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साहित्य

हिंदी पत्रकारिता के गोदी मीडिया बनने तक का विश्लेषण करती है किताब ‘रफ नोट्स’

कुमार दिनेश प्रियमन-

लगभग चार दशक पहले विश्व व्यापार संगठन (WTO) के गठन के बाद से कथित वैश्वीकरण का नया साम्राज्यवादी दौर शुरु हु‌आ। पूरी दु‌निया नई आर्थिक नीति के तहत बाजार के जरिए जीवन के हर क्षेत्र में बहुत तेज गति से बदलनी शुरु हुई। विश्व बाजार पर कब्जेदारी वाले कारपोरेट घरानों के ताकतवर देशों ने उसे नाम दिया- आर्थिक उदारीकरण।

दुनिया भर के देशों के राजनीतिक नेतृत्व के साथ पूंजी के गठबंधन के जरिए बाजार ने मनुष्य समाज को जिस उपभोक्तावादी रास्ते पर ढकेलना शुरू किया। सारे संचार माध्यम इस बदलाव के सबसे प्रबल और प्रभावकारी प्रचार माध्यम बन गए। पत्रकारिता को मीडिया में बदलने और समाचारों को सूचना का नियोजित उत्पाद बनाने का सिलसिला तेज हुआ और आज हालत उस मुकाम तक पहुँचा दी गई कि पत्रकारिता जो कभी विचार का जरिया थी आज पूरी तरह सूचना उपभोक्ताओं का उत्पाद बन चुकी है।

पत्रकार-लेखक महेश शर्मा की किताब ‘रफ़ नोट्स’ इसी बदलाव का जिंद‌गीनामा है, जिसमें आजादी के बाद की पत्र‌कारिता का सफर तो है ही, इस बात के भी सूत्र बखूबी मौजूद है कि कैसे कल के पत्रकारों को मीडियाकर्मी में रिड्‌यूस कर दिया गया है।

मूलतः उन्नाव के अर्ध शहरी जिले से कानपुर महानगर में जीविका के लिए सेटेल हुए ‘रफ नोट्स’ के लेखक महेश शर्मा प्राइवेट मील में नौकरी करते हुए पत्रकारिता में शिफ्ट होते हैं। लगभग डेढ़ सौ पेज की किताब ‘रफ नोट्स’ हिंदी पत्रकार और उसकी पत्रकारिता को मीडिया में बदलने की इसी अंतरयात्रा को केन्द्र में रखती है।

अपनी भूमिका में महेश शर्मा हिंदी पत्रकारिता को मीडिया और मीडिया को गोदी मीडिया बनने के कारणों, संदेहों और विसंगतियों का वैचारिक विश्लेषण करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल पहचान के लिए नोबेल पुरस्कारों के सम्मान से नवाजे गए पत्रकारों का उल्लेख करते हुए उसे मीडिया के वैश्विक पहचान का उजला पक्ष मानते हैं। किंतु सच तो यह है कि अपनी विश्व प्रतिष्ठा के बावजूद नोबेल पुरस्कार भी आज विश्व बाजार के विज्ञापन का एक जरिया बना दिया गया है डिजिटलीकरण के इस दौर में फेक न्यूज, पेड न्यूज, पोर्टल, यूट्‌यूब आदि ने सोशल मीडिया का जो नैरेटिव गढ़ा है, उसने पत्रकारिता को ‘पोस्ट ट्रुथ’ के एक नये आभासी और अविश्वरतीच मुहाने पर ला दिया है।

रफ नोट्स का अनुक्रम इक्कीस आलेखों में निबद्ध है। आलेखों में पत्रकार लेखक के जीवन के तीन दशकों का सिलसिला है। इनमें आजाद भारत के आखिरी लगभग तीन दशकों की हिंदी पत्रकारिता की अन्दरुनी तहों में लिपट पत्रकार महेश शर्मा का जीवन, देश की राजनीति, चारों ओर फैला भारतीय समाज और उसकी दुश्वारियाँ हैं। पत्रकारिता के मीडिया के रुपान्तरण, उसके अतीत को वर्तमान तक लाने में महेश शर्मा की वर्णनात्मक शैली उनके स्वभाव, व्यवहार के अनुरूप भाषा के जिस खिलंदड़ शैली में व्यक्त हुई है, वह उनकी निजी है।

यह शैलीगत निजता ही ‘रफ नोट्स’ के लेखकीय प्रभाव को रोचक और काफी हद तक मौलिक बनाती है। इन आलेखों की भाषा, कहने का अंदाज़ और लहजा जिसे लेखक ने ‘कनपुरिया’ यानी कानपुर की शैली में कहना पसंद किया है, हिंदी की भाषागत आंचलिकता का हँसमुख स्वाद देती है।

हाँ, वह वैसी ही उन्मुक्त, आजाद, खिलंदड़ और हँसोड़ है भी। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों में रची-बसी, व्याकरण की वर्जनाओं से मुक्त और बीच-बीच में उर्दू की शेरो-शायरी के तड़के की गंध ने पूरी किताब को पठनीयता के लालित्य से समृद्ध किया है| यहाँ पाठक को अभिव्यक्ति की ईमानदारी और अल्मन्यता मुक्त लेखन की बानगी मिलती है।

विकास प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित ‘रफ नोट्स’ ‘पत्रकार महेश शर्मा को हिंदी की खिलंदड शैली का ऐसा लेखक बनाती है जिसमें जीवन संघर्ष की दुश्वारियां तो हैं, अवसाद और हताशा बिलकुल नहीं है। इस सबके बावजूद काश! वह अपनी किताब का अंत सत्तावादी राजनेताओं के साथ अपनी चित्रावली से बचा पाते।

दरअसल यह समझना जरूरी है कि एक पत्रकारिता चाहे जितना मीडियाकर्म में बदलने के लिए मजबूर की जाय लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में उसे खुद को, मथे, थोड़ा ही सही, बचाए और बनाए रखने की जिम्मेदारी सत्तावादी राजनीति के गलबहियां होने से नहीं, उसके प्रतिरोध की ताकत से पूरी होगी।


बता दें कि रफ नोट्स के बाद पत्रकार महेश शर्मा अपनी दूसरी पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिता-बे-मिसाल 200 साल पर काम कर रहे हैं। हिंदी पत्रकारिता का यह सफर भले ही कोलकाता (कलकत्ता) से 1826 में शुरू हुआ हो पर श्रेय कनपुरिया पंडित जुगुल किशोर शुक्ल को जाता है जिन्होंने कलकत्ता जाकर उद्दंतमार्तण्ड का प्रकाशन शुरू किया था। आसान नहीं था पर कर दिखाया। महेश जी ने हिंदी पत्रकारिता सफरनामे को चार काल खंडों में बांटा है। लगता तो है पुस्तक पठनीय होगी। छपकर आने दीजिये तभी पता चलेगा कि कंटेंट कितना रिच है।’

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