संत समीर-
आन्दोलन के साथी रहे रूपेश पाण्डेय जी की स्मृति में दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में कल की श्रद्धांजलि सभा में कई लोगों ने मार्मिक संस्मरण सुनाए। इन्दिरा गान्धी कला केन्द्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय की प्रेरणा और भाई राकेश सिंह जी की सक्रियता से यह ज़रूरी आयोजन बहुत अच्छे-से सम्पन्न हुआ।
संचालन की ज़िम्मेदारी मेरी थी तो मैंने बीच-बीच में रूपेश जी के संग-साथ वाली कुछ फुटकर बातें सुनाईं, पर जिन लोगों ने शिद्दत से उन्हें याद किया, उनमें रामबदादुर राय के अलावा, विचारक गोविन्दाचार्य, अयोध्या के पूर्व सांसद लल्लू सिंह, वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अवधेश कुमार, कृपलानी संस्थान के सचिव और आज़ादी बचाओ आन्दोलन के शुरुआती साथी अभय प्रताप, आकाशवाणी में सलाहकार उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार मनोज झा, विनोद सिंह, विमल कुमार सिंह आदि प्रमुख थे। शुरुआती दौर के पत्रकार साथी सुजीत कुमार, प्रदीप कुमार सिंह, सञ्जीव जी, सन्दीप जोशी जैसे कई लोग भी मौजूद थे।
रूपेश भाई ने अपना पूरा जीवन समाजकर्म को समर्पित किया था। बेहद सादा जीवन जीते थे। इलाहाबाद में रहते हुए नब्बे के दशक में जब हम लोगों ने आज़ादी बचाओ आन्दोलन शुरू किया, तो रूपेश भाई को आन्दोलन से जोड़ने का काम विशेष रूप से अभय प्रताप जी ने किया था। बाद के दिनों में जब आन्दोलन के साथियों को पता चला कि उनकी पृष्ठभूमि विद्यार्थी परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक के साथ की रही है, तो कई साथी उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखते थे और कई तरह के सवाल करते थे।
इसका बड़ा कारण यह था कि उस समय के हम नौजवानों में से ज़्यादातर का रिश्ता प्रगतिवादी आन्दोलनों से कुछ ज़्यादा हुआ करता था। मार्क्सवादी विद्यार्थी संगठन आइसा वग़ैरह ही हमें असली क्रान्तिकारी लगते थे। आजकल फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय मित्र बोधिसत्त्व ने मुझे भी जनवादी लेखक संघ से जोड़ रखा था तो मेरा भी झुकाव गान्धीवाद के साथ-साथ उधर ही ज़्यादा रहता था। आन्दोलन मुख्य रूप से गान्धीवादियों का था और बताने की ज़रूरत नहीं है कि हम गान्धीवादी लोग तमाम वजहों से दक्षिणपन्थ से कुछ दूरी बनाकर ही चलना पसन्द करते थे। बाद में कुछ ऐसे अनुभव हुए कि विचारधाराओं में मेरी आस्था नहीं रही। अपने लिए बस इतना ही कि अच्छे कहीं भी अच्छे और बुरे हर कहीं बुरे।

बहरहाल, रूपेश भाई धीरे-धीरे हम लोगों के परिवार के अनिवार्य हिस्से-से बनते गए और बाद के दिनों में तो उनके बिना शायद ही कोई कार्यक्रम आगे बढ़ता। जब लोग थकने लगते तो रूपेश भाई अकेले दम पर हिम्मत दिखाते और आगे बढ़ते। हर काम में आगे रहते। ग़ज़ब की ऊर्जा उनमें थी। ख़ूब यायावरी की, देश के जाने कितने लोगों के साथ रहे और जाने कितनों को मुश्किलों में सम्बल दिया।
जिसको भी ज़रूरत पड़ी, उन्होंने उन सबकी यथासम्भव मदद की, पर दुर्भाग्य कि उनकी ही बीमारी के अन्तिम दिनों में उनके साथ खड़े होने वाले बहुत कम लोग थे।
मेरे जैसे उनके पुराने मित्र का हाल यह था कि जब मैं मण्डावली और शालीमार गार्डन में रहता था तो वे दिल्ली आते तो आमतौर पर मेरे घर पर ही रुकते थे, पर इधर कुछ समय से मैं भी उनका ठीक से हालचाल नहीं ले पाया था। एक बार फ़ोन पर बात हुई तो ख़राब तबीयत के चलते ठीक से बोल नहीं पा रहे थे। कुछ दिनों बाद पता चला कि उनका स्वास्थ्य कुछ बेहतरी की ओर है।
मेरी पत्नी ने कहा कि गाँव की यात्रा से लौटकर हम बच्चों के साथ रूपेश भाई के पास चलेंगे, ताकि उन्हें कुछ हौसला मिले, पर दुर्भाग्य कि हम लौटे तो उनकी मृत्यु की ख़बर हमारे पास थी।
रूपेश जी राजीव दीक्षित के साथ ख़ूब रहे और यह अजीब संयोग है कि दोनों की जन्म-मत्यु का दिन एक है। 30 नवम्बर, 1967 को राजीव दीक्षित पैदा हुए थे और 30 नवम्बर, 1973 रूपेश जी का जन्मदिन है। सन् 2010 में 30 नवम्बर की रात को राजीव जी का देहान्त हुआ था, तो बीते 30 नवम्बर की रात को रूपेश भाई का भी देहावसान हुआ।
आख़िरी समय में उन्होंने जगह-जगह घूमकर ‘भारत-कथा’ सुनाने का एक उपक्रम शुरू किया था, पर आधी उम्र जीकर वे बहुत कुछ अधूरा छोड़ गए। इस वजह से भी उनके प्रति वेदना कुछ ज़्यादा गहरी है।



