नई दिल्ली | अंतरर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक समारोह में राष्ट्र निर्माण में तवायफों एवं शास्त्रीय गायिकाओं के योगदान पर एक चर्चा का आयोजन किया गया।
प्रेस क्लब में आयोजित समारोह में हिंदी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार विमल कुमार की पुस्तक ”तवायफनाम” के बहाने इन भूली बिसरी तवायफों और गायिकाओं को याद किया गया और बताया गया कि देश की संस्कृति के निर्माण में इन का भी बहुत बड़ा योगदान था लेकिन इतिहास में उन्हें जगह नहीं दी गई.
“चोर पुराण “ के लेखक श्री कुमार ने अपनी पुस्तक में 33 भूली बिसरी तवायफों और गायिकाओं पर कविताएं लिखी हैं और उसमें में एक लंबी भूमिका भी लिखी है जिसमें तवायफों के अवदान पर विस्तार से चर्चा की गई है।
उनका का कहना था कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं होता बल्कि वह बल्कि उसका निर्माण देश की जनता ही करती है और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है ।इस आत्मा का निर्माण लेखक कवि कलाकार संगीतकार नर्तक शिल्पकार लोक कलाकार नाटककार आदि करते हैं। अगर देश की संस्कृति कमजोर हुई तो राष्ट्र भी कमजोर होता है।
उनका कहना था कि इतिहास की किताबों में वैसे भी महिलाओं के योगदान की चर्चा कम है और इन तवायफ गायकों के बारे में तो कोई जिक्र ही नहीं मिलता है। देश के बड़े-बड़े इतिहासकारों ने भी उनकी उपेक्षा की है।
उन्होंने कहा कि मलका जान और जोहराबाई से लेकर गौहर जान,जानकी बाई 56 छुरी हुस्ना जान तमंचा जान और कमला झरिया तथा बेगम अख्तर तक इन गायिकाओं की एक लंबी परंपरा रही है ।1857 के बाद आधुनिक भारत में शास्त्रीय संगीत के विकास में इनकी अविस्मरणीय भूमिका रही है। अगर ये नहीं होती तो बड़े गुलाम अली खान, ओंकार नाथ ठाकुर और भीमसेन जोशी जैसे शास्त्रीय गायक नहीं होते। इस पुस्तक में हिंदी फिल्मों की मशहूर हीरोइन नरगिस ,नूतन और सायरा बानो की नानी पर भी कविताएं हैं जो खुद कभी कोठे पर गाती थी
जवाहर लाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की प्रोफेसर डॉ लता सिंह ने इन तवायफ और गायिकाओं के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि पहले यह गायिकाएं नगरों के बीचो-बीच हुआ करती थी लेकिन शहरीकरण का प्रक्रिया में इन्हें शहरों से बाहर धकेल दिया गया और रेड लाइट इलाके बने। उन्होंने कहा कि तवायफ़ का अर्थ वह नहीं जो हम आज समझते हैं लेकिन पितृसत्त्ता की भाषा ने उन्हें बदनाम कर दिया जबकि ये देशभक्त थीं और मानवीय गुणों से भरी थीं।उनमें एक तहज़ीब थी। राष्ट्रीय आंदोलन में भी इन गायिकाओं की भी बड़ी भूमिका थी और गांधी जी ने इन्हें कहा था कि पहले यह अपना पेशा छोड़े और उसके बाद आजादी की लड़ाई में भाग ले लेकिन गांधी जी इन तवायफ़ों के प्रति सहानुभूति रखते थे।
रेडियो और दूरदर्शन से जुड़ी पत्रकार विभा विष्ट ने कहा कि वह तवायफनामा किताब के जरिए ही इन भूली बिसरी गायिकाओं के बारे में जान सकी जिनका शास्त्रीय संगीत में बड़ा योगदान है।
उन्होंने कहा कि यह कविताएं बहुत ही मार्मिक और लोगों के दिलों को छू जाने वाली है। इनमें एक इतिहास भी छिपा हुआ है।
युवा नृत्यांगना सोमा मुखर्जी ने कहा कि नृत्य और संगीत की दुनिया में एक स्त्री कलाकार का संघर्ष ज्यादा बड़ा होता है क्योंकि उनके पास रियाज करने का समय कम होता है । उन्हें अपना परिवार भी चलाना होता है रसोई घर का भी कामकाज करना होता है जबकि पुरुष कलाकार अपने घर में आराम से घँटों रियाज करता है क्योंकि उसकी देखभाल करने के लिए घर में उसकी पत्नी होती है लेकिन स्त्री कलाकारों के साथ यह स्थिति नहीं है ।ऐसे में हम स्त्री कलाकारों का मूल्यांकन करते हुए इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता और स्त्री कलाकार इतिहास में भी जगह नहीं बना पाते हैं।



