मनीष दुबे-
लल्लनटॉप के पूर्व संपादक और अब The Indian Express के हिंदी प्लेटफॉर्म में नई पारी शुरू करने वाले चर्चित पत्रकार सौरभ द्विवेदी इन दिनों अपने गांव चमारी (जालौन) को लेकर चर्चा में हैं। वजह है—गांव में उनके द्वारा बनवाई गई एक आधुनिक लाइब्रेरी, जिसका कल ही भव्य लोकार्पण हुआ है।
लोकार्पण के बाद से सोशल मीडिया पर चमारी के वीडियो और तस्वीरों की बाढ़ सी आ गई। छोटे से गांव में बना यह पुस्तकालय अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।
सबसे पहले यह साफ कर देना चाहिए कि सौरभ द्विवेदी ने अपने गांव में जो पहल की है, वह सराहनीय है। अपने दादा के नाम पर बनाई गई इस लाइब्रेरी में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए पढ़ने-लिखने की व्यवस्था की गई है। वातानुकूलित रीडिंग हॉल, टीवी देखने की सुविधा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।
लाइब्रेरी की एक और दिलचस्प बात इसका ऊपरी हिस्सा है, जहां एक विश्रामगृह बनाया गया है। यहां दूर-दराज से आने वाले लोग ठहर सकेंगे। माना जा रहा है कि यहां कलाकार, पत्रकार, लेखक और सार्वजनिक जीवन के लोग भी आकर ठहरेंगे और शायद गांव में संवाद और गतिविधियों का नया माहौल बनेगा।
लेकिन इस लाइब्रेरी के लोकार्पण ने सबसे ज्यादा ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि कार्यक्रम में शामिल होने वालों की सूची किसी छोटे-मोटे गांव के कार्यक्रम से कहीं ज्यादा बड़ी और प्रभावशाली थी।
कार्यक्रम में जो लोग शामिल हुए-
- कैलाश सत्यार्थी (नोबेल विजेता)
- हरिवंश (उपसभापति)
- विकाश दिव्यकीर्ति (प्रसिद्ध शिक्षक)
- कुमार विश्वास (प्रसिद्ध कवि)
- ज़ाकिर ख़ान (फेमस कॉमेडियन)
- सोनाली बेंद्रे (अभिनेत्री)
- गिरिजा ओक (अभिनेत्री)
- बृजेश पाठक (उपमुख्यमंत्री)
- धनंजय सिंह (पूर्व सांसद)
- अभिजीत सिंह सांगा (विधायक बिठूर)
- स्वतंत्र देव सिंह (जल शक्ति मंत्री)
उरई के पास बसे छोटे से गांव चमारी में इतने बड़े नामों की मौजूदगी ने न सिर्फ जालौन बल्कि पूरे यूपी के लोगों को भी हैरान और उत्साहित कर दिया। गांव में मानो एक अलग ही माहौल बन गया।
दरअसल सौरभ द्विवेदी करीब 12 साल तक India Today Group के साथ जुड़े रहे और The Lallantop की कमान लंबे समय तक उनके हाथ में रही। इस दौरान उन्होंने देशभर में यात्राएं कीं, इंटरव्यू किए और धीरे-धीरे एक ऐसा दौर आया जब लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन गए।
इसी मंच ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी—और उसी पहचान के साथ उनके संपर्कों का दायरा भी लगातार बढ़ता गया। वक्त के साथ ये पेशेवर रिश्ते कई जगह निजी संबंधों में भी बदलते गए।
चमारी के इस कार्यक्रम में जुटे चेहरे दरअसल उसी नेटवर्क और प्रभाव की झलक भी दिखाते हैं, जो पत्रकारिता के लंबे सफर में सौरभ ने बनाया।
हालांकि सोशल मीडिया है, तो तंज भी चलेंगे ही। कुछ जलनखोर लोग यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि—
“भाई साहब ने सारे कनेक्शन लगा दिए… थोड़ा और जोर लगाते तो मोदी जी भी आ ही जाते!”
खैर, तंज अपनी जगह है। लेकिन इतना तय है कि एक छोटे से गांव में लाइब्रेरी बनाकर सौरभ द्विवेदी ने कम से कम एक ऐसा काम जरूर किया है, जो चर्चा से आगे जाकर आने वाले समय में बच्चों और युवाओं के काम आ सकता है—और अगर ऐसा हुआ, तो चमारी की यह लाइब्रेरी सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मिसाल बन सकती है।



