
ओम थानवी-
आजतक के साहित्य उत्सव का हल्ला देखकर लगता है मानो आयोजक ही उसे सनसनी बना रहे हों, जैसे ख़बरों को बनाया जाता है। बहरहाल, सवाल उत्सव में शामिल होने न होने का उतना बड़ा नहीं, जितना साहित्य को किसी ख़तरनाक उत्पाद की छाया या प्रचार मुहैया कराना है।
मुझे हँसी आई जब देखा कि “साहित्य के सितारों” के बीच अपने बदनाम ऐंकर को भी प्रतिष्ठित किया जा रहा है। उसके दीदार — “मिलने का मौक़ा” — के लिए 499 रुपए की फ़ीस लगाई गई है। यह साहित्य की ओट में निहायत बुरा काम है।
सुधीर चौधरी को आजतक ने किनके कहने से रखा या वे वहाँ क्या कर रहे हैं, यह खोज का विषय नहीं है। लेकिन याद रखना चाहिए कि पत्रकार के रूप में 100 करोड़ रुपए की रिश्वत माँगने के आरोप में वे तिहाड़ होकर आए हैं। एक निर्दोष शिक्षिका उमा खुराना को चौधरी के चैनल लाइव इंडिया — जिसके वे सीईओ और संपादक थे — ने फ़रज़ी स्टिंग से जिस्मफ़रोशी की गुनहगार ठहरा दिया था। ख़बर देखकर शिक्षिका पर भीड़ ने जानलेवा हमला किया। बाद में चैनल की साज़िश का भांडा पुलिस की जाँच में फूट गया।
क्या आप जानते हैं कि फ़ीस लेकर दर्शन देने वाले स्टार-ऐंकर ने एक बार मुझे भी विवाद में घसीटने की चेष्टा की थी? 2016 की बात है। नामवर सिंह जी के जन्मदिन पर आइआइसी में राजकमल प्रकाशन का जश्न था (नामवरजी पहुँच नहीं पाए)। साहित्य और पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। किसी बात पर कवि पंकज सिंह (अब दिवंगत) से मेरी कहासुनी हो गई। सुधीर चौधरी ने पता नहीं क्यों ट्वीट किया कि मुझसे मारपीट हो गई। यह कवि को भी कपोल-कल्पित हिंसा में बदनाम करने वाली अफ़वाह थी।
सुधीर चौधरी ने ट्वीट में झूठ बोलकर अपना चरित्र उजागर कर दिया। मुझे ट्रोल करने वाले तबके ने उनके झूठ को हाथोंहाथ लिया और चौधरी की रची अफ़वाह को मेरे ख़िलाफ़ आगे से आगे किया।
झूठ टिकता नहीं। उस आयोजन में विष्णु नागर, अब्दुल बिस्मिल्लाह, पंकज बिष्ट आदि अनेक लेखक थे। विष्णु नागर ने फ़ेसबुक पर एक टिप्पणी लिखकर झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया।
बाद में ‘समयांतर’ में संपादक पंकज बिष्ट ने ‘सोशल मीडिया की असामाजिकता’ शीर्षक से लिखी अपनी टिप्पणी में आगाह किया कि “विरोधियों को आतंकित करने, चुप करने, बदनाम करने और आम जनता को भ्रमित करने के लिए सोशल मीडिया का अत्यंत आक्रामक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है; विशेषकर भाजपा-आरएसएस समर्थकों ने इस काम में महारत हासिल कर ली है।”
सोचता हूँ 499 का टिकट लेकर जाऊँ और स्टार-ऐंकर से पूछ आऊँ कि तुम्हें अपने कुकर्मों पर शर्म क्यों नहीं आती?




Ajay Setis
November 13, 2024 at 3:41 pm
ओम थानवी भी यह बता ही दें कि पत्रकार ने होते हुए उन्हें किसकी सिफारिश पर राजस्थान पत्रिका में नौकरी मिली थी । फिर किस की सिफारिश पर जनसत्ता में चले गए थे । यह भी बता दें कि उन्होंने जिंदगी में कितने लेख लिखे । वह संपादक की जगह जनसत्ता में थानेदार की तरह व्यवहार करते थे । जनसत्ता का स्टाफ उनकी पीठ पीछे उन्हें थानेदार ही कहता था । वह यह भी बता दें कि लोकसभा से कार का पास हासिल करने के लिए उन्होंने कितने पापड़ बेले थे । संपादक होते हुए राज्यसभा का स्थाई पास हासिल करने के लिए क्या उन्होंने संवाददाता का कार्ड नहीं बनवाया था, क्या उन्होंने भैरों सिंह शेखावत पर राज्यसभा के स्थाई पास के लिए दबाव नहीं डाला था, लेकिन भैरों सिंह शेखावत ने नियमों की अवहेलना करने से इंकार कर दिया था । वह कितने निष्पक्ष संपादक थे कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ लिखे गए लेखों को रद्दी की टोकरी में फैंक देते थे , वह पत्रकारिता कर रहे थे या राजनीति । यह भी बता दें कि विश्वविद्यालय के वायस चांसलर कैसे और किस की सेवा करके बने । शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों के घरों पत्थर नहीं फेंकते ।