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उत्तर प्रदेश

क्या ज़हर खाने या खिलाए जाने से हुई प्रतीक यादव की मौत?

प्रतीक यादव के निधन की खबर से हर कोई स्तब्ध है। बताया जा रहा है कि मंगलवार सुबह करीब 6 बजे उनकी तबीयत फिर अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें दोबारा अस्पताल लाया गया। हालांकि, डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, जब प्रतीक यादव को अस्पताल पहुंचाया गया तब उनकी पल्स पूरी तरह डाउन थी और हार्ट भी काम नहीं कर रहा था। मौत के सही कारणों का पता लगाने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। नीचे पढ़ें…


सचिन गुप्ता-

अखिलेश यादव के सौतेले भाई प्रतीक यादव 30 अप्रैल को गंभीर हालत में लखनऊ के हॉस्पिटल लाए गए। 3 दिन इलाज चला। स्वस्थ होकर घर चले गए। आज सुबह उन्हें 6 बजे फिर हॉस्पिटल लाया गया, यहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

डॉक्टरों ने बताया– प्रतीक को जब हॉस्पिटल लाया गया, तब पल्स पूरी तरह डाउन थी। हार्ट भी रुक चुका था। मौत की वजह जानने के लिए उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। फिटनेस फ्रीक व्यक्ति का अचानक से चले जाना किसी को गले नहीं उतर रहा।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार – प्रतीक यादव की मौत मामले में जहरीले पदार्थ के सेवन की आशंका है!

News 18 से बातचीत में सिविल अस्पताल के निदेशक डॉ. जीपी गुप्ता ने कहा कि उनकी मौत सस्पेक्टेड पॉइजनिंग की वजह से हो सकती है, हालांकि अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आना बाकी है।


अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव की मौत बहुत चिंता और सवाल खड़े करती है। पोस्ट मॉर्टम जांच अभी आनी है लेकिन डॉक्टर मानते हैं ये सस्पेक्टेड पॉइजनिंग का मामला है। कैसे हुई पॉइजनिंग? फ़ूड पॉइजनिंग या कुछ और? जाँच में पता लगेगा। -संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार


विवेक त्रिपाठी-

“दुखद खबर” “समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव का निधन..”

प्रतीक यादव फिटनेस फ्रीक थे.. राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद राजनीति से दूर रहते थे.. प्रतीक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के बेटे थे.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीड्स से पढ़ाई की.. उसके बाद रियल स्टेट और फिटनेस इंडस्ट्री में अपना नाम बनाया.. स्पोर्ट्स कारों की शौकीन थे.. लखनऊ की सड़कों पर अक्सर उनकी फेरारी दौड़ती दिखती थी..

प्रतीक यादव पशु प्रेमी भी थे. उन्होंने जीव आश्रय नाम से एक संस्था बनाई ल जो स्ट्रीट डॉग्स के रेस्क्यू, इलाज, भोजन की व्यवस्था करती है और उनकी देखभाल करती है.. घायल और बेसहारा जानवरों की मदद के लिए वो अभियान चलाते थे.. उनकी पत्नी अपर्णा यादव उत्तर प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष हैं.. पहले समाजवादी पार्टी में थीं लेकिन बाद में भाजपा में शामिल हो गईं. हाल ही में पत्नी से उनका विवाद भी हुआ था.. उन्होंने पत्नी पर गंभीर आरोप भी लगाए थे.. हालांकि, बाद में सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करके उन्होंने सब कुछ ठीक होने की बात भी कही थी..

प्रतीक आज सुबह 6 बजे सिविल अस्पताल लाए गए.. ये कहा जा रहा है कि उनकी मौत घर पर ही हो गई थी.. मौत की वजह का पता नहीं चल सका है. फिलहाल शव का पोस्टमार्टम किया जा रहा है..


कुमार भावेश चंद्र-

एक राजनेता का बेटा और वरिष्ठ पत्रकार की बेटी की प्रेम कहानी कभी यूपी में चर्चा में रहा है.. लेकिन आज इस कहानी के नए मोड़ ने लखनऊ ही नहीं एक बड़े वर्ग को सदमे में डाल दिया…सबकुछ ठीक तो नहीं था दोनों की प्रेम कहानी में एक ऐसा मोड़ आया था जब विवाद उठे..प्रतीक यादव ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट करके अपने बीच पनप रहे विवाद का खुलासा किया..

हालांकि फिर आपसी सहमति से उसे निपटा भी लिया गया और आज सुबह सुबह संदिग्ध हालातों में प्रतीक यादव के निधन की खबर आई..यूपी में सियासत के दिग्गज रहे मुलायम सिंह परिवार से जुड़ी ये कहानी अभी कई और मोड़ ले सकती है..प्रतीक यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के छोटे भाई हैं..दोनों की मां जरूर अलग अलग हैं लेकिन सैफई का ये सियासी परिवार कभी जुटता था तो एकता की मिसालें दी जाती थीं..पारिवारिक संस्कारों की बात होती थी..

प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव की अखिलेश यादव और परिवार के दूसरे बड़े सदस्यों के पांव छूने की तस्वीरें आज भी सोशल मीडिया पर बिखरी पड़ी हैं..आज की घटना इतने बड़े सियासी परिवार में भूचाल लेकर आया है..प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव बीजेपी में हैं और यूपी महिला आयोग की उपाध्यक्ष भी हैं.. पत्नी से सुलह के बाद प्रतीक साथ ही रह रहे थे लेकिन कहा जा रहा है कि कुछ दिनों से उनकी सेहत पहले जैसी नहीं रही..

आज क्या हुआ ये तो सवाल है ही..कई और सवाल हैं जो सियासत और समाज के लोग जानना चाहते हैं..उम्मीद करनी चाहिए कि है ये कहानी रहस्यों से इतर हो जल्द ही सबकुछ सामने आ जाए..


अभिरंजन कुमार-

प्रतीक यादव (मुलायम सिंह यादव के बेटे) और रोहित शेखर (नारायण दत्त तिवारी के बेटे)… दोनों 38-40 की छोटी उम्र में चल बसे। मृत्यु के कारण अलग-अलग रहे होंगे, लेकिन कहानी लगभग एक-सी रही।

मुझे हमेशा ही इस तरह के बच्चों से बहुत सहानुभूति होती है, जिन्हें उनके मां-बाप अपनी मौज मस्ती में पैदा तो कर देते हैं, लेकिन प्यार-दुलार, स्वीकृति और सम्मान देने के मामले में चोर बन जाते हैं।

देखा जाए तो इसमें उन बच्चों का रत्ती भर कसूर नहीं होता, लेकिन उन्हें न केवल माता-पिता द्वारा अवहेलना, बल्कि समाज से भी उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इसके कारण तनाव, डिप्रेशन, कुंठा, संघर्ष, वाद-विवाद उनकी ज़िंदगी का स्थायी तत्व बन जाते हैं और अंततः एक नर्क से भी बदतर जीवन जीते हुए इसी तरह असमय वे काल के गाल में समा जाते हैं।

मुझे लगता है कि ऐसे मामलों में समाज को इन बच्चों से सहानुभूति रखनी चाहिए और उनके माता पिता को अपराधी मानना चाहिए।

यूं हमारे समाज में अवैध सम्बन्धों अथवा विवाहेत्तर संबंधों के लिए आम तौर पर निषेध ही माना जाता रहा है। हाल के वर्षों तक कानूनी रूप से भी यह प्रतिबंधित था, लेकिन मोदी जी के राज में सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2018 में गैरकानूनी मानने से इनकार कर दिया। जिस धारा 497 के तहत यह गैरकानूनी था, उस धारा को ही खत्म कर दिया।

कृपया याद करें कि उस वक्त मैंने इस बारे में कई लंबे-लंबे लेख भी लिखे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के विधि संकाय में कई कानूनविदों और पूर्व न्यायाधीशों के बीच अपनी बात भी रखी। (लिंक कमेंट बॉक्स में)

लेकिन वही नक्कारखाने में तूती की आवाज़। सिस्टम में कोई आपकी सुनने वाला हो, तब न! कभी लगता है कि बोलकर क्या फायदा? खुद ही बुरा बनते हैं और लोगों की आंखों का कांटा बनते हैं!

कभी लगता है कि हम भी नहीं बोले, तो कौन बोलेगा? और, फिर तो हालात और बिगड़ते चले जाएंगे।

यूं देखिए, तो हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा भी इसी द्वंद्व में गुजरता है कि बोलें कि न बोलें। सब अपना-अपना फायदा देख रहे हैं, तो हम भी क्यों नहीं अपना ही फायदा देखें? आखि़र घर-परिवार, बीवी बच्चे तो हमारे भी हैं ही न! पर क्या करें?

अंत में दिल है कि मानता नहीं! रुकते रुकते भी इतना बोल ही जाता हूं कि आप लोगों को भी बहुत बुरा लग जाता है। इसके लिए क्षमा याचना।


उमर फ़ारूक़ अफ़रीदी-

जनवरी में जब प्रतीक यादव ने अपर्णा विष्ट यादव से तलाक को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की थी, उसी समय यह महसूस होने लगा था कि मामला केवल एक सामान्य पारिवारिक विवाद भर नहीं है। जिस तेजी से वह पोस्ट हटवाई गई और उसके बाद जिस तरह पूरे प्रकरण पर अचानक खामोशी छा गई, उसने कई स्वाभाविक सवाल खड़े कर दिए थे। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के निजी संघर्ष अक्सर पर्दों के पीछे दब जाते हैं, लेकिन उनके मानसिक प्रभाव कितने गहरे होते हैं, इस पर समाज शायद ही कभी गंभीरता से विचार करता है।

आज उनकी असमय मृत्यु की खबर सामने आने के बाद वही सवाल और गहरे हो गए हैं। जो लोग उन्हें जानते थे, वे उनके शांत, विनम्र और संतुलित स्वभाव का ज़िक्र करते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि लोग पूछें कि क्या वह किसी गहरे मानसिक दबाव से गुजर रहे थे? क्या उनकी खामोशी के पीछे कोई ऐसा भावनात्मक संघर्ष था जिसे दुनिया समझ नहीं पाई? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि परिस्थितियों, दबावों या किसी संभावित साजिश का वह शिकार हो गए हों? यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि घटनाओं की पूरी श्रृंखला अब भी कई लोगों को असामान्य लगती है।

अपर्णा विष्ट यादव इस समय भाजपा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रही हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से लोगों की निगाहें इस पूरे घटनाक्रम पर और अधिक टिकती हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहाँ प्रभावशाली पदों और राजनीतिक पहचान के बीच कई बार ज़रूरी सवाल दब जाते हैं। यहाँ किसी पर आरोप लगाना उद्देश्य नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में संवेदनशील प्रश्न उठाना भी जरूरी माना जाता है। खासकर तब, जब किसी व्यक्ति की सार्वजनिक चुप्पी, निजी संघर्ष और फिर अचानक हुई मृत्यु समाज को बेचैन कर दे।

प्रतीक यादव अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मृत्यु अपने पीछे कई अनुत्तरित सवाल छोड़ गई है। कभी कभी इंसान की आख़िरी खामोशी ही सबसे बड़ा सवाल बन जाती है और समाज लंबे समय तक उसके जवाब तलाशता रह जाता है।

प्रतीक यादव को विनम्र श्रद्धांजलि, ईश्वर उनके परिवार को इस दुख को सहने की ताकत और हिम्मत दे ।

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