
संजय कुमार सिंह
मीडिया बतायेगा नहीं तो जनता कैसे समझेगी और जो बताना चाहे उसे पैसे सरकार देगी नहीं। न्यूजक्लिक जैसे मीडिया संस्थान और स्वतंत्र रूप को काम करने वालों को रोकने के सैकड़ों उदाहरम हैं और उनमें मनमानी भी। उत्तर प्रदेश की एक खबर आज भी है। विदेशी चंदा रोकने के लिए हजारों एफसीआरए लाइसेंस पहले ही रद्द कर दिये गये हैं। देश में क्राउड फंडिंग, चंदा लेना वैसे भी मुश्किल है। ऐसे में जब मुद्दा पीएमएलए को रोकना होना चाहिये तो विपक्ष और विरोध को रोकने में लगी सरकार काम कब करेगी? हालात ऐसे हैं कि अरविन्द केजरीवाल के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है जैसे वे देश के सबसे वांछित अपराधी हों। उनकी पत्नी सुनीता के इस बयान को द टेलीग्राफ ने आज अपना कोट बनाया है। इसीलिए मैं आज समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट को याद कर रहा हूं। स्क्रॉल डॉट इन ने 2019 में ही लिखा था, ‘हिंदुत्व आतंक’ से बरी होना भारत की अत्यधिक समझौतावादी आपराधिक न्याय प्रणाली को उजागर करता है। अब यह कहा जा सकता है कि उसका शिकार हिन्दू भी हो रहा है या राजनीति तो है ही।
अरविन्द केजरीवाल के इस मामले के कारण आज जो खबरें पिट गई वो इस प्रकार हैं
1. अपारदर्शिता, कंसलटेशन और संवीक्षा की कमी शिक्षा क्षेत्र को खोखला कर रही है।
2. मुंबई के खतरनाक होर्डिंग की मंजूरी देने वाले आईपीएस अफसर की पत्नी के कारोबारी सहयोगी के खाते में पैसे जाने के संकेत
3. प्रश्नपत्र लीक के दावों के बीच एक और परीक्षा टली। दो लाख विज्ञान स्नातकों की परीक्षा है यह सीएसआईआर-नेट
4. प्रोटेम स्पीकर का मामला दही-चीने खिलाने से ज्यादा गर्माया, विपक्ष ने कहा – दलित के खिलाफ पूर्वग्रह, सरकार ने कहा नियमानुसार। इसमें रिवाज परंपरा भूल गये। वह सिर्फ हिन्दुत्व के समय काम आता है।
5. नीट के प्रमुख अभियुक्त किसान के बेटे, प्रभावशाली जूनियर इंजीनियर का परिचय – इंडियन में एक्सप्रेस में पटना से।
6. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा इस साल लू लगने से 143 मौतें; टाइम्स ऑफ इंडिया के आंकड़े इसे 209 बता रहे हैं
7. दिल्ली की मंत्री आतिशी ने ज्यादा पानी के लिए अनिश्चितालीन भूख हड़ताल, पानी सत्याग्रह की शुरुआत की
8. चुनाव आयोग ने जम्मू और कश्मीर तथा तीन राज्यों में चुनाव के लिए काम शुरू किया
9. तमिलनाडू में जहरीली शराब से मरने वाले 47 हुए
10. चुनाव में हार के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने कर्मचारियों को मीडिया से दूर रहने के आदेश दिये
11. नये अपराध कानूनों को एक जुलाई से लागू करना टालने के लिए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को चिट्टी लिखी।
12. एनटीए असल में स्वायतत्ता के लिए नया खतरा है।
आज के सभी अखबारों में अरविन्द केजरीवाल की जमानत स्थगित करने वाली खबर प्रमुखता से है। आप जानते हैं कि उन्हें और आम आदमी पार्टी के दूसरे नेताओं को जमानत नहीं मिलने का कारण उनके खिलाफ पीएमएलए के तहत कार्रवाई होना है और पीएमएलए में अभियुक्त को साबित करना होता है कि वह निर्दोष है। आम तौर पर उल्टा होता है। पीएमएलए के इन प्रावधानों को न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की एक पीठ ने जुलाई 2022 में वैध माना था। न्यायमूर्ति भाजपा के ईनामी जजों में हैं। 29 जुलाई 2022 को रिटायर होने के बाद 27 फरवरी 2024 को उन्हें लोकपाल अध्यक्ष बनाया।
दूसरी ओर, अक्तूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट पीएमएलए प्रावधानों को कायम रखने के अपने फैसले की समीक्षा के लिए राजी हो गया था। मामला कैसे टला उसकी अलग कहानी है। चाहें तो गूगल कर लीजिये। आज जिन पुरानी खबरों की चर्चा है उनके लिंक गूगल कर तलाशे जा सकते हैं। लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस नेता, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने कपिल सिब्बल के साथ बातचीत में कहा है कि धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के प्रावधानों को बरकरार रखने वाला निर्णय “कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।” इसकी समीक्षा की जानी चाहिये और जितनी जल्दी हो उतना अच्छा है। मीडिया में आपने इसकी चर्चा सुनी? मुद्दा यह नहीं होना चाहिये?
आपको याद होगा, अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद पी चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया था। वे कोई 105 दिन जेल में रहे थे। यहां दिलचस्प है कि चिंदबरम जब गृहमंत्री थे तो अमितशाह गिरफ्तार किये गये थे और जेल में रहे थे। उनके नाम जज लोया की संदिग्ध मौत का मामला है। और अनुकूल फैसला देने वाले जज को ईनाम का भी। चिदंबरम पीएमएलए कानून में जेल नहीं गये थे फिर भी उन्हें जमानत मिलने में समय लगा। वे खुद वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं इसके बावजूद। इकनोमिक टाइम्स की एक पुरानी खबर के अनुसार पी चिदंबरम को गिरफ्तारी से सुरक्षा देने से इनकार करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति सुनील गौड़ को रिटायर होने के बाद सरकारी ईनाम मिला और पीएमएलए अपीलेट पंचाट का अध्यक्ष बनाया गया था। खबर से लगता है कि जज साब ने 20 अगस्त को कड़े शब्दों वाला आदेश दिया था, 23 अगस्त को रिटायर हुए और 28 अगस्त को ईनाम पा गये। खबर पढ़ना चाहें तो गूगल कीजिये।
सरकार और सरकारी एजेंसी जनता के पैसों से जब एक मुख्यमंत्री को जेल में रखने और एक नई उभरती पूरी पार्टी को बर्बाद करने पर आमादा है तब गुजरात के कई मामलों के साथ समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट की याद आती है। इस मामले में 68 लोग मारे गये थे। सभी आरोपी छूट गये। इनमें एक प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी हैं जो दूसरे मामले में भी अभियुक्त रहने के बावजूद सांसद रह चुकीं। भाजपा ने उन्हें हिन्दुत्व की कृत्रिम आंधी में उम्मीदवार बनाया था। उसका फायदा उठाया। इस बार जीतने की संभावना कम थी, हार सकती थीं तो उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया गया। लेकिन सीटें तो चाहिये थी इसलिए जिसे उम्मीदवार बनाया और जीते वे पिछली बार भी जीत सकते थे। यह एक अभियुक्त के मुकाबले पार्टी के योग्य कार्यकर्ता की उपेक्षा थी। भले ही उनका अंदरूनी मामला है।

यह है भाजपा की राजनीति और इसमें जजों को दबाव में लेना शामिल है। इसमें केजरीवाल को स्पेशल ट्रीटमेंट मिला कहना और अब जज से संबंधित यह पोस्ट शामिल है। एक आदिवासी मुख्यमंत्री का मामला तो मुद्दा ही नहीं बना। सुप्रीम कोर्ट में पीठ बनी पर जैसा वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा पीठ ने मामले को सुने बिना फैसला कर दिया था। भाजपा सरकार में फैसलों पर टिप्पणी आम है। ऐसा एक दो मामलों में नहीं, अक्सर होता है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट भी अमूमन नीचे के जजों पर ऐसी टिप्पणी नहीं करता है और कारण बताकर अपना काम करता है। राहुल गांधी के मामले में अधिकतम सजा और हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने इतना भर कहा था कि अधिकतम सजा देने का कारण नहीं बताया गया है। मेरे ख्याल से और कोई टीका-टिप्पणी नहीं थी और रहती भी हो तो उनकी चर्चा सार्वजनिक तौर पर नहीं होती है।
अरविन्द केजरीवाल को कथित घोटाले में जेल में रखना जरूरी है जबकि सबूत नहीं है और प्रधानमंत्री ने कहा है कि अनुभवी चोर हैं। भाजपा के एक पूर्व मुख्य मंत्री के लिए पॉस्को के मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, ऐरे गैरे नहीं हैं। ठीक है कि सरकार आतंकवाद के मुकाबले भ्रष्टाचार को महत्व दे। लेकिन ‘इलेक्टोरल बांड से चंदा दो धंधा लो’ की जांच कब होगी, अभी तक क्यों नहीं शुरू हुई पर ना सवाल है ना जवाब। इलेक्टोरल बांड के हजारों करोड़ पर जल्दबाजी नहीं है, केजरीवाल के कथित सौ करोड़ पर इसीलिए ना कि वे भाजपा का विरोध कर रहे हैं।
पाठकों को यह समझने की जरूरत है कि मामला भाजपा के समर्थन या विरोध से नहीं, देश भलाई से जुड़ा हुआ है। हिन्दुत्व की राजनीति से किसी भी गैर हिन्दू का बुरा नहीं होना चाहिये या हिन्दुओं का भला तो नहीं ही हो रहा है, बुरा जो हो रहा है वह देश का है और मंदिर बनाना अगर भलाई है तो बहाई मंदिर और अक्षरधाम में क्या कमी है। समझौता एक्सप्रेस मामले से संबंधित कुछ खास खबरों के शीर्षक इस प्रकार हैं। खबर पढ़ना चाहें तो गूगल कीजिये, कई हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है कि तमाम मामलों में आईटी सेल वालों को विदेश में बदनामी की चिन्ता हो जाती है। प्रधानमंत्री खुद कह आये घर में शादी है पैसे नहीं हैं तो विदेश में बदनामी नहीं हुई। तब नहीं हुई हो, अब उनके तीसरी बार चुने जाने पर भी नहीं हो रही है। इन खबरों से तो नहीं ही हुई थी।
1. समझौता एक्सप्रेस मामले में हरियाण के एंटी टेरर कोर्ट ने स्वामी असीमानंद और तीन अन्य को बरी कर दिया थी।
2. चार आरोपियों को बरी कर दिया, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
3. सरकार ने फैसले को चुनौती नहीं दी, उसका कारण बताया
4. कई गवाह मुकर गये थे, एनआईए कोर्ट ने जो कहा
5. 68 लोग मारे गये थे, सभी आरोपी छूट गये
इसके बावजूद केजरीवाल के मामले में आज के शीर्षक देखिये
1. इंडियन एक्सप्रेस
हाईकोर्ट के फैसला करने तक दिल्ली के मुख्यमंत्री तिहाड़ में रहेंगे (फ्लैग शीर्षक) हाईकोर्ट ने केजरीवाल के जमानत आदेश को 2-3 दिन के लिए निलंबित किया, ईडी की स्टे की अपील पर फैसला सुरक्षित रखा (मुख्य शीर्षक)। निचली अदालत का आदेश विकृत : एएसजी ने ईडी के लिए कहा; स्टे का मतलब होगा, बेल रद्द होना : सिंघवी (उपशीर्षक)। जमानत आदेश में मुख्य न्यायाधीश को कोट किया गया है, अपराध से प्राप्त धन से संबंधित ईडी के दावों की खामियां बताता है।
2. टाइम्स ऑफ इंडिया
जमानत आदेश के खिलाफ ईडी की अपील पर हाईकोर्ट ने केजरीवाल की रिहाई को रोका। अखबार ने इस मामले में ईडी ने क्या कहा और मुख्यमंत्री की ओर से क्या कहा गया – दोनों को सार्वजनिक करके पूरे मामले को जनता के बीच रख दिया है। यही नहीं, ट्रायल कोर्ट के जमानत आदेश की खास बातों को भी, “ईडी पूर्वग्रह के साथ काम कर रहा है : ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश” शीर्षक से तीन कॉलम में छापा है।
3. हिन्दुस्तान टाइम्स
मुख्यमंत्री को जेल में रहना होगा क्योंकि हाईकोर्ट ने जमानत को अगले हफ्ते तक रोक दिया है। बॉक्स में हाईलाइट की हुई बातों में खास है, केजरीवाल को अभी तक कोई राहत नहीं, ईडी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को मिली नियमित जमानत को चुनौती दी है। ट्रायल कोर्ट ने जमानत देते हुए जो मुद्दे उठाये थे और ईडी की खिंचाई की थी क) सीधे केजरीवाल के खिलाफ सबूत की कमी ख) पूरे धन का पता लगाने के लिए स्पष्ट समय सीमा नहीं बता रहा है। 3) पूर्वग्रह के बगैर काम नहीं कर रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड के साथ तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “जमानत के आधार के रूप में जज ने ईडी के ‘संभावित’ पूर्वग्रह प्रत्यक्ष सबूत की कमी का उल्लेख किया”।
4. द हिन्दू
हाईकोर्ट ने अदालत के जमानत आदेश को स्टे कर दिया इसलिए केजरीवाल जेल में ही रहेंगे। इस खबर के साथ अंदर दो खबरें होने की सूचना है क) ईडी पूर्वग्रह के साथ काम कर रहा है ख) आम आदमी पार्टी ने कहा है कि भाजपा में घबराहट है।
5. द टेलीग्राफ
हाईकोर्ट ने केजरीवाल की जमानत को स्टे किया, तानाशाही के खिलाफ शोर मचा।
द हिन्दू की खबर के अनुसार केजरीवाल के वकीलों ने कहा कि जमानत आदेश को स्टे नहीं किया जाये, भले उन्हें वापस जेल भेज दिया जाये। यही हुआ है। मुझे लगता है कि यह कुछ तकनीकी मामला है। जमानत पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। अब फैसले की जल्दी है और जमानत मिल चुकी है। तो यह डर स्वाभाविक है कि जमानत के बाद स्टे से कहीं मामला उलझ न जाये। जो भी हो, ईडी की यह फुर्ती देखने लायक है। खासकर तब जब देश भर में हत्या, बलात्कार और मौत के सैकड़ों मामलों में अभियुक्त छूटते रहे हैं और तमाम पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है। यहां तो अपराध हुआ है इसी के सबूत नहीं हैं। संभवतः इसीलिए अमर उजाला में एक शीर्षक है, हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर निष्कर्ष नहीं दिया। यह अलग बात है कि इससे ऊपर का शीर्षक है, ट्रायल कोर्ट के पास जमानत का विशेषाधिकर नहीं है। (सवाल है कि ऐसा क्यों होना चाहिये और सरकारी वकील को इसका समर्थन करना चाहिये या विरोध?) अमर उजालाकी खबर का हाईलाइट किया हुआ अंश है, “ट्रायल कोर्ट ने हमारा पक्ष ठीक से नहीं सुना: ईडी।” नवोदय टाइम्स में आज एक विशेष खबर है, पूरा मामला पलट सकती है केजरीवाल की जमानत। इसके साथ जो चीजें हाईलाइट की गई हैं वह है – पीएमएलए में आरोपों का उचित आधार न होने पर ही दी जा सकती है जमानत। …. इसलिए इन नेताओं को लंबे समय तक रहना पड़ा जेल में और आलोचना के केंद्र में रहा है प्रावधान। फिर भी सरकार की बदनामी नहीं हो रही है तो इसलिए कि सरकार को इससे आम आदमी पार्टी को बदनाम करना है। मीडिया साथ दे रहा है और मुद्दा गिरफ्तारी, जमानत आदि तो है पीएमएल और ईनामी जज नहीं हैं।




Tarun Diwan
June 23, 2024 at 6:14 pm
You are crowny of judicial Mafia