अपने ही चैनल पर दिखाई खबर पर आलोचना करके तमिलनाडू के पी टी चैनल ने खड़ी की पत्रकारिता की नयी मिसाल

हम आये दिन खबरों में सनसनी फैलाने के मकसद से छोटी सी खबर का तिल का ताड बनते हुए देखते है। न्यूज़ चैनलो और अखबारों को इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं होती की इन सब से समाज पर क्या असर हो रहा है। निंदा किये जाने पर भी ये न्यूज़ चैनल और अखबार अपनी गलती सुधारना तो दूर, मानना भी गंवारा नहीं करते। पर तमिल नाडू के एक न्यूज़ चैनल ने एक छोटा सा कदम उठाकर पत्रकारिता की मिसाल कायम की है।

पिछले दिनों तमिलनाडु में चल रहे एक चर्चित केस के मुख्य अभियुक्त का इंटरव्यू प्रसारित कर पी टी चैनल ने हर ओर सनसनी फैला दी। कई लोगों द्वारा अभियुक्त को मंच प्रदान करने के कारण इस इंटरव्यू की निंदा की गयी। ऐसे समय में आसान था इन बातों को अनदेखा कर अपनी पीठ थपथपाना या यह बताते रहना की किस प्रकार वो बाकी चैनेल से बेहतर हैं। किन्तु इस न्यूज़ चैनल ने अपनी आलोचनाओं को जिस रूप में लिया वह साहसिक भी है और प्रशंसनीय भी। पत्रकारिता की गरिमा को बढाने वाले इस कदम को पढ़ें विस्तार से :

कुछ दिनों पूर्व तमिलनाडु का ‘गोकुल रॉय मर्डर केस’, मीडिया के बीच सुर्खियों में बना रहा। गोकुल राज इंजिनियरिंग की पढाई कर रहा एक दलित युवक था। शुरवाती जांच में आत्महत्या लग रहे इस केस की परतें जब खुलने लगीं तो इसके सारे पहलु बड़ी निर्ममता से हुई हत्या की ओर इशारा करते पाए गए। हर दिन नए खुलासे के कारण इस खबर ने मीडिया के साथ साथ लोगो का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और घटनाक्रम के बीचोबीच जांच कर रहे अधिकारी की आत्महत्या भी एक चर्चा का विषय बन गयी। इन सब के बीच रविवार को पुट्ठी थालामुरई (PT ) चैनल ने इस केस के मुख्य अभियुक्त युवराज का एक इंटरव्यू प्रसारित किया।

पटी चैनल पर युवराज के इंटरव्यू से सनसनी तो फैली किन्तु कई लोगों द्वारा इस फरार अभियुक्त को एक मंच प्रदान करने की निंदा की गयी। इन निंदाओ और चर्चो के मद्देनज़र, चैनल ने अपनी ज़िम्मेदारी को समझा और स्थिति को अनदेखा न कर, अपने प्राइम टाइम में २० मिनट की एक बहस करवाई। इस पूरी बहस के लिए चैनल ने उन लोगों को आमंत्रित किया जो युवराज के इस इंटरव्यू के विरोध में थे ताकि चैनल उनकी बात सुने तथा उनके समक्ष अपना पक्ष रख पाएं। २० मिनट की यह बहस एक स्वस्थ पत्रकारिता का उदहारण पेश करने में सक्षम रही।

पीटी चैनल के शो में चैनल के वरिष्ठ संपादक एम. गुनासेकरण ने अपना पक्ष रखते हुए कहा – “क्या हम इस इंटरव्यू को इस रूप में नहीं ले सकते कि इसी के कारण यह बात सामने आई की पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी ठीक ढंग से नहीं निभा रही है । क्यूंकि उस व्यक्ति को वह आज भी पकड़ने में असमर्थ है, जिस तक हम बड़ी आसानी से पहुँच गए। हम हमेशा सही नहीं हो सकते। पर अगर हम गलत हैं, तो सिविल सोसाइटी और दर्शकों का हक़ बनता है हमें बताने का और हमसे सवाल पूछने का। पीटी की पूरी टीम इस बात पर ध्रुड़ता से विश्वास करती है।”

हालांकि इस चैनल के पक्ष से हर कोई सहमत नहीं होगा, फिर भी अपनी आलोचना को सकारात्मक रूप से ले कर उस पर बहस करवाने की सराहना सभी ने की। पी टी न्यूज़ ने एक ओर जहाँ एक अभियुक्त को आवाज़ दे कर कई लोगों को निराश किया वहीँ दूसरी ओर उसने अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उनलोगों का विश्वास पत्रकारिता से उठने भी नहीं दिया। पत्रकारिता समाज को सूचना देने, मार्ग दिखाने और जागरूक बनाने का माध्यम है। ऐसे में उसकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। प्रतिस्पर्धा हर ओर है, और खुद को बेहतर करने के लिए आवश्यक भी। पर पत्रकारों को सोचना होगा जो प्रतिस्पर्धा समाज की खुशहाली तथा सोच को ख़राब करे, वो कितनी सही है। पी टी न्यूज़ ने सनसनी में बने रहने से कहीं अधिक गलत- सही पर विचार करने को अहमियत दी जिसकी प्रशंसा ज़रूर होनी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं की इनसे प्रेरित हो आगे भी ऐसे उदहारण सामने आयेंगे जो प्रतिस्पर्धा को महत्व देने की बजाय जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता को समझें।

विकास ऋषि की रिपोर्ट. संपर्क: 09973660624, मेल : vikash.makkar@yahoo.com



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