लंबे समय तक साथ काम किया था, उनके एलएमएल स्लेट स्कूटर में बैठकर रांची में कई जगहों पर उनके साथ गया था। मैं बीमार होकर रांची के अस्पताल में भर्ती था तो आप सब मिलने आए थे। साथ बिताए सभी पल याद आ रहे हैं। बहुत दुखद, श्रद्धांजलि…-उत्कर्ष पांडेय
विनय चतुर्वेदी-
प्रवीण प्रियदर्शी (Praveen Priyadarshi) मेरे मित्र, वर्षों तक हम दैनिक जागरण, रांची में साथ रहे। आज यह लिखते हुए अंगुलियां कांप रही हैं कि आपने नश्वर शरीर छोड़ दिया। भाई, आपको भूल नहीं पायेंगे हम सब। आपकी स्मृतियां सदैव जीवित रहेंगी।
विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति: शांति: शांति:
प्रदीप श्रीवास्तव-
दैनिक जागरण रांची के वरिष्ठ पत्रकार मित्र प्रवीण प्रियदर्शी के कारण दैनिक जागरण रांची में करीब पांच साल रहते हुए कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं अपने घर से बाहर हूं। हर संकट में आप मेरे साथ खड़े रहे, मुझे हौसला दिया।
यकीन नहीं हो रहा कि आपने आज साथ छोड़ दिया। आप नहीं रहे, यह लिखते हुए हाथ कांप रहे हैं। आप हमारी यादों में हमेशा जिंदा रहेंगे। अलविदा मित्र।
किसी जर्नलिस्ट के लिए सबसे असहाय स्थिति वह होती है जब शब्द उसका साथ छोड़ दें, वह निःशब्द हो जाए। मैं आज उसी स्थिति में हूं। किसी अपने का यूं अचानक छोड़कर चले जाने का कष्ट क्या होता है मित्र प्रवीन जी के जाने के बाद आज शाम से महसूस कर रहा हूं।
शाम को दैनिक जागरण रांची से मित्र सुनील पांडेय Sunil Pandey का फ़ोन आया कि प्रवीन जी Praveen Priyadarshi नहीं रहे। अभी कुछ दिन पूर्व आपसे बात हुई थी, आपसे मिलने रांची न आने का उलाहना देते हुए आपने रांची आने का निमंत्रण दिया था। तय हुआ था कि बेटी समीक्षा की शादी में रांची आऊंगा। मैं रांची नहीं आ पाया और आप दुनिया छोड़ गए।

वैसे किसी के न रहने पर उसके बारे में अच्छा लिखने की परंपरा रही है लेकिन आप सच में अच्छे थे, बहुत अच्छे थे मित्र। जीवन के अंतिम क्षणों में आपसे न मिल पाने का अपराध बोध जीवन भर रहेगा। मुझे क्षमा करना मित्र।
आलोक शुक्ला-
बहुत दुःखदायी होता है… किसी का यूं बीच राह साथ छोड़ चले जाना। मित्रों का तो और भी। पर, प्राणी करे क्या जब प्रभु ने यही सब दुःख भोगने भेजा है यहां!
प्रभु से प्रार्थना है कि जब उनसे साथ छुड़ा ही दिया तो उन्हें अपने श्री चरणों में रखें। भावभीनी श्रद्धांजलि।



