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राजेंद्र माथुर प्रसंग : पत्रकारिता के इकलौते घराने की उपयोगिता

राजेश बादल-

नौ अप्रैल याने बुधवार को भारत की आज़ादी के बाद सबसे प्रखर और मूर्धन्य संपादक राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि का दिन था। वे 1991 में उस समय हमें छोड़कर चले गए, जब इस देश की पत्रकारिता को उनकी सर्वाधिक आवश्यकता थी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, हम पाते हैं कि राजेंद्र माथुर इस मुल्क़ के बौद्धिक मंच पर सबसे अधिक याद किए जा रहे हैं। अपने लेखन के ज़रिए स्वर्गीय माथुर हमें एक ऐसा ख़ज़ाना दे गए हैं ,जो हर दौर में हमें समृद्ध करता रहेगा। इसीलिए हम उनके अलविदा कहने के 34 बरस बाद भी उनको याद करते हैं।

भारत के मिनी मुंबई इंदौर में रहते हुए उन्होंने पत्रकारिता के ऐसे चमकीले अध्याय लिखे, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए रौशनदान का काम करेंगे। आज इंदौर को पत्रकारिता का इकलौता घराना कहा जाता है। इसके बाद उन्होंने लगभग नौ बरस तक नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक रहते हुए बेजोड़ लेखन और पत्रकारिता की।

यह अच्छी बात है कि माथुर जी की स्मृति में इंदौर प्रेस क्लब ने अपने 63वें स्थापना दिवस पर तीन दिन तक शानदार और विचारोत्तेजक जलसे का आयोजन किया। पत्रकारिता और संप्रेषण की सारी विधाओं के प्रमुख हस्ताक्षर इस प्रसंग में शामिल हुए। मैं भी इनमें एक था। मुझे गर्व हासिल है कि मैं 1977 में उनके संपर्क में आया। फिर अगले चौदह साल (उनकी आख़िरी साँस तक) उनके संपर्क में बीते। इस तीन दिनी पत्रकारिता महोत्सव के आग़ाज़ के पहले सत्र का पहला संबोधन मेरा था और समापन व्याख्यान जाने माने चिंतक, विचारक और लेखक पत्रकार पी साईनाथ का रहा। इस दरम्यान विभिन्न सत्रों में जानकारों ने अपनी राय रखी।

इंदौर प्रेस क्लब का अपना भवन है और उसमें एक सभागार राजेंद्र माथुर के नाम पर भी है। ऐतिहासिक सन्दर्भ यह है कि माथुर जी इस क्लब के अध्यक्ष रह चुके थे। इसलिए मैंने इस सभागार के लिए उनकी एक तस्वीर प्रेस क्लब को भेंट की। तस्वीर का महत्त्व यह है कि नौ अप्रैल 1991 को ही मैंने इसे फ्रेम में लगवाया था। मुझे लगा कि इंदौर प्रेस क्लब इसका वास्तविक हक़दार है। इसके अलावा मैंने अपनी पुस्तकें – सदी का संपादक : राजेंद्र माथुर और शब्दसितारे तथा मिस्टर मीडिया इंदौर प्रेसक्लब को भेंट की।

बता दूँ कि तीनों किताबों में राजेंद्र माथुर जी को गहराई से याद किया गया है। मिस्टर मीडिया तो एक ऐसी किताब है, जो पत्रकारिता की सभी विधाओं के पतन पर तीख़े प्रहार करती है। जब मैं यह पुस्तकें अध्यक्ष अरविन्द तिवारी जी को भेंट कर रहा था तो मुझे सोलह साल पहले की याद ताज़ी हो गई। इसी प्रेस क्लब के सभागार में राजेंद्र माथुर पर केंद्रित मेरी फ़िल्म – कलम का महानायक का पहला प्रदर्शन हुआ था।

अब बात इस जलसे में मेरे सत्र की। विषय था पत्रकारिता का इंदौर घराना। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी इसके सूत्रधार थे। क़रीब 45 साल पहले नई दुनिया में हम लोग साथ काम कर चुके थे। सत्र में मेरे साथी थे इंदौर की पत्रकारिता के तीन और नक्षत्र-अमर उजाला के समूह संपादक भाई यशवंत व्यास, अमर उजाला डिज़िटल के मुखिया भाई जयदीप कर्णिक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु भाई विजय मनोहर तिवारी। सभी ने अपने दिलचस्प अंदाज़ में पत्रकारिता के इस इंदौर घराने की गाथा और संस्मरण सुनाए।

मैंने अपने संबोधन में सवाल उठाया कि हिंदी का पहला अख़बार और अड़तालीस साल पहले रविवार जैसी पत्रिका निकालने वाला कोलकाता पत्रकारिता का घराना नहीं बना, बनारस, कानपुर, लखनऊ, जयपुर और पटना जैसे शहर अच्छे अखबारों के प्रकाशन स्थल तो बने, मगर घराने नहीं बन पाए। यहाँ तक कि नई दिल्ली से नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और हिन्दुस्तान जैसे समाचार पत्र निकल रहे हैं, पर दिल्ली का नाम कभी पत्रकारिता के तीर्थ की तरह नहीं लिया जाता। यह संबोधन तो सिर्फ़ इंदौर को प्राप्त है।

यहाँ से राहुल बारपुते, शरद जोशी, राजेंद्र माथुर, डॉक्टर रणवीर सक्सेना, वसंत पोतदार, प्रभाष जोशी और माणिक चंद वाजपेयी जैसे पत्रकारिता के सितारे चमके और देखते ही देखते भारत में छा गए। इनमें से लगभग सभी का सफर एक दूसरे के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन सबकी पत्रकारिता अपनी विशिष्ट सुगंध के साथ अलग-अलग उपस्थित है। ठीक वैसे ही जैसे किसी बगीचे में अलग अलग फूल अपनी अपनी सुगंध के साथ रहते हैं। कोई फूल अपनी गंध दूसरे फूल पर थोपने की कोशिश नहीं करता। इसी तरह राहुल बारपुते राजेंद्र माथुर को लाए, लेकिन अपनी शैली उन पर नहीं थोपी।

इसी शहर में संपादकाचार्य बनारसीदास चतुर्वेदी महाविद्यालय में प्रवक्ता बनकर आते हैं और यहाँ से सेन्स ऑफ़ हयूमर के अंदाज़ अपने भीतर उतारते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। यही घराने का संस्कार होता है। इंदौर में इन महानुभावों ने अपनी पत्रकारिता के ज़रिए जो काम किया, उसका असर आज की पीढ़ियों में भी दिखाई देता है। मैंने अनुरोध किया कि आज इंदौर से आस है कि पत्रकारिता में पतन के दौर को रोकने में सहायता करे।

सभी साथी पत्रकारों ने अपने दिलचस्प ढंग से इस घराने का विश्लेषण किया। कुल मिलाकर यह एक वैचारिक रूप से झकझोरने वाला सत्र था। इस शानदार जलसे के लिए प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविन्द तिवारी और उनकी टीम के लिए बधाई तो बनती है।

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