देवप्रिय अवस्थी-
कुछ अखबारों ने इमरजेंसी और सेंसरशिप लगने के फौरन बाद संपादकीय की जगह ख़ाली छोड़ने का साहस जरूर दिखाया था, लेकिन उन्होंने भी इमरजेंसी की पूरी अवधि में पूरी शिद्दत से सेंसरशिप का पालन किया था. लुक-छिपकर बुलेटिन निकालने वाले बहुत थोड़े से पत्रकार और कार्यकर्ता थे. मुख्य धारा की पत्रकारिता ने इमरजेंसी में वैसे ही घुटने टेके थे जैसे आज बिना इमरजेंसी के टेक रखे हैं. इमरजेंसी और सेंसरशिप हटने के बाद भी अखबारों के मालिक खौफजदा थे. इसके लिए मैं जागरण, कानपुर का उदाहरण देना चाहूंगा.
इमरजेंसी हटने पर मीसा के तहत गिरफ्तार मेरे पिताजी रिहाई के फौरन बाद जेपी और दूसरे नेताओं से मिलने दिल्ली गए थे. वहां उन्हें जेपी की जेल डायरी की एक प्रति मिली(शुरुआत में फोटोकापी से केवल पांच – सात प्रतियां ही तैयार की गई थीं. कानपुर लौटकर उन्होंने वह प्रति मुझे सौंपकर जागरण में उसके अंश प्रकाशित होने की संभावना पता लगाने को कहा. मैंने वह प्रति समाचार संपादक हरिनारायण निगम को दिखाई तो वे उसे मालिक-संपादक नरेंद्र मोहन को दिखाने ले गए. दोनों की चर्चा के बाद डायरी को जागरण के संपादकीय पेज पर मुख्य आलेख के रूप में धारावाहिक छापने का निर्णय हुआ. डायरी के संपादन और अनुवाद की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई.
डायरी के प्रकाशन के छह- सात दिन ही हुए थे कि किसी कार्यक्रम में कानपुर आए सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने नरेंद्र मोहन जी को तलब कर हड़काया कि डायरी छापना बंद करो अन्यथा नतीजा भुगतने को तैयार रहो. शुक्ल ने पूरे विश्वास के साथ यह भी कहा कि कांग्रेस चुनाव जीत रही है. सरकार उसी की बनेगी. नरेंद्र मोहन जी को मन मसोस कर शुक्ल का आदेश मानना पड़ा. डायरी का धारावाहिक प्रकाशन स्थगित कर दिया. चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद डायरी के शेष अंश प्रकाशित किए गए. मेरी याददाश्त के मुताबिक डायरी कुल 20-21 दिन छपी होगी.
इस घटनाक्रम का उल्लेख करने के पीछे मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मुख्य धारा के अखबारों ने इमरजेंसी के दौरान सेंसरशिप का खास विरोध नहीं किया था. दीगर है कि सेंसरशिप समाप्त होने के बाद बहुत से अखबारों ने मुखर होकर इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की खबरें छापीं और इंदिरा गांधी के तानाशाहीपूर्ण रवैए का विरोध किया.
महेश शर्मा-
25 जून विशेष….
हमारे देश के लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल (1975-1977) एक ऐसा विभाजक बिंदु है जिसने हिंदी पत्रकारिता के चरित्र, तेवर और दिशा को पूरी तरह बदल दिया। प्रेस पर सख्त पहरे के बावजूद आधुनिक निर्भीक पत्रकारिता का जन्म हुआ। कुछ पत्रकारों ने आपातकाल पर मुखर विरोध जताया तो कुछ न केवल झुके बल्कि रेंगने वाली मुद्रा में दिखे। इसीलिए कहा जाता है कि भारत में स्वतंत्रता के बाद वास्तव में पत्रकारिता की अग्नि-परीक्षा थी जिसमें कुछ पत्रकारों ने यह परीक्षा पास की तो कई फेल भी हुए। इसलिए स्वतंत्र भारत में हिंदी पत्रकारिता की यात्रा कथा की शुरुआत आपातकाल के दौर से करना उचित ही होगा। इस काल ने पत्रकारिता में उभरती हुई प्रवृत्तियों को उजागर किया था। यानी आपातकाल के पूर्व, मध्य व उत्तर में पत्रकारों का चाल और चेहरा अलग-अलग दिखता रहा।
इस दौर में पत्रकारिता बेनकाब हुई। देश ने देखा कि महामना मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे पत्रकारों के उत्तराधिकारियों की रीढ़ कितनी पिलपिली थी। इमरजेंसी खत्म होने बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी की करारी हार और केंद्र में जनता पार्टी की ताजपोशी हुई। इसे स्वतंत्रता की पुनर्वापसी के रूप में देखा गया। तभी दिल्ली में एक शाम कांस्टीट्यूशन क्लब में दिग्गज पत्रकारों और साहित्यकारों की पश्चाताप सभा हुई जिसमें डॉ लक्ष्मी नारायण, मनोहर श्याम जोशी, राजेंद्र अवस्थी, कन्हैयालाल नंदन, रमेश गौड़ और डॉ महीप सिंह आदि कई दिग्गजों ने खुद को धिक्कारा भी।
सब ने स्वीकारा कि इमरजेंसी के 20 महीनों के दौरान किस तरह उनकी जमात ने कायरता का परिचय दिया। इंदिरा शासन के समक्ष घुटने टेकने वाले रीढ़हीन निकले। इस घटना को वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने अपनी किताब मीडिया: मिशन से बाजारीकरण तक, में एक चैप्टर में बाकायदा जिक्र किया है। ऐसे अनेक लोग भी थे जिन्होंने 25 जून 1975 को इमर्जेंसी लगने से पहले जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का समर्थन किया था। जेपी आंदोलन के पक्ष में ढेरों लेख, कविताएं लिखी थीं।
25 जून 1975 को आपातकाल घोषणा के साथ ही भारतीय लोकतंत्र के साथ-साथ पत्रकारिता के इतिहास का सबसे काला अध्याय शुरू हुआ। ‘सेंसरशिप’ के उस दौर में जहाँ कई दिग्गज अखबारों ने घुटने टेक दिए, वहीं हिंदी पत्रकारिता के कुछ स्तंभों ने प्रतिरोध की ऐसी मशाल जलाई जिसने भविष्य की पत्रकारिता का मार्ग प्रशस्त किया। 1970 के दशक के मध्य तक देश आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने केंद्र सरकार को चुनौती दी।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन ने व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लिया। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली चुनाव मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध ठहराया। इसके बाद राजनीतिक संकट गहरा गया। 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर से देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। इसके साथ ही प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार पत्रों को प्रकाशन से पहले सरकारी अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। सरकार विरोधी समाचार, कार्टून, लेख, संपादकीय या टिप्पणियाँ रोक दी जाती थीं।
हिंदी पत्रकारिता उस दौर में तेजी से जनमानस तक पहुंच बना रही थी। उत्तर भारत में हिंदी अखबारों का प्रभाव बढ़ रहा था। ऐसे में सरकार जानती थी कि यदि हिंदी प्रेस स्वतंत्र रहा तो जनता तक असहमति की आवाज पहुंचती रहेगी। यहीं से हिंदी पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ। “प्रेस सत्ता का प्रवक्ता बने या जनता की आवाज?”
आपातकाल के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन समाचार पत्रों की निगरानी करने लगे। लोग बताते हैं कि कई जगहों पर रात में अखबारों के दफ्तरों में सरकारी अधिकारी बैठाए जाते थे। समाचार छापने से पहले प्रति दिखानी पड़ती थी। सरकार की आलोचना, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, पुलिस अत्याचार, नसबंदी अभियान या विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी खबरें रोक दी जाती थीं। यह केवल खबरों पर नियंत्रण नहीं था; यह विचारों पर नियंत्रण था।
कुछ समाचार पत्रों ने प्रत्यक्ष विरोध करने का साहस दिखाया। ‘नई दुनिया’ ने सेंसरशिप के विरोध में अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिया। यह मौन विरोध था, लेकिन उसका संदेश बहुत गहरा था। “जब बोलने की अनुमति नहीं है, तब यह खालीपन ही सच है।” कानपुर से प्रकाशित ‘दैनिक जागरण’ ने भी खाली संपादकीय प्रकाशित कर विरोध दर्ज कराया। पत्र के संपादक नरेंद्र मोहन जी को जेल में डाल दिया गया था। उस समय यह कदम बेहद जोखिम भरा माना गया। सत्ता इसे खुली चुनौती के रूप में देख रही थी। इन खाली स्थानों ने पाठकों को बता दिया कि अखबार बोलना चाहता है, लेकिन उसकी आवाज दबा दी गई है। यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में प्रतिरोध के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में गिना जाता है।
पत्रकारों का साहस और दमन
आपातकाल में अनेक पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, धमकाया गया या नौकरी से निकाल दिया गया। फोन टैपिंग, निगरानी और दबाव आम बात हो गई थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर समेत कई पत्रकारों को जेल भेज दिया गया। कुलदीप नैयर ने बाद में लिखा कि आपातकाल ने दिखा दिया कि सत्ता सबसे पहले प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करती है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह के मालिक रामनाथ गोयनका ने सरकारी दबाव के बावजूद प्रतिरोध जारी रखा। हिंदी पत्रकारिता पर भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी प्रेस की तुलना में हिंदी पत्रकारिता आर्थिक रूप से अधिक कमजोर थी। सरकारी विज्ञापन बंद होने का डर, लाइसेंस रद्द होने का खतरा और स्थानीय प्रशासन का दबाव अधिक था। इसलिए अनेक हिंदी अखबारों ने समझौते का रास्ता भी चुना। वास्तव में आपातकाल ने पत्रकारिता के भीतर दो धाराएँ स्पष्ट कर दीं। एक सत्ता समर्थक पत्रकारिता और दूसरा प्रतिरोध और लोकतंत्र समर्थक पत्रकारिता।
आपातकाल के दौरान हिंदी पत्रकारिता की कुछ कमजोरियाँ भी सामने आईं। अनेक अखबार सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर थे। छोटे शहरों में प्रशासनिक दबाव अधिक था। पत्रकार भी संगठित नहीं थे। वैचारिक स्वतंत्रता की परंपरा अंग्रेजी प्रेस जितनी मजबूत नहीं थी। इसी कारण बहुत कम हिंदी समाचार पत्र खुलकर विरोध कर पाए। लेकिन यह भी सत्य है कि जो थोड़े लोग डटे रहे, उन्होंने लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी। सेंसरशिप के बावजूद भूमिगत साहित्य, पर्चे और गुप्त पत्रिकाएं प्रकाशित होती रहीं। कई पत्रकारों ने बिना नाम के खबरें प्रसारित कीं।
जेपी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता और पत्रकार साइक्लोस्टाइल मशीनों से पर्चे छापते थे। गांवों और कस्बों तक यह सामग्री पहुंचाई जाती थी। यह “भूमिगत पत्रकारिता” लोकतंत्र की अदृश्य लड़ाई थी। कार्टून, व्यंग्य और संकेतों की पत्रकारिता भी जमकर हुई। सीधी आलोचना संभव नहीं थी, इसलिए कई पत्रकारों और कार्टूनिस्टों ने प्रतीकों और व्यंग्य का सहारा लिया। व्यंग्य लेखों में शासन की कठोरता पर अप्रत्यक्ष चोट की जाती थी। कुछ संपादकों ने धार्मिक, ऐतिहासिक या साहित्यिक प्रतीकों के माध्यम से संदेश देने का प्रयास किया जिसे पाठक समझ जाते थे।
जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा हुई। मार्च 1977 में इंदिरा गांधी की पराजय हुई और जनता पार्टी की सरकार बनी। आपातकाल समाप्त होते ही प्रेस ने राहत की सांस ली। हिंदी पत्रकारिता ने भी आत्ममंथन किया। यह प्रश्न उठने लगा कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं क्यों नहीं थीं। प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है, यदि प्रेस स्वतंत्र नहीं रहेगा तो जनता तक सच नहीं पहुंचेगा। इसी के मद्देनजर द्वितीय प्रेस आयोग गठित हुआ पर उसकी रिपोर्ट आजतक पब्लिश नहीं की गई। क्यों?
आर्थिक स्वतंत्रता आवश्यक है, सरकारी विज्ञापनों पर अत्यधिक निर्भरता पत्रकारिता को कमजोर बनाती है। पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है इमरजेंसी ने सिद्ध किया कि पत्रकार केवल खबर लिखने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी भी है, मौन भी प्रतिरोध हो सकता है, खाली संपादकीय कॉलम आज भी प्रतिरोध के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में गिने जाते हैं। आज भले ही औपचारिक आपातकाल न हो, लेकिन मीडिया पर राजनीतिक, कॉरपोरेट और डिजिटल दबावों की चर्चा लगातार होती रहती है।
ऐसे में 1975 का अनुभव पत्रकारिता को सावधान करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रहती। उसकी रक्षा लगातार करनी पड़ती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का अंधकारमय अध्याय था, लेकिन उसी अंधेरे में हिंदी पत्रकारिता के कुछ दीपक सबसे अधिक चमके। कुछ अखबार सत्ता के साथ खड़े हुए, कुछ डर गए, कुछ समझौता कर बैठे। लेकिन कुछ पत्रकारों और समाचार पत्रों ने अपने सीमित साधनों के बावजूद लोकतंत्र की मशाल बुझने नहीं दी।
खाली छोड़े गए संपादकीय कॉलम केवल सफेद जगहें नहीं थे, वे भारतीय लोकतंत्र की घुटती हुई आवाज थे। आपातकाल ने हिंदी पत्रकारिता को यह सिखाया कि प्रेस की असली शक्ति उसकी मशीनों, पूंजी या प्रसार संख्या में नहीं, बल्कि सत्य बोलने के साहस में निहित होती है।



