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उत्तर प्रदेश

पत्रकार रंजन बाजपेई उत्पीड़न मामले में NHRC का हस्तक्षेप, उन्नाव पुलिस से मांगा जवाब!

उन्नाव। पत्रकार रंजन बाजपेई के साथ पुलिस उत्पीड़न, अवैध हिरासत और फर्जी मुकदमे का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। इस प्रकरण में अब तक उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग (SHRC) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) दोनों हस्तक्षेप कर चुके हैं। पीड़ित का आरोप है कि यह पूरी कार्रवाई तत्कालीन उपजिलाधिकारी उदित नारायण सेंगर की सह पर पुलिस द्वारा की गई।

मामले की शुरुआत उस समय हुई जब पत्रकार रंजन बाजपेई द्वारा अवैध खनन और प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़ी रिपोर्टिंग लगातार की जा रही थी। आरोप है कि इसी रिपोर्टिंग से नाराज होकर प्रशासनिक दबाव में पुलिस ने कार्रवाई की। पीड़ित का कहना है कि उपजिलाधिकारी उदित नारायण सेंगर के प्रभाव और निर्देशों के तहत पुलिस ने उनके खिलाफ पहले से दर्ज फर्जी मुकदमे में साजिशन नाम बढ़वा कर गलत कार्यवाही कराई।

शिकायत के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उनके घर में जबरन प्रवेश कर परिजनों के सामने मारपीट, अवैध हिरासत और मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना की। इस दौरान मोबाइल फोन व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट करने के प्रयास भी किए गए। बाद में उन्हें एक ऐसे मुकदमे में फंसाया गया, जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था।

पीड़ित का दावा है कि जिस मामले में उन्हें फंसाया गया, उस समय की सीसीटीवी फुटेज सहित ठोस साक्ष्य मौजूद हैं, जो उनकी बेगुनाही साबित करते हैं। इसके बावजूद अब तक न तो मुकदमे की निष्पक्ष जांच हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई।

मामले को राष्ट्रीय स्तर पर तब प्रमुखता मिली, जब इस पूरे घटनाक्रम को भड़ास फॉर मीडिया ने विस्तार से प्रकाशित किया। भड़ास में छपी रिपोर्ट के बाद यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता और प्रशासनिक दमन के उदाहरण के रूप में चर्चा में आया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए 05 दिसंबर 2025 को उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने पुलिस अधीक्षक, उन्नाव को नोटिस जारी कर शिकायतकर्ता को साथ लेकर जांच कर 19 जनवरी 2026 तक रिपोर्ट देने के निर्देश दिए।

इसके बाद 07 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी आरोपों को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए उन्नाव पुलिस से Action Taken Report तलब की। NHRC ने अपने आदेश में कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और अभिव्यक्ति की आज़ादी का सीधा उल्लंघन है।

राज्य और राष्ट्रीय—दोनों मानवाधिकार आयोगों के हस्तक्षेप के बाद अब यह मामला केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित न रहकर प्रशासनिक भूमिका और जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

“एक साल से ज्यादा बीत गया, अब मानवाधिकार से ही न्याय की आस”

इस पूरे मामले को एक साल से अधिक समय बीत चुका है। पत्रकार रंजन बाजपेई का कहना है कि उन्होंने जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारियों से लेकर शासन स्तर तक कई बार गुहार लगाई, लेकिन कहीं भी उनकी सुनवाई नहीं हुई।

पीड़ित के अनुसार, जिस मुकदमे में उन्हें फंसाया गया, उसमें सीसीटीवी फुटेज और अन्य ठोस साक्ष्य मौजूद हैं, इसके बावजूद वह लगातार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

उनका कहना है कि अब उन्हें केवल मानवाधिकार आयोगों से ही न्याय की उम्मीद बची है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर प्रशासन और पुलिस से उन्हें न्याय नहीं मिल पाया।

सवाल यह है कि जब साक्ष्य मौजूद हैं, तो फिर एक पत्रकार को कब तक न्याय के लिए भटकना पड़ेगा?

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