हेमंत शर्मा-
मुतरेजा नागा बन गया. धार्मिक आस्था से नहीं. न सनातन धर्म की रक्षा के मकसद से. उसे कुंभ जाना था. उसकी सोच है कि इस वेष में उसे कुंभ में विशेषाधिकार मिल जाएंगे.जाने में आसानी होगी. उसकी रील बनेगी. प्रसिद्धि मिलेगी और स्नान में उसका विशिष्ट स्थान होगा. कल मुँह अँधेरे ही ‘जेरी’और ‘हेक्टर’ ज़ोर-ज़ोर से कोलाहल करने लगे. मैंने बालकनी से झॉंका तो अचरज इतने सबेरे दरवाज़े पर कोई नागा सन्यासी. नीचे आया तो होश उड़ गए, “अरे मुतरेजा तुम! इस अवस्था में, सब ठीक तो है? मुतरेजा संकोच में गड़ा जा रहा था. कहने लगा “नहीं सर कुम्भ जाना था, भीड़ बहुत है. संगम पर स्नान करना था इसलिए ऐसा किरदार बना लिया. इससे मेरी कुंभ यात्रा आसान हो जाएगी”. “पर इसकी क्या ज़रूरत थी, तुम मुझे बताते. मैं तुम्हारा इंतज़ाम करता. पास बनवा देता. या किसी अखाड़े के साथ लगा देता.” मुतरेजा बोला, “नहीं सर स्नान के दिन सारे पास फेल है. बस ईश्वर प्रदत्त यही पास चल रहा है. मुतरेजा! तुम्हें ठंड लग सकती है. निमोनिया हो सकता है. एक रोज में कोई नागा नहीं बनता. नागा बनना सतत तप की एक प्रक्रिया है. उससे गुज़रकर ही आप शीत और ताप पर जीत हासिल करते हैं. मुतरेजा, इस परम अनावृत अवस्था में मैं तुम्हें अंदर ले चलकर चाय भी नहीं पिला सकता.
मुतरेजा बोला, -तो क्या सर, मैंने कोई ग़लत काम कर दिया है. क्या आप असहज हो रहे हैं. क्या मैंने कोई फूहड़ता की है? “नहीं मुतरेजा, हम नंगे ही पैदा होते हैं. नंगे ही वापस जाते हैं. नग्नता अपसंस्कृति नहीं, प्रकृति की अभ्यर्थना है. यह मनुष्य की सहजावस्था है. हाँ नंगई जरूर व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश है. जड़ता से लड़ने का साहस है. धूमिल के शब्दों में “नंगापन, अंधापन के खिलाफ एक सख्त कार्रवाई है”. इसलिए नग्नता सच है और जगत मिथ्या. यह वैराग्य की चरम अवस्था है. वीतरागी होने की यात्रा है. त्याग और तितिक्षा का शिखर है. इसे ही ‘अपरिग्रह’ कहा गया है. तभी तो ‘नागा’ से सब डरते हैं. क्योंकि भूख और वासना को जीत उनका जीवन दुनियावी जरूरतों के उस पार पहुँच जाता है. इसलिए नग्नता मनुष्य का जन्म-सिद्ध अधिकार है. परमात्मा ने मनुष्य को नग्न ही बनाया है. वस्त्र तो आदमी की ईजाद है. कपड़ों के भीतर तो सभी नंगे हैं. कपड़ा ऊपर ऊपर है, भीतर तो आदमी नंगा है. जब भी आपको सच का सामना करना होगा, आवरण हटाना पड़ेगा. चाहे मन का हो या तन का.”
तुम अगर आमादा ही हो तो ऐसे ही जाओ कुंभ में. पर याद रखना. नागा सुविधा के लिए नहीं बनते. संघर्ष के लिए बनते हैं. सब कुछ छोड़ने के लिए बनते हैं. कुंभ की जान अखाड़े होते हैं. और अखाड़े नागा साधुओं से चलते हैं. संयम, साधना और त्याग का दूसरा नाम है ‘नागा’. इसलिए कुंभ में नागाओं का स्थान सर्वप्रथम है. बचपन में सुना था नंगा से खुदा भी डरता है. ईश्वर अलग-अलग हो सकते हैं. उनके संप्रदाय अलग-अलग हो सकते हैं. पर इसमें दो राय नहीं कि नग्नता से ईश्वर का सीधा और खास संबंध है. अगर महाकवि बद्री की बात मान लें तो “नंगे होकर बुद्ध और महावीर भगवान हो गए”. हमारी परंपरा में पीपल के पत्ते पर पूजे ही जाते हैं नंगे कृष्ण भगवान. शिव भी नग्नरूप में ही हैं. उनके पास कुछ नहीं है . इसलिए शिव भक्त फक्कड़ हैं. पूरे नंगे रहकर ज्योतिर्लिंग की पूजा समूची सृष्टि में हो रही है. गांधी ने तमिलनाडु के दौरे पर देश की गरीबी देखी और लगभग वस्त्र त्याग दिए. और आधे नंगे रहकर महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया में खुद को पुजवाया. अज्ञेय कहते थे कि “नंगा होने, नंगा हो जाने और नंगा करने में बहुत फर्क है.” नंगा होना मनुष्यता का समाजवादी नियम है. किसी ने खूब लिखा है-
तन की उर्यानी से बढ़ कर नहीं दुनिया में लिबास,
ये वो जामा है कि जिस का नहीं उल्टा सीधा.
मुतरेजा नंगा होना साहसिकता ज़रूर है लेकिन ‘एस्थेटिक न्यूडिटी’ बिना किसी वाजिब कारण, उद्देश्य या विचार के नहीं हो सकती. बाकी जैसे अतार्किकता फूहड़ लगती है, वैसे ही जबरन नंगई भी फूहड़ और अश्लील लग सकती है. पर नागाओं की वस्त्रहीनता सोद्देश्य है. जब आचार्य शंकर ने यह सेना बनाई होगी तो उसका मकसद यही रहा होगा कि यह किसी भी चाह और चाहत के आगे, चरम वैराग्य की अवस्था होगी. जहाँ खोने के लिए कुछ नहीं होगा. ताकि सनातन की रक्षा के लिए ये सेना मोह, माया या आसक्ति के बिना आरपार की लड़ाई के लिए तैयार हो.
‘तो सर नागा बनना क्या बहुत कठिन है? मैं क्यों नहीं नागा बन सकता? उसका सवाल था. मुतरेजा! नागाओं की दुनिया निराली है. यह दुनिया रोमांच, रहस्य और अजूबों से भरी है. समाज में भटक कर आए, या अपनी इच्छा से मुक्ति की चाहत में, या दान में मिले लोग ही कुंभ में नागा सेना में भर्ती होते हैं. इस कुंभ में भी अलग-अलग अखाड़ों के कोई चार हज़ार संन्यासी अब तक नागा बने हैं. इस कठिन प्रकिया में पहले इन संन्यासियों के सिर मुड़े जाते हैं. फिर 24 घंटे की मुश्किल दीक्षा दी जाती है. तब जाकर गंगा के किनारे उन्हें शस्त्र और शास्त्र के हवाले किया जाता है. सनातन की रक्षा के लिए वे एक हाथ में जल और दूसरे में कुश लेकर धर्मध्वाजा को प्रणाम करते हैं. इसके बाद आधी रात में ‘विरजा’ यानी विजया यज्ञ होता है. इसमें नागा बनने आए व्यक्ति से बाबा एक बार फिर से कहते हैं कि वो चाहे तो सांसारिक जीवन में लौट सकता है. जब वह नहीं लौटता तो यज्ञ के बाद अखाड़े के आचार्य, महामंडलेश्वर या पीठाधीश्वर चेले को गुरुमंत्र देते हैं. इसके बाद उसे धर्म ध्वजा के नीचे बैठाकर ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप कराया जाता है. फिर वे वस्त्रों को हमेशा के लिए त्यागकर चरम वैराग्य की स्थिति पाते हैं. सनातन धर्म की इस सेना में भर्ती सिर्फ कुंभ में ही होती है, दीक्षा के दौरान स्वयं का पिंडदान कर वे अपनी देह को शव मान लेते हैं.

धर्मध्वजा के सामने जो 12 घंटे की उपासना होती है, वह गोपनीय होती है. इसे कोई देख नहीं सकता. फिर आंगिक क्रिया होती है जिसे ‘तंगतोड़’ भी कहते हैं. यह लिंग तोड़ने की एक क्रिया है. साधक के जननांग की एक नस खींची जाती है और साधक नपुंसक बन जाता है. उसके बाद शुरू होती है सन्यास की यह बोझिल, थकाऊ और एकरस यात्रा. समाज से दूरी इन्हें आक्रामक तेवर देती है. दशनामी जूना अखाड़े के नागा साधुओं की संख्या कोई पौने दो लाख है. जबकि देश भर में इनकी संख्या कोई दस लाख होगी. दीक्षा से पहले अंतिम बार उनसे नागा जीवन के बारे में पूछा जाता है. फिर गुरु उन्हें मंत्र देता है. बदले में शिष्य शिष्यत्व और धर्मध्वजा की रक्षा का वायदा करता है. महिला नागा सन्यासियों की दीक्षा अलग होती है. वे एकवस्त्र होती हैं. अखाड़े की ध्वजा के नीचे सन्यासी के कपड़े उतार उसके शरीर में भस्म का गाढ़ा लेप किया जाता है. उसी के बाद शुरू होता है बिखरे जटाजूट, अलमस्त, नंगधडंग, भस्म में लिपटा शरीर, गले में रूद्राक्ष और हाथ में चिलम का बीहड़ जीवन. कोई भी आदमी जब संन्यासी बनने के लिए आता है तो सबसे पहले यह परखा जाता है कि उसका स्वयं पर नियंत्रण कितना है. उससे लंबे समय ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता है. इस प्रक्रिया में सिर्फ दैहिक ब्रह्मचर्य ही नहीं, मानसिक नियंत्रण को भी परखा जाता है.
मुतरेजा! इन साधुओं को अपने सारे बालों को त्यागना पड़ता है. वे सिर पर शिखा भी नहीं रख सकते, या फिर संपूर्ण जटा को धारण करते हैं. नागा साधुओं को रात और दिन मिलाकर केवल एक ही समय भोजन करना होता है. वो भोजन भी भिक्षा में मिला होना चाहिए. एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है. अगर सातों घरों से कोई भिक्षा न मिले तो उसे भूखा रहना पड़ता है. किसी भी बसावट के बाहर निवास करना, जमीन पर ही सोना, किसी को प्रणाम न करना और न किसी की निंदा न करना, केवल संन्यासी को ही प्रणाम करना, इनकी दिनचर्या के वे नियम हैं, जो इन्हें समाज से काटकर रखती हैं.
सन्यासी को नागा बनने से पहले पांच चीजें रूद्राक्ष, कटारी (चाकू), लंगोटी, भगवा और भभूति दी जाती हैं. साधकों को दीक्षा की प्रक्रिया में अपने शरीर और मन की स्थिरता के लिए साधनाओं से गुजरकर खुद को ब्रह्मचर्य के पालन के लिए तैयार करते है. इस प्रक्रिया की शुरूआत ‘पंच संस्कार’ से होती है. जिसमें पाँच गुरु उसके लिए अलग-अलग अनुष्ठान करते हैं. इनमें प्रमुख गुरु शिखा(बाल) काटते हैं, भगवा गुरु उन्हें भगवा वस्त्र और रुद्राक्ष गुरु उन्हें रुद्राक्ष की माला भेंट करते हैं, विभूति गुरु शरीर पर भस्म लगाते हैं जबकि लंगोट गुरु उनके शरीर से आख़िरी कपड़ा भी उतरवाते हैं. पंच संस्कार में शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश को गुरु बनाना पड़ता है. अखाड़े की तरफ से इन्हें नारियल, भगवा वस्त्र, जनेऊ, रुद्राक्ष, भभूत सहित नागाओं के प्रतीक और आभूषण दिए जाते हैं. इसके बाद गुरु अपनी प्रेम कटारी से शिष्य की शिखा यानी चोटी काट देते हैं. इस मौके पर शीरा और धनिया बांटा जाता है.
इसके बाद नागाओं को तीन दिन का उपवास रखना होता है. फिर वह खुद का श्राद्ध करता है. उसे 17 पिंड दान करने होते हैं. खुद की आठ पीढ़ी का और ननिहाल की आठ पीढ़ी का यानी 16 अपने पूर्वजों के और 17वां पिंडदान खुद का. इसके बाद वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है और नया जीवन लेकर अखाड़े में लौटता है. मुतरेजा बोला, ‘ सर आप कहते हैं इनकी संख्या दस लाख है पर कुंभ के बाद तो यह कहीं दिखाई नहीं देते, कहां चले जाते हैं?” मुतरेजा कुंभ के बाद नागा अपने अपने अखाड़े में लौटते हैं जो काशी, प्रयाग, उज्जैन, नासिक, हरिद्वार आदि कई शहरों में हैं. बस्तियों में जब यह रहते हैं तो इन्हें लंगोट पहनने की छूट रहती है. नागा रहना इनकी ‘सेरेमोनियल ड्रेस’ है इसलिए कुंभ या दूसरे बड़े धार्मिक आयोजनों में भारी तादाद में दिखते है.

नागा जीवन के लिए वैराग्य भाव का होना जरूरी है. पर आजकल बेबसी और अवसाद में नशे की चाह भी नागा जीवन की ओर खींचती है. हाथों में चिलम लिए और चरस का कश लगाते हुए इन साधुओं को देखना अजीब लगता है. मस्तक पर आड़ा भभूत लगा, तीनधारी तिलक लगा, धूनी रमा, नग्न रह गुफाओं में तप करने वाले नागा साधुओं का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है. यह साधु उग्र स्वभाव के होते हैं. इनके भड़क जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है.1954 के कुंभ में इनके भड़कने से आठ सौ लोग मारे गए थे. भारत 1947 में आजाद हुआ था. आजाद भारत का यह पहला कुंभ साल 1954 में पड़ा. यह कुंभ भारत के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी, लेकिन इसे एक त्रासदी के रूप में ही याद किया जाता है. इस कुंभ में भगदड़ मचने से 800 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. 3 फरवरी 1954 को मौनी अमावस्या के मौके पर स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु उमड़े थे. भीड़ में भगदड़ मच गयी. नागा अनियंत्रित हो तलवार भाँजने लगे, हाथी घोड़े दौड़े, इस हाहाकार में स्नान के लिए आए लोग नदी में डूबकर या कुचलकर मारे गए.
बिना न्यौता, और अपील के अनंतकाल से इतने लोगों की जुटान दुनिया के लिए ये अचरज का कारण हैं.
1 फरवरी 1888, प्रयाग में चल रहे कुंभ को लेकर ब्रिटेन के अखबार में एक खबर छपी. खबर में लिखा था- ‘कुंभ में 400 वस्त्रहीन साधुओं ने जुलूस निकाला. लोग इनके दर्शन के लिए दोनों तरफ खड़े थे. कुछ लोग इनकी पूजा भी कर रहे थे. इनमें पुरुषों के साथ महिलाएं भी थीं, एक अंग्रेज अफसर इनके लिए रास्ता बनवा रहा था. ब्रिटेन में सरकार ‘न्यूडिटी’ पर सजा देती है, लेकिन इंडिया में तो नंगे साधुओं के जुलूस में जॉइंट मजिस्ट्रेट रैंक का अफसर बंदोबस्त में लगा था. ये दुखद है.’
इसके बाद ईसाइयों की सबसे बड़ी संस्था ‘क्रिश्चियन ब्रदरहुड’ के अध्यक्ष आर्थर फोए ने ब्रिटेन के एक सांसद को चिट्ठी लिखी. फोए ने लिखा- ‘वस्त्रहीन साधुओं के जुलूस से तो शिक्षित हिंदू समाज भी शर्म से गड़ जाता होगा. इस काम के लिए ब्रितानी सरकार ने अंग्रेज अफसर को क्यों तैनात किया? ऐसा करना ईसाई धर्म के लिए शर्म की बात है. ऐसा लगता है कि भारतीयों ने अंग्रेजों को झुका दिया है.’ 16 अगस्त 1888 को सरकार ने फोए की चिट्ठी का जवाब देते हुए लिखा- ‘इलाहाबाद और बाकी जगहों पर ये साधु परंपरागत रूप से शोभायात्रा निकालते हैं. ये हिंदू समाज में बहुत पवित्र माने जाते हैं, हमें तो इनमें कोई बुराई नहीं दिखती, वस्त्रहीन जुलूस निकालने वाले ये साधु ‘नागा संन्यासी’ थे. किसी भी कुंभ में पहला शाही स्नान नागा संन्यासी ही करते हैं.’ इन्हें देखकर कोई कुछ भी कहे, पर ये कठिन जीवन की मिसाल हैं. इनके जीवन का मकसद सिर्फ गुरूमंत्र, सनातन की रक्षा और धर्म के लिए युद्ध ही रहता है.
जूना अखाड़ा सभी 13 अखाड़ों में सबसे उदार है. वह नागाओं की भर्ती में जाति धर्म नहीं देखता. इसलिए वह सबसे बड़ा अखाड़ा भी है. धर्मप्राण लोगों को इन नागाओं में भगवान शिव की छवि दिखती है. क्योंकि लोक में शिव की कल्पना और आदतें ऐसी ही मानी गयी. इनके प्रति लोक आस्था का यह स्तर होता है कि स्नान के लिए जाते नागाओं के गुजरने के बाद कुंभ में लोग रास्ते की धूल सिर से लगाते हैं. दम मारो दम वाली इनकी तस्वीर का यह दूसरा पहलू है. अमूमन जनजातियों और गरीब तबकों के युवक ही नागा बनते हैं. जूना अखाड़े के एक महंत ने एक दफा मुझसे कहा कि यह जीवन अब बोझिल लगता है, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है. मोबाइल और मारूति संस्कृति तो यहां कब की पहुंच चुकी है पर खानों में बँधी जिंदगी हमें उदास करती है. यही उदासी इन्हें नशे के हवाले करती है. अखाड़ों के दूसरे साधु तो धार्मिक आयोजनों और कथा प्रवचन में लगकर लोक से जुड़े रहते हैं. पर इन नागाओं का कोई लोक सम्पर्क नहीं रहता है. इसलिए वे आक्रमक और बेकाबू हो जाते हैं.
नागाओं के बोलचाल पर मुसलमानों का असर दिखता है. पेशवाई, शाही स्नान, शाही जुलूस आदि शब्द यहाँ चलन में हैं. हर अखाड़े का एक प्रमुख ‘महामंडलेश्वर’ होता है जो शास्त्र परंपरा से आता है. बाकी के पदाधिकारी शिष्य परंपरा के आते हैं. मसलन श्रीमहंत, थानापति, कारोबारी, भंड़ारी, गोलकी, पुजारी आदि. अखाड़े के कार्यवाहक श्रीमहंत होते हैं. एक अखाड़े में आठ श्रीमहंत होते हैं. यह अखाड़े की सुप्रीम परिषद होती है. जिसके फैसले बहुमत से नहीं एकमत से माने जाते हैं. सभी 13 अखाड़ों की सर्वोच्च परिषद ‘अखाड़ा परिषद’ है. आप महामंडलेश्वर को अखाड़ों का बौद्धिक शिखर कह सकते हैं. इस पद पर ज्यादातर अद्वैत वेद्वांत के ज्ञाता होते हैं.
अखाड़ों का इतिहास पंद्रह सौ बरस का है. इनका समाज लोकतांत्रिक है. हर तीन बरस में महामंडलेश्वर और बाकी के पदों का चुनाव होता है. नागा बने सन्यासी को पहले तीन बरस ‘रयता पंथ’ में रखा जाता है जो देशभर में घूमकर धार्मिक रीति रिवाज, नागा साधुओं के संस्कार और शस्त्र-शास्त्र का अध्ययन करते हैं. सन्यासी को बताया जाता है कि उसके लिए महामंडलेश्वर और श्रीमहंत ईश्वर तुल्य हैं. तभी अखाड़ों में अनुशासन बना रहता है. जूना सहित कई अखाड़ों में साध्वियों की शाखा भी है जिन्हें ‘माई बाड़ा’ कहते हैं. आदि शंकराचार्य ने नागाओं को संगठित करने के लिए इनका वर्गीकरण दस नामों में किया. ये दस नाम है गिरी, पुरी, भारती, तीर्थ, आश्रम, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर. इस दसनामों के कारण इन्हें दशनामी सन्यासी भी कहा जाता है. ये अखाड़े सनातन धर्म के सैनिक संगठन हैं. महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, आनंद, अग्नि, निर्मल, उदासीन और पंचायती शैव अखाड़े हैं. निर्वाणी, दिगम्बर व निर्मोही वैष्णव अखाड़े हैं. शैव को नागा और वैष्णव साधुओं की वैरागी कहते हैं. कभी इनकी गौरवशाली परंपरा थी पर अब सिर्फ ये अपनी अर्जित संपत्ति की रक्षा कर रहे हैं.
मुतरेजा! मैं इसलिए तुम्हें इतना ज्ञान दे रहा हूँ कि मैंने इस दुनिया को बहुत करीब से देखा है.अद्भुत और अपूर्व निराली दुनिया. धर्म और आध्यात्म की अलबेली दुनिया. धर्म के अलग-अलग रंग. नागा साधुओं का रहस्य लोक.कोई पैंतीस बरस पहले मुझे जूना अखाड़े में साधुओं की भर्ती की रिपोर्टिंग का मौका मिला. वहाँ किसी बाहरी की मौजूदगी की मनाही थी.यह गोपनीय कर्म काण्ड था. जूना अखाड़े का केन्द्र बनारस है और इसके श्री महन्त परमानंद जी बनारस के ही थे. वे बांग्लाभाषी थे लेकिन बनारसी भाषा में धाराप्रवाह मादर-फादर करते थे. नागाओं को नियंत्रित करने के लिए उनका गजब का अनुशासन था. एक हाथ में सोटा और दूसरे हाथ में ‘मठाम्नायोपनिषद’ (शंकराचार्य पीठों और अखाड़ों का संविधान). इसी से वे अपनी नागा सेना पर काबू पाते थे. मुझ पर उनका अपार स्नेह था. इस कारण वे भर्ती प्रकिया में मुझे शामिल करने पर राजी हो गए. बात 1989 के कुंभ मेले की है. उन्होंने मुझे बुला कर सारी प्रक्रिया दिखाने के लिए अखाड़े में ही बिठा लिया. उनका निर्देश था की शरीर पर भस्म लगा गमछा पहन मेरे साथ ही रहना. इधर-उधर नहीं जाना. वरना तुम्हारे साथ कुछ भी घट सकता है. उनके साथ-साथ 24 घंटे रह मैंने जनसत्ता में इस प्रक्रिया को रिपोर्ट किया. नागा साधु बनने में कम से कम 6 वर्ष का समय लगता है. कौन किस कुंभ में नागा साधु बना है? इसकी पहचान की प्रक्रिया भी है जैसे जिसने प्रयाग में उपाधि धारण की उसे ‘नागा’, जिसने उज्जैन में धारण की उसे ‘ख़ूनी नागा’, जो हरिद्वार में सन्यासी हुआ उसे ‘बर्फ़ानी नागा’ तथा नासिक कुम्भ में बने नागा को ‘खिचड़िया नागा’ कहते हैं.
नागा साधुओं के साथ स्नान का मुझे दूसरा मौक़ा मिला नासिक में. यहां शैव और वैष्णव अलग-अलग स्नान करते हैं. शैव नासिक कुंड में और वैष्णव गोदावरी तट पर . दोनों जगह सुबह से दोपहर तक अखाड़ों के स्नान का क्रम तय था. उसके बाद आम लोगों के लिए नासिक का कुण्ड खुलता. मुंबई से दोपहर बाद का हमारा लौटने का जहाज़ था. पशोपेश में था क्या करूँ. अखाड़ा परिषद के तबक़े अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी मेरे मित्र थे. उन्होंने समाधान दिया. मेरा अखाड़ा सबसे पहले तीन बजे स्नान करेगा. आप उसके मुख्य अतिथि होगें. हम साथ में स्नान करेंगे. पहले तो मैं इसके लिये तैयार नहीं था फिर उनके आग्रह को टाल नहीं सका. पर उस दिन मेरा जुलूस निकल गया. मैं और वीणा, बीच में हमारे तरफ़ तलवार लिए नागा. वीणा के लिए यह बड़ी असहज स्थिति. और हम निकल पड़े सनातन की रक्षा के लिए.
तब भी मेरे मन में यह सवाल था? कि आखिर ये अखाड़े क्यों बने ? इसके पीछे की सोच क्या रही होगी? मुतरेजा ने भी यही सवाल किया. मैंने कहा कि जब देश में बौद्ध विहार और मठ पतनशील हुए भारत के जन-जीवन पर उनका बुरा असर होने लगा और बौद्ध धर्म का भी पराभव होने लगा. तब आठवीं या नौवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने पतनशील बौद्ध धर्म और संस्थाओं के सामने वैदिक धर्म और अद्वैत दर्शन की स्थापना की. शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए. उत्तर में ‘बद्री’, पश्चिम में ‘द्वारका’, पूर्व में ‘पुरी’ और दक्षिण में ‘श्रृंगेरी’. इन मठों के नाम हुए ज्योतिपीठ, शारदापीठ, गोवर्धनपीठ और श्रृंगेरीपीठ. इनमें स्थापित संन्यासियों के दस संप्रदायों को शंकराचार्य ने दस नाम दिए. जो भी संन्यासी इन संप्रदायों का होता है वह इन नामों को अपने नाम के आगे सरनेम की तरह लगाता. ताकि उसका संप्रदाय पता चल सके. जैसे मूलशंकर को दयानंद नाम दिया गया. और चूंकि वे सरस्वती संप्रदाय के थे इसलिए दयानंद सरस्वती हुए. इसी कारण शंकराचार्य द्वारा स्थापित संप्रदाय शैव कहलाया और उनके संन्यासी दशनामी संन्यासी कहलाए. शंकराचार्य के चार शिष्य हुए- पद्मपाद, हस्तामलक, सुरेश्वर और तोटक. पद्ममपाद के दो शिष्य हुए- तीर्थ और आश्रम. उनके भी संप्रदाय चले, दूसरे के वन और अरण्य, तीसरे के तीन- सरस्वती, पुरी और भारती और चौथे के भी तीन- गिरी, सागर और पर्वत. हर मठ से ये संप्रदाय जुड़े हैं. ज्योति से गिरी, पर्वत और सागर. शारदा से आश्रम और तीर्थ. श्रृंगेरी से भारती, पुरी और सरस्वती. अरण्य और वन पुरी गोवर्धन पीठ से जुड़े. साधु- संन्यासियों को संगठित कर उन्हें मठों से जोड़ने की ‘पैन इंडिया’ रणनीति शंकराचार्य ने बनाई.
शंकराचार्य ने चारो पीठो के संन्यासियों और मठ को एक निश्चित क्षेत्र (जूरीडिक्भीशन) दिया. ज्योर्तिमठ को क्षेत्र मिला उत्तर और उत्तर पश्चिम. द्वारका मठ को मिला पश्चिम. पूरा दक्षिण श्रृंगेरी मठ के जिम्मे आया. भारत का पूर्व और उत्तर पुरी के गोवर्धन मठ के पास आया. ये मठ अपने सीमा क्षेत्र में रहने वाले संन्यासियों को अद्वैत वेदांत सिखाने और उसका लोगों में प्रचार-प्रसार करने का काम करते थे. लेकिन शंकराचार्य ने महिलाओं को इनमें दीक्षित करने की व्यवस्था नहीं दी. बाद में गिनती की जो महिलाएं आईं, संन्यासिनी कहलाईं. लड़ने- भिड़ने वाले संन्यासियों या दशनामी नागाओं की बड़ी पुरानी परंपरा है. पहले तो ये हर कहीं घूमा करते थे. ब्रिटिश शासकों ने इनके शहरों और बस्तियों में जाने पर पाबंदी लगाई. लेकिन कुंभ और सिंहस्थ में इन्हें सड़कों पर कूच करते हुए स्नान करने जाने पर कोई रोक नहीं थी. ग्यारहवीं शताब्दी के नाटक ‘प्रबोधचंद्रोदय’ में एक पात्र शैव संन्यासी है. जो बात-बात पर जैन साधु पर तलवार तान लेता है. कापालिकों का मुखिया उज्जैन में भाला रखते हुए बताया गया है. कर्नल टॉड ने भी अपने इतिहास में राजस्थान में शस्त्रधारी गोसाइयों या शैव संन्यासियों का वर्णन किया है. टॉड ने उन्हें जेरूसलम के सेंट जोन नाइट्स जैसा बताया है. वे राजस्थान के मठों में रहते थे. संन्यासियों के मादक जड़ी-बूटी और द्रव पीने की बात भी टॉड ने लिखी है. जेएन फरूखहार ने शैव सैनिक संन्यासियों की जमातों की जड़ें ढूंढीं. 16वीं सदी के आखिर में बनारस में रहने वाले शैव वेदांती मधुसूदन सरस्वती ने पहली बार युद्धक संन्यासियों की टुकड़ी बनाई थी. मधुसूदन सरस्वती शस्त्रधारी और आक्रामक मुस्लिम फकीरों और उनके द्वारा संन्यासियों और साधुओं के नरसंहार से बहुत चिंतित थे.
दशनामी संप्रदायों के जिन अखाड़ों में नागा संन्यासी रहते हैं, उनमें छह मुख्य अखाड़े हैं- एक जूना अखाड़ा जिसका अधिकृत नाम भैरव अखाड़ा भी है. इस अखाड़े के इष्टदेव दत्तात्रेय हैं. इसमें अवधूतनियां भी ली जाती हैं. इसका केंद्र वाराणसी में है और शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन में हैं. इसी से अवाह्नन अखाड़ा जुड़ा हुआ है जो सबसे पुराना माना जाता है. जदुनाथ सरकार मानते हैं कि यह 1547 में स्थापित हुआ. तीसरा अखाड़ा है निरंजनी. यह कच्छ के मांडवी में स्थापित हुआ. इसके इष्टदेव देवताओं के सेनापति और शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय हैं. इसका केंद्र प्रयाग है और शाखाएं त्र्यंबक, ओंकारेश्वर, उज्जैन, हरिद्वार, वाराणसी और उदयपुर में हैं. चौथा अखाड़ा आनंद जिसके इष्टदेव अग्नि हैं. महानिर्वाणी पांचवां अखाड़ा है जो झारखंड के कुंड़ागढ़ के सिद्धेश्वर मंदिर में स्थापित है. इसके संन्यासियों ने ही वाराणसी के ज्ञानवापी की लड़ाई लड़ी थी. सन् 1664 में दशनामी संन्यासियों और औरंगजेब की सेनाओं में हुई लड़ाई इसी अखाड़े के नाम दर्ज है. वाराणसी को औरंगजेब से बचाने का श्रेय भी इसी अखाड़े को दिया जाता है. इसका केंद्र प्रयाग है और शाखाएं कई जगह हैं. इनके इष्टदेव कपिल हैं. कुंभ और सिंहस्थ मेलों में इस अखाड़े को आगे जगह दी जाती है. वैष्णव बैरागियों के झंडे और निशान भी होते हैं.शैवों में सिर्फ महानिर्वाणी और अटल के इष्टदेव गणपति हैं. यह गोंडवाणा में स्थापित हुआ था. इसका भी केंद्र बनारस है और कई जगह शाखाएं हैं.
सभी अखाड़े, आठ दावों और बावन मढ़ियों में विभाजित हैं. जो दशनामियों की चार जमातों- गिरी, पुरी, भारती और वन को दिए गए हैं. कुछ और अखाड़ें भी हैं जैसे अगन, अलखिया, सुखड़ और गूदड़, उखड़, उदासीन और निर्मल. नागा संन्यासी मुगलों के शस्त्रों से तो निपट लेते थे लेकिन ईसाई मिशनरियों के बौद्धिक विवादों में कमजोर पड़ते थे. तब अखाड़ों ने दशनामी स्ंन्यासियों से पढ़े- लिखे परमहंस लिए जो नागाओं में महामण्डलेश्वर कहलाए. जब परमहंस मंडलेश्वर हुए तो उन्हें नागा संन्यासियों ने वही सम्मान दिया जो मुखियाओं को दिया जाता है. उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु माना. जिस मंडलेश्वर का शिष्य मंडलेश्वर हो जाए वह महामंडेलश्वर हो जाता है. कुंभ और सिंहस्थ मेलों में इनका जुलूस चतुरंगिणी सेना की तरह कूच करता है. हाथी, घोड़े, ऊंट, हथियार, झंडे, निशान सब होते है. इन मेलों में स्नान करने जाते वक्त जुलूस में कौन कहां होगा इसका क्रम बना है. शैव संन्यासियों में नागा सबसे आगे होते हैं. वही पहले स्नान भी करते हैं. लेकिन शैव संन्यासियों से पहले वैष्णव बैरागी चलें और स्नान करें इस पर विवाद हमेशा रहा है. झगड़ा समय और स्थान को लेकर होता है. आगे- पीछे पहुंचने में प्रतिष्ठा का सवाल भी आता है.
कुंभ और सिंहस्थ मेलों में सशस्त्र संन्यासियों में लड़ाई के अनेक वर्णन हैं. पहला संदर्भ सन् 1760 में शैव संन्यासियों और वैष्णव बैरागियों में हरिद्वार में हुई लड़ाई का मिलता है. अंग्रेज लेखक विलसन के हिसाब से उसमें अठारह हजार साधु मारे गए. यदुनाथ सरकार अपनी किताब ‘द हिस्ट्री ऑफ दशनामी नागा संन्यासीज’ में लिखते हैं- ‘कुंभ में पहले स्नान करने को लेकर हमेशा से विवाद होते रहे हैं. नागा साधुओं और वैरागी साधुओं के बीच कई खूनी जंग हुई. 1760 के हरिद्वार कुंभ के दौरान पहले स्नान को लेकर नागा और वैरागी आपस में लड़ गए. दोनों ओर से तलवारें निकल आईं. सैकड़ों वैरागी संत मारे गए. 1789 के नासिक कुंभ में भी फिर यही स्थिति बनी और वैरागियों का खून बहा. इस खूनखराबे से परेशान होकर वैरागियों के खाकी अखाड़े के महंत बाबा रामदास ने पुणे के पेशवा दरबार में शिकायत की. 1801 में पेशवा कोर्ट ने नासिक कुंभ में नागा और वैरागियों के लिए अलग-अलग घाटों की व्यवस्था करने का आदेश दिया. नागाओं को त्र्यंबक में कुशावर्त-कुंड और वैष्णवों को नासिक में रामघाट दिया. उज्जैन कुंभ में वैरागियों को शिप्रा तट पर रामघाट और नागाओं को दत्तघाट दिया गया. फिर भी हरिद्वार और प्रयाग में पहले स्नान को लेकर विवाद जारी रहा. कुंभ पर अंग्रेजों के शासन के बाद तय किया गया कि पहले शैव नागा साधु स्नान करेंगे, उसके बाद वैरागी करेंगे. इतना ही नहीं, शैव अखाड़े आपस में ना लड़ें, इसलिए अखाड़ों की सीक्वेंसिंग भी तय की गई. तब से लेकर आज तक यही परंपरा चल रही है.
वैष्णव साधुओं का संसार अलग है. उन्हें ‘वैरागी’ कहते हैं. वैष्णवों में चार संप्रदाय हैं. जिनके अलग-अलग दर्शन, सिंद्धात और व्याख्याएं हैं. उनके इष्टदेवों में भी बहुत अंतर है. मानते तो सब विष्णु को ही हैं लेकिन उनके अलग-अलग रुपों में- रामानुजी शेषनाग पर श्री, भू और लीला के साथ बैठे विष्णु को पूजते हैं. रामानंदी साधु सीता-राम को पूजते हैं. निम्बार्कियों का दर्शन द्वैत-अद्वैत का है जो कि रामानुजी-रामानंदी ही नहीं विष्णुस्वामी-वल्लभाचारियों से भी अलग हैं. लेकिन निम्बार्की विष्णु स्वामी और वल्लभाचारियों की तरह कृष्ण और राधा को पूजते हैं. माधव और चैतन्य संप्रदाय का दर्शन लगभग समान है. वैष्णव साधुओं में नागा संन्यासियों की तरह लड़ने-भिड़ने वाले बैरागी कहलाते हैं. वे सफेद कपड़े पहनते हैं. वैष्णव साधुवाद शैव से पुराना नहीं है. एक हिसाब से नियमित संप्रदायों के नाते वैष्णव शंकराचार्य के बाद नवीं शताब्दी के हैं.
शैव संप्रदाय के संन्यासी और संगठन काफी पुराने हैं. जयपुर की गलता घाटी के बुरहानपुर में वैष्णव संप्रदायों का एक सम्मेलन हुआ था. इसमें रामानंदी संप्रदाय के एक बालानंदजी को जिम्मेदारी दी गई कि वे बैरागियों का एक ऐसा वर्ग संगठित करें जो तीर्थों में होने वाले कुंभ, सिंहस्थ और दूसरों पर्वों पर शैव संन्यासियों यानी नागाओँ के हमलों से वैष्णवों की रक्षा कर सके. शैव पहले से ही शस्त्रों से सुसज्जित और संगठित थे. बालानंदजी ने तीन अनियां बनाई. संस्कृत में सेना को ‘अनि’ कहते है ये अनिया उसी का अपभ्रंश है. बालानंदजी ने सात अखाड़े भी स्थापित किए. जो तीन अनिया बनाई वे थीं दिंगबर, निर्मोही, निर्वाणी. इनमें सबसे महत्वपूर्ण दिंगबर है. हर अनि अपना नेता चुनती है जो ‘श्री महंत’ कहलाता है. कुंभ में दिंगबर अखाड़े के महंत पहले चलते हैं. सात अखाड़ें हैं- दिंगबर, निर्वाणी, निर्मोही, खाकी, निरालंबी, संतोषी और महानिर्वाणी. बाद में इनमें झड़िया, मालाधारी, धूरिया, तातांबरी, बलभ्रदी, राधावल्लभी, विष्णुस्वामी और उखाला और जुड़ गए.
नागा साधु अपने शरीर पर जो भभूत लगाते हैं. उसका भी शास्त्र है. यह भभूत हवन कुंड में पीपल, पाकड़, रसाला, बेलपत्र, केला और गाय के गोबर के हवन से तैयार होती है. इससे पहले नागा श्मशान की भस्म का इस्तेमाल करते थे. नागा साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिए कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया. सन् 1664 में जब औरंगजेब के सेनापति मिर्जा अली तुरंग ने काशी पर हमला किया, तो हजारों नागाओं ने सैनिकों की भाँति युद्ध किया और काशी विश्वनाथ मंदिर की सुरक्षा में मदद की. 1666 में जब औरंगजेब की सेना ने हरिद्वार पर हमला किया तो भी नागा साधु उनका मुक़ाबला करने आगे आए. आज भी ऐसे कई मंदिर जो औरंगजेब के समय ध्वस्त हो मस्जिद बनने से रह गए. उसमें तत्कालीन शासकों के साथ नागा साधुओं का बड़ा योगदान है.
मृत्यु के बाद नागा साधुओं को जल समाधि दी जाती है. जीते जी वे अपना श्राद्धकर्म और पिंडदान कर ही चुके होते है, इनके शव को या तो गंगा में सीधे प्रवाहित कर दिया जाता है या फिर इनकी समाधि बना दी जाती है.
अखाड़ों की परम्परा में महिला अखाड़ों की परम्परा नहीं थी. लेकिन 2013 प्रयाग महाकुंभ में जूना अखाड़े ने माईबाड़ा को दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा का स्वरूप दे नई परम्परा बनाई. यानी अब पुरुष वर्चस्व वाले अखाड़ों में महिलाओं की संख्या में इजाफा होने लगा. प्रयाग महाकुंभ में अखाड़ों में महिला महामंडलेश्वरों और संतों की संख्या 100 के ऊपर पहुंच गई. इस कुंभ में पहली बार माई बाड़ा को अखाड़े का दर्जा दिया गया है. अब उनकी अपनी धर्मध्वजा भी होगी. किसी नागा महिला साधु को नग्न रहने की इजाजत नहीं होती. महिला साधु पुरुष नागाओं की तरह नग्न रहने के बजाए अपने तन पर एक गेरूआ वस्त्र लपेटे रहती हैं. नारी के लिए सोलह श्रृंगार की कल्पना है, पर नागाओं के भी 17 श्रृंगार होते हैं. उन्हें भी अपने लुक और अपनी स्टाइल की उतनी ही फिक्र होती है जितनी आम आदमी को. इलाहबाद कुंभ में ऐसे कई साधु-नागा बाबा देखने को मिल रहे हैं जो अपने विशेष श्रंगार के लिए आकर्षण का केंद्र बने हैं. नेट पर वे अपने विचार के लिए नहीं अजब-गजब रील के कारण झंडा गाड़ रहे हैं.
इन सन्यासियों की सबसे बड़ी श्रृंगार सामग्री भस्म है. भगवान शिव के औघड़ रुप में भस्म रमाते थे. शैव साधु भी अपने आराध्य की प्रिय भस्म अपने शरीर पर लगाते हैं. नागाओं में चिमटा रखना अनिवार्य होता है. धुनि रमाने में सबसे ज्यादा काम चिमटे का ही पड़ता है. चिमटा हथियार भी है और औजार भी. चिमटा उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा है. साधु चिमटे से ही अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं. बाबा का चिमटा लग जाए तो नैया पार. जटाएं इनकी सबसे बड़ी पहचान हैं. अपनी जटाओं का फूल,रुद्राक्ष और मोतियों से श्रृंगार करते हैं.
आमतौर पर नागा साधु निर्वस्त्र ही होते हैं लेकिन कई साधु हठयोग के तहत लंगोट धारण करते हैं. जैसे लोहे की लंगोट, चांदी की लंगोट, लकड़ी की लंगोट. यह भी एक तप की तरह होता है. नागा साधु सबसे ज्यादा ध्यान अपने तिलक पर देते हैं. यह पहचान और शक्ति दोनों का प्रतीक है. नागाओं को सिर्फ साधु नहीं, योद्धा माना गया है. वे युद्ध कला में माहिर, क्रोधी और मज़बूत देहयष्टि के स्वामी होते हैं. अक्सर नागा साधु तलवार, फरसा या त्रिशूल लेकर चलते हैं. ये हथियार इनके योद्धा होने के प्रमाण के साथ ही इनके लुक का भी हिस्सा हैं. जिस तरह भगवान शिव वाघाम्बर यानि शेर की खाल को वस्त्र के रुप में पहनते हैं, वैसे ही कई नागा साधु जानवरों की खाल पहनते हैं. हालांकि शिकार और पशु खाल पर लगे कड़े कानूनों के कारण अब खाल मिलना मुश्किल होता है, भस्म की ही तरह नागाओं को रुद्राक्ष भी बहुत प्रिय हैं. कहते हैं रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से पैदा हुए हैं. यह साक्षात भगवान शिव के प्रतीक हैं. इस वजह से सभी शैव साधु रुद्राक्ष की माला पहनते हैं.
मुतरेजा को अब सर्दी लगने लगी थी. वो आया तो नागा वेष में था. लेकिन नागाओं पर इतनी चर्चा के बाद शायद उसकी ग्रंथियां और इंद्रियां ठंडी पड़ गई थीं. अपनी हथेलियों को काँख में घंसाते हुए मुतरेजा बोला, “तो फिर ये सब कौन हैं तो मुँह से रक्त गिरने, गले में छोटे-छोटे मुंड पहनने और पोज दे-देकर रील बनाने में मगन हैं. ये किस अखाड़े के हैं. इसका क्या इतिहास है सर”. मैंने समझाया, मुतरेजा, ये तुम हो. तुम जैसे लोग हैं. इनका अखाड़ों से वास्ता नहीं है. ख़ुद को अघोर रूप देकर ये स्वांग कर रहे हैं. आजकल ऐसी भीड़ बहुत है. नए-नए तरह के बाबा. बनारस में मणिकर्णिका की रंगभरी एकादशी हो, कुंभ हो, शिवरात्रि हो, ऐसे तिड़बिड़े तमाशे वाले बाबा हर कहीं मिलते हैं. दरअसल, बाबाओं, साधुओं की परंपरा का एक स्वरूप स्थापित होते हुए भी, उतनी ही मुक्त परंपरा भी है. कबीर को ही देखो, बस सीढ़ी पर पैर के नीचे आकर राम नाम सुन लिया तो दीक्षा हो गई और क्या कमाल के संत बने. किसी ने प्रेम रचा लिया प्रभु से तो सखिभाव में तो सधुवा गए और माँग भर के प्रेमाश्रयी हो गए. संन्यास और नागा परंपरा से इतर है ये पूरा दायरा. नाथपंथी, निर्गुनी, फ़क़ीर और ऐसे न जाने कितने. लेकिन तुम इसमें मत पड़ो. इसपर फिर कभी बात करेंगे. अभी जो नागा बनकर डुबकी के चक्कर में तुम हो, यह तुम्हारे लिए मुश्किल भी पैदा कर सकता है.
मैंने मुश्किल वाली बात सहज ही कही थी. लेकिन मुतरेजा जैसे मेरी ही बातों में पीछे लौट गया. तंगतोड़ शब्द उसे बेचैन कर रहा था. एक नस टूटी और फिर सदा के लिए नागा. मुतरेजा अब काफी ठंड महसूस कर रहा था. मुझे लगा कि कुंभ पहुंचने से पहले ही कहीं मुतरेजा का काम न हो जाए. अंदर से एक शाल मँगाकर मैंने मुतरेजा को ओढ़ने के लिए दिया. ऐसा इसलिए भी ज़रूरी था कि जेरी और हैक्टर अगर किसी तरह हमारे पास पहुँच जाते तो शायद मुतरेजा को पहचानने से इनकार कर देते और कुछ और दिक़्क़त भी आ सकती थी. मैंने मुतरेजा को समझाया. किसी भी दिन स्नान में पहली डुबकी का तो आनंद है. लाखों की भीड़ जब पानी में उतरी न हो, आप उस पानी में ब्रह्मवेला में उतरें और नहाएं तो इसका एक अलग प्राकृतिक सुख है. बाकी पहले नहाने और बाद में नहाने का पुण्य से कोई संबंध नहीं. पुण्य का कोई क्रम नहीं है. हैरारिकी नहीं है. पुण्य है तो है. संगम नहाने का पुण्य, गंगा नहाने का पुण्य, कुंभ नहाने का पुण्य. ये पुण्य प्रवाह की तरह हैं. जब उतरो, लाभ मिलेगा. इसलिए नागा का भेष बनाकर कुंभ लाभ लेना उचित नहीं. रील देखो, कैसे बाबा लोग जनता को गलती करने पर कनपटिया रहे हैं. सोचो, अगर धरे गए तो क्या क्या तोड़ दिया जाएगा.
मुतरेजा अब शॉल को काफी अच्छे से लपेट चुका था. मोबाइल पर ओला एप खोल चुका था. इसके पहले की और लोग उसे देखें या रास्ते पर लोगों की नज़र पड़े, मुतरेजा घर पहुँच जाना चाहता था. मैंने कहा, मुतरेजा, तुम्हें कुंभ नहलाने की व्यवस्था करता हूं. चिंता न करो. मुतरेजा लज्जाशील संतुष्टि के साथ अब मुड़ चुका था.
जय जय



