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पाकिस्तान फतह के बाद यूक्रेन ने रूस और ताइवान ने चीन कब्जाने के लिए नोएडा के न्यूज चैनलों से संपर्क किया है!

चैतन्य भट्ट-

सोशल मीडिया पर मीम्स की एक अलग दुनिया है। यह माध्यम हल्के-फुल्के, व्यंग्यपूर्ण अंदाज़ में बात कहने का मौका देता है। पिछले दिनों ऐसे ही एक मीम पर नज़र गई: पाकिस्तान पर कब्जे की खबर के बाद यूक्रेन ने रूस और ताइवान ने चीन पर कब्जे के लिए एक भारतीय चैनल विशेष से संपर्क स्थापित किया है। यह छोटा-सा मगर बेहद चुटीला व्यंग्य आज के खबरिया टीवी चैनलों की हालत बयां करता है।

पिछले दिनों इन चैनलों ने ‘युद्ध-युद्ध’ खेलकर जैसा उन्माद दिन-रात परोसा है, उसे देखकर लगता है कि इनके लिए युद्ध कोई समस्या नहीं, बल्कि एक इवेंट बन गया है। टीआरपी की अंधी दौड़ में शामिल ये चैनल भूल गए कि तथ्य जैसी कोई चीज भी होती है, जिसका गला घोंटा जा रहा है। एंकर बंकरों की लंबाई-चौड़ाई और यह गणित समझाते नजर आए कि जरूरत पड़ने पर उनमें कितने लोग एडजस्ट हो सकते हैं। इनमें से शायद ही किसी ने युद्ध की परिस्थितियों में सीमा पर रहने वाले आम आदमी का दर्द समझने की कोशिश की हो। मिसाइल, ड्रोन, राडार और फाइटर प्लेन जैसे तकनीकी विषयों पर ऐसी-ऐसी व्याख्याएँ और बहसें हुईं कि गहन जानकार भी शर्मिंदा हो जाएं। रातों-रात खड़ी हुई तथाकथित सैन्य विशेषज्ञों की फौज गंभीर मसलों पर हास्यास्पद बहस करती दिखी। मामला यहां तक पहुंच गया कि सरकार को युद्ध संबंधी जानकारी प्रसारित न किए जाने के निर्देश तक जारी करने पड़े।

यूट्यूब के माध्यम ने तथाकथित स्वतंत्र चैनल चला रहे पत्रकारों की एक फौज खड़ी कर दी है। शुरुआत में ये चैनल व्यवहारिक और तथ्यपरक महसूस हुए थे, मगर व्यूज़ के हिसाब से धन मिलने की मौद्रीकरण व्यवस्था लागू होने के बाद ये भी सनसनी परोसने के माध्यम बन गए हैं। द प्रिंट जैसा प्रतिष्ठित यूट्यूब चैनल चलाने वाले प्रख्यात पत्रकार शेखर गुप्ता तक यह कहने पर मजबूर हैं कि इन खबरिया चैनलों को मनोरंजन की दृष्टि से देखना ही ठीक है।

पहलगाम हादसे की साज़िश के पीछे पाकिस्तान का पूरा गणित ही यह था कि देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो और दंगे भड़कें। समूचे देश, खासकर कश्मीर ने जैसी ग़ज़ब की एकता दिखाकर एक स्वर में आतंकवाद को ख़ारिज कर देश की एकजुटता को मजबूत किया, वह काबिले-तारीफ़ है। इस महत्वपूर्ण विषय पर हुई बहसें न केवल राष्ट्रीयता की भावना को मजबूती देतीं, बल्कि पाकिस्तान को उसकी दुर्भावनापूर्ण योजना की असफलता का भी एहसास करातीं। दुर्भाग्यवश, कुछ को छोड़कर लगभग सभी टीवी और यूट्यूब चैनल इस मुद्दे को भुला कर युद्ध की कहानी गढ़ने में जुटे रहे।

पत्रकारिता का मूल सिद्धांत सत्य और सटीकता है—जिसमें तथ्यों को बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रस्तुत करना, कहानी के दोनों पक्षों को जानना और अफवाहों से परहेज़ करना शामिल है। यह सूचना उपलब्ध कराने और समाज पर निगरानी रखने का एक ज़िम्मेदार माध्यम है। लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ का कार्य बिना पूर्वाग्रह के स्वस्थ जनमत का निर्माण करना है। मीडिया का काम किसी का भोंपू बनना नहीं, बल्कि सच और तथ्य को सामने लाना है। दुखद है कि टीआरपी और किसी भी तरह से व्यूज़ बटोरने की अंधी दौड़ ने सारा ज़ोर ‘युद्धोन्माद’ फैलाने पर लगा दिया है।

अखबार जैसे प्रिंट मीडिया की तुलना में टीवी और यूट्यूब जैसे दृश्य माध्यम यकीनन अधिक प्रभावशाली हैं। मोबाइल उपकरणों के तकनीकी विकास और इंटरनेट की सस्ती उपलब्धता ने इन्हें और भी लोकप्रिय बना दिया है। कभी पत्रकारिता का इकलौता माध्यम रहे परंपरागत अखबारों की विश्वसनीयता और उत्तरदायित्व के अपने मापदंड हैं। इसके विपरीत, विज़ुअल मीडिया चौबीसों घंटे उपलब्ध रहता है, जहां अखबार जैसी जवाबदेही की बाध्यता नहीं है। चतुर-चालाक एंकर बहसों में भाग लेने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों से अपनी बात कहलवाने और विवाद की स्थिति में जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कला में निष्णात होते हैं। दृश्य माध्यम की इस ताकत का दुरुपयोग अक्सर इस स्तर तक पहुंच जाता है कि इनके माध्यम से बने जनमत के आगे व्यवस्था भी अपने आप को असहाय महसूस करने लगती है।

नतीजतन, राजनीतिक बाध्यता के तहत ऐसे कदम उठाने की परिस्थितियां बनती हैं जो व्यापक देशहित के बजाय लोकप्रिय अभिमत से अधिक प्रभावित होते हैं।

टकराव और युद्ध समाधान नहीं हैं। राजनीति के खिलाड़ी जो चाहे कहें, यह सच अडिग रहेगा कि युद्ध समस्या का हल नहीं, उसकी शुरुआत है। खबरिया टीवी चैनल हों या मीडिया के यूट्यूब जैसे अन्य मंच—राष्ट्रीय और मानवीय दायित्व को समझना सर्वोपरि होना चाहिए। देश की अखंडता और स्वाभिमान बनाए रखने के लिए आवश्यक युद्ध कभी-कभी अपरिहार्य और वाजिब होता है, मगर विवेक को कुंद कर देने वाले युद्धोन्माद का प्रचार किसी भी हाल में उचित नहीं। युद्धविराम के बाद दोनों देशों और दुनिया द्वारा ली गई राहत की साँस इसका प्रमाण है।

प्रख्यात शायर मरहूम साहिर लुधियानवी साहब की ये पंक्तियाँ इस दौर में मौजूं हैं:

जंग तो ख़ुद ही एक मसला है,
जंग क्या मसअलों का हल देगी,
आग और ख़ून आज बख़्शेगी,
भूख और एहतियाज कल देगी।
इसलिए ऐ शरीफ़ इंसानों,
जंग टलती रहे तो बेहतर है।
आप और हम सभी के आंगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।

लेखक जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं।

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