह हादसा हुआ और इसका दोषी कौन था, कौन नहीं, इसकी जांच होने के बाद ही इस पर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति की जानी चाहिए।
फिलहाल तो यही बेहतर है कि अपुष्ट खबरें फैलाने की बजाय मीडिया को सही जानकारी देनी चाहिए। सोशल मीडिया पर भी बिना पुष्टि के किसी भी खबर को साझा करना बंद होना चाहिए।
सिर्फ सरकार को कोसने या राजनीति करने की बजाय हमें देश के जिम्मेदार नागरिक की तरह इस अति दुखद हादसे पर पूरी संवेदना के साथ अपनी प्रतिक्रिया जतानी चाहिए.



