ज्ञानेंद्र शुक्ला-
….वाह अश्रुपूरित मन पुलकित हो गया, थाइमस एवं पिट्यूटरी ग्लैंड तक गदगद हो गए ऐसे ‘घोर ईमानदार’ अमात्य के बारे में पढ़कर!
-एक साथ ४४ फ्लैट की रजिस्ट्री ‘दैवीय पौरुष’ कार्य है!
-संभव है ये महानुभाव पीएम आवास योजना में इन फ्लैट्स का दान करना चाहते हों वाया ईडी-आईटी!
-ऐसे ‘प्रचंड कर्मठ’ अफसरों की जीवनी पाठ्यपुस्तकों में दर्ज हो ताकि नौनिहाल प्रेरित हों और कुबेरकृपा प्राप्ति को तत्पर हों!
-कई बार प्रतीत होता है कि ऐसे अफसरान यूपी को भले न बना पाएं पर स्व परिवार को ‘वन ट्रिलियन डॉलर’ की इकानॉमी बना सकेंगे!
कुछ प्रतिक्रियाएँ-
Raju Govind- काल्पनिक बकवास है।पता नहीं अखबार ऐसे कॉलम क्यों छापते हैं कि जिनकी खबर सिर्फ उनके पत्रकारों को होती है।अगर खबर है तो पाठक तक संपूर्णता में पहुंचनी चाहिए। पाठक पैसे देता है,पत्रकारों को स्वांतः सुखाय खबर लिखने के लिए पाठक के साथ धोखा नहीं करना चाहिए।अगर वाकई ऐसा हुआ है तो उस अधिकारी का नाम पाठकों तक पहुंचना ही चाहिए ।खबर लिखने वाले को पता है,उसके दो चार पत्रकार दोस्तों को पता है,तो इससे पाठक का क्या वास्ता ?
Gyanendra Shukla- सर अब बकवास है कि नहीं ये तो अखबार वाले ही बता सकेंगे पर एक आईएएस ने सफाई देते हुए इन प्रापर्टीज को रिश्तेदारों की बताया है. नोटबंदी के दौरान हमारे एक बिल्डर साथी से एक प्रमुख सचिव स्तर के अफसर ने दो फ्लोर खरीदने और कैश में पेमेंट का आफर दिया था, एक फ्लैट चालीस लाख के करीब था कुल दस फ्लैट थे, पर भविष्य की किसी जांच में फंसने के भय से उसने इस डील को नकार दिया था।
Manikant shukla- भैया, पूरी नौकरशाही का यही हाल है, 7-8 साल पहले जब मैं लखनऊ में जमीन खरीदना चाह रहा था तब एक जमीन पसंद आई, उसका जब मोल भाव करने लगा तब प्रॉपर्टी डीलर ने बताया कि जमीन के दाम एक बड़े आईएएस अधिकारी तय करेंगे। लखनऊ के सारे पाश इलाकों में ज्यादातर जमीन आलाधिकारियों की है।


