गुणानंद जखमोला-
एक सहाराकर्मी ऐसा भी… अखबार बंद, उम्मीदों के दरवाजे बंद, अब कर्ज में डूबी जिंदगी… तमाम उम्र अनुभव बटोरने में कट गयी, अब कैसे कटेगी बाकी की जिंदगी।
नाम विजय पंवार। उम्र 59 साल सात महीने। काम डीटीपी आपरेटर, अब बेरोजगार। विजय को महज पांच महीने बाद रिटायर्ड होना था लेकिन 8 जनवरी को जब वह शाम लगभग साढ़े पांच बजे राष्ट्रीय सहारा देहरादून कार्यालय पहुंचा तो गार्ड बोला, पंवार जी अखबार बंद हो गया। घर जाओ। कल इस्तीफा देने आ जाना। विजय पंवार के कदम ठिठक गये। काटो तो खून नहीं। जिस कंपनी को 30 साल दे दिये, वह आज टका सा जवाब दे रही है कि जाओ घर। पांच महीने की सेलरी भी नहीं दी।

विजय पंवार की कहानी कोई फेयरी टेल नहीं है, जीवन की बेहद कड़वी सच्चाई है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के सिलगढ़ गांव में जन्में विजय पंवार ने 17 साल की उम्र में रोजगार के लिए गांव छोड़ दिया। देश के विभिन्न शहरों में वक्त के झंझावात झेले। चपरासी से फोटाग्राफर और फिर कम्पयूटर आपरेटर से डीटीपी आपरेटर। जीवन भर की तरक्की यही रही। एक सम्मानजनक जीवन की विजय की यही परिभाषा है। यानी मेहनत और जी लगाकर काम करना।
विजय पंवार राष्ट्रीय सहारा का पेज वन बनाता था। ले-आउट में महारत हासिल कर ली थी। सहारा में उसके दिन अच्छे कटे। समय पर सेलरी और अन्य सुविधाएं थीं। 2014 के बाद जब सहाराश्री जेल गये तो एक बार फिर मुसीबतें बढ़ गयी। सेलरी आधी मिलना, समय पर न मिलना और गेच्युटी, पीएफ जमा न होना। संकेत दे रहा था कि टाइटेनिक की तर्ज पर सहारा डूब रहा है। जो समझदार थे वो छोड़ गये। लेकिन विजय उम्र के इस पड़ाव में कहां जाता? सो टिका रहा और 8 जनवरी को डूब गया।
कुछ संस्कार ऐसे होते हैं वो आपके जीवन भर साथ नहीं छोड़ते। मां ने कहा था कि उपकार करते रहना। मां की यही सीख अब विजय की मुसीबत बन गयी है। विजय समय-समय पर दूसरों की मदद करता है। कई बार धोखा भी खाया, लेकिन अक्ल नहीं आयी। इस बार तो हद ही हो गयी कि किसी साथी को उसके बच्चे की मदद के लिए मोटा कर्ज दिलवाकर गारंटर बन गया। कर्ज लेने वाला रफूचक्कर है और अब ब्याज की किस्त विजय चुका रहा।
विजय के मुताबिक पांच महीने से सेलरी नहीं मिली। किराये के मकान में है। गांव बच्चों के लिए पैसा भेजना होता है। वेतन मिला नहीं, अखबार बंद हो गया और अब दोस्तों-रिश्तेदारों के दरवाजे भी बंद हैं। कर्ज की किश्त तो चुका नहीं पा रहा लेकिन जिससे दूसरे की मदद के लिए पैसे लिए वो ब्याज छोड़ने को तैयार नहीं।
विजय लाचार है, मजबूर है, बेबस और हताश है। उसकी समझ में नहीं आ रहा कि जीवन में हासिल हुआ क्या? ये बात सहारा प्रबंधन और सहारा के मालिकों को समझ में नहीं आएगी। हजारों विजयों का पैसा हड़़प् कर विदेश बस गये या किनारा कर लिया। अब कोई बताए कि विजय करें तो क्या करें?




Arun Srivastava
January 28, 2026 at 3:50 pm
सहारा समूह ने विजय जैसे न जाने कितनों को बेसहारा कर दिया। कइयों ने तो ज़ाने दे दी।
हालांकि कि कुछ लोग करोड़पति भी बन गए।
विजय के जज्बे को सलाम ✊