विजय मनोहर तिवारी-
“जंजीर’ का आइडिया आते ही एक प्रकाश मेहरा को एक अमिताभ बच्चन मिल गए थे। सौरभ द्विवेदी का और कमलेश सिंह का साथ चंडीगढ़ से था। सौरभ की प्रतिभा से वे भलीभाँति परिचित थे। अखबारों से विमुख और टीवी चैनलों से निराश देश की युवा पीढ़ी के लिए “लल्लनटॉप कंटेंट’ को जुटाने, गूंथने, बेलने, सेंकने, पकाने और परोसने के लिए जिस एक लीड कैरेक्टर की कल्पना उन्होंने की होगी, वह सौरभ द्विवेदी के रूप में उनके पास ही था। सौरभ की यह नई यात्रा अगले दस साल में उन्हें वहाँ लेकर गई, जहाँ से दो दिन पहले उन्होंने एक विराम लिया है…
बात तब की है जब दैनिक भास्कर समूह ने संडे जैकेट शुरू किया था। हर समय कुछ नया, कुछ अलग और कुछ बड़ा करने के लिए तत्पर एमडी सुधीर अग्रवाल अखबार का लुक और फील दोनों ही बदलने की तैयारी में थे। उनकी मंशा के अनुरूप इस काम के लिए नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक एक ऐसी टीम खड़ी कर रहे थे, जो देश भर में तरह-तरह के विषयों पर कवर स्टोरी पर काम करेगी। खासकर उन राज्यों में जहाँ दैनिक भास्कर नहीं है। दक्षिण और उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों सहित पश्चिम बंगाल।
नेशनल न्यूजरूम में मेरा चयन हो चुका था। सौरभ द्विवेदी तब चंडीगढ़ एडिशन में थे, जहाँ इंडिया टुडे समूह से आए कमलेश सिंह स्टेट एडिटर हुआ करते थे। एक बार सौरभ भोपाल बुलाए गए। मैं तब कल्पेशजी की टीम में आ चुका था। सौरभ मेरे घर आए। वे भोपाल की आबोहवा टटोल रहे थे। कल्पेशजी ने सौरभ को भी स्पेशल रिपोर्टिंग के लिए देश भर की यात्राएँ करने का प्रस्ताव दिया था। मगर वे बिल्कुल इच्छुक नहीं थे और आए भी नहीं। मुझे लगा कि वे चंडीगढ़ में सुखी जीवन बिता रहे होंगे इसलिए यह प्रस्ताव आकर्षक नहीं लगा होगा। मैं कुछ अलग हालातों में उनसे जुड़ा था या जोड़ा गया था। सुखी जीवन तब एक सपना था। है तो आज भी।
कुछ समय बाद हमने देखा कि कमलेश सिंह गाजे-बाजे से भोपाल आ गए हैं। सुना कि नेशनल न्यूजरूम दो हिस्सों में विभाजित होने वाला है। एक विचार पक्ष, दूसरा समाचार पक्ष। एक हिस्से को कल्पेशजी संभालेंगे और आधी सल्तनत पर कमलेश सिंह का राज्याभिषेक होगा। उसी फ्लोर पर कमलेश सिंह का ऑफिस तैयार हुआ, जिससे चार-पाँच केबिन आगे कल्पेशजी एकछत्र विराजते थे।
कमलेशजी के आने के बाद हमने कल्पेशजी की बॉडी लेंग्वेज बदलती हुई साफ देखी। पहले वे संडे जैकेट के दिशा-निर्देश एडिटर शरद गुप्ता को देकर शनिवार शाम जल्दी इंदौर निकल जाया करते थे मगर कमलेशजी के आने के बाद उनका रवैया बदला। पहली बार हमने उन्हें गहरे असुरक्षा बोध से घिरा हुआ अनुभव किया। संडे जैकेट और बाकी के पेजों पर उन्होंने अपनी पकड़ को ऐसा मजबूत बनाए रखा कि मजाल है कोई पेज कमलेशजी के पास चला जाए।
कमलेश सिंह की कोई रुचि दफ्तरों की ऐसी अंदरुनी उठापटक और दावपेंच में नहीं थी। उनका आसमान बड़ा और खुला था। वे बहुत पढ़ाकू और शानदार लेखनी के मालिक और अपने सहयोगियों के लिए मित्रवत् थे। गोपाल कांडा कांड पर उनकी फ्रंट पेज स्टोरी की भाषा और बुनावट मुग्ध करने वाली थी। ऐसे कई उदाहरण हैं। कल्पेशजी ने भी उनके चंडीगढ़ रहते हुए उनकी लेखनी का खूब उपयोग किया था।
कमलेशजी के भोपाल आने से भोपाल का मौसम बदल गया था। कल्पेशजी को शायद यह भय रहा हो कि कहीं उनका विकल्प तो नहीं ढूँढ लिया गया है। शायद कुर्सी खतरे में लगी हो। इसलिए अनावश्यक ही कमलेशजी से वे अतिरिक्त सतर्क रहने लगे। जबकि कमलेशजी का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वे कुछ भी ऐसा-वैसा करते। वे कल्पेशजी को बहुत सम्मान देते थे।
नेशनल न्यूजरूम की कार्यप्रणाली में उनकी कोई बड़ी और स्पष्ट भूमिका बनती इसके पहले ही एक दिन पता चला कि उन्होंने दैनिक भास्कर को अलविदा कह दिया है। कल्पेशजी के चेहरे की मुस्कान में चार चाँद लग गए थे। अब उनकी सत्ता अटल थी। मगर सत्ता कभी किसी की कहीं भी अटल नहीं होती और अपना अंत स्वयं लिखती है।
कमलेशजी वापस इंडिया टुडे समूह में दिल्ली जा विराजे। वे न्यूज डायरेक्टर डिजिटल हैं। उनके पीछे सौरभ द्विवेदी ने भी चंडीगढ़ में दैनिक भास्कर को अलविदा कह दिया। जहाँ तक मेरी जानकारी है, वे आज तक न्यूज चैनल में गए थे मगर कई बार तकदीर को कुछ और ही मंजूर होता है। सौरभ के लिए एक नई दिशा तैयार हो रही थी। एक मीटिंग में यूँ ही एक ऐसे डिजिटल मंच का विचार कमलेशजी के मस्तिष्क में कौंधा, जो युवा दर्शकों को उनकी ही भाषा में कुछ अलग लेकर आए।
सवाल यह आया कि उसका नाम क्या और कैसा हो? मुँह से निकला- “कुछ ऐसा जो लल्लनटॉप हो।’ बस नामकरण हो गया- “द लल्लन टॉप।’ इंडिया टुडे समूह के प्रबंधकों ने इसे आसानी से स्वीकार नहीं किया। वह उनकी कार्य और शब्द शैली के अनुरूप नहीं था। बाजार में इसका क्या असर होगा, यह सोचा गया। मगर कमलेशजी जानते थे कि यह कमाल करेगा इसलिए इससे बेहतर नाम इस मंच के टारगेट ग्रुप के लिए कुछ नहीं हो सकता। इंडिया टुडे के निर्णायकों ने आरंभ में बहुत तवज्जो न देते हुए बुझे मन से ही इसे स्वीकार किया।
जीवन कई संयोगों और दुर्योगों के बीच से आकार लेता है। मीडिया, फिल्म और फैशन ऐसे आसमान हैं, जहाँ संयोग और सौभाग्य भी उतना ही योग करते हैं, जितना प्रतिभा और परिश्रम। कई बार अधिक ही। साँप सीढ़ी के खेल की तरह सही समय पर एक सही निर्णय एक सीढ़ी तक ले आता है और आप सीधे ऊपर की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। गलत समय पर गलत व्यक्ति के साथ एक गलत निर्णय ठीक इसका उल्टा करते हुए साँप के मुंह तक भी ले आता है। तब प्रतिभा और परिश्रम बेकार चला जाता है। किसी भी ऊंचाई पर पहुँचे हुए लोगों के निर्माण में बहुत सारी ईंटें, पत्थर, रेत और सीमेंट लगा होता है। यह अच्छे सहयोगियों, मार्गदर्शकों, मित्रों और बॉस के रूप में कोई भी हो सकता है।
सौरभ को एक मंच मिला था। वे नाकाम भी हो सकते थे। हो सकता है कि “द लल्लनटॉप’ एक बुझा हुआ सा ब्रांड बनकर इंडिया टुडे समूह के शोरूम में एक उपेक्षित गुमटी सा रखा कहीं कोने में सरक रहा होता। मगर सौरभ की प्रतिभा और परिश्रम ने यहाँ अपना योग करना आरंभ किया। जितना मैं जानता हूँ, उनकी सबसे बड़ी शक्ति है उनकी अध्ययनशीलता। वे उतने ही पढ़ाकू हैं, जितना लंबी दूरी वाले किसी भी मीडिया के धावक को होना चाहिए। अपने से अधिक पढ़ने, लिखने और समझने वालों की सोहबत उनका दूसरा बड़ा गुण है। सहजता और व्यवहारकुशलता उन्हें पारिवारिक संस्कारों से ही मिली होगी।
लल्लनटॉप के संविधान में युवाओं को उनकी ही भाषा और स्वभाव के अनुरूप रुचिकर कंटेंट तैयार करने का प्रावधान था और हमने देखा कि कैसे इस मंच ने कंटेंट से ठसाठस भरे डिजिटल आकाश में भीषण कोलाहल के बीच अपनी चमकदार और मीठी सी जगह बनाई।
“गॉड और अल्लाह’ के अस्तित्व पर हाल ही में एक आखिरी डिबेट के वे सूत्रधार थे, जिसमें दो मुस्लिम आमने-सामने किए गए। एक ठोस दिमाग का मगरिब की तरफ मुँह किए हुए था, जो आसमानी दावों को लच्छेदार लेंग्वेज में बॉल की तरह फेंक रहा था और दूसरे ने मगरिब की जानिब से कब की पीठ फेर रखी थी। “परमात्मा या ईश्वर’ की भारतीय अवधारणा के किसी भी प्रतिनिधि को डिबेट से बाहर रखने का अर्थ यह रहा होगा कि उस पर कोई शक -सवाल नहीं है। इस डिबेट को लाखों लोगों ने देखा और इंटरनेट मीडिया पर लाखों टीका-टिप्पणियाँ तैरीं। मैं औचित्य में नहीं जाऊंगा मगर मुझे नहीं लगता कि कोई न्यूज एंकर इस बहस को ड्राइव कर पाता।
मीडिया से बाहर के मेरे बहुत से मित्र हैं, जो सौरभ के शोज के दीवाने रहे। लल्लनटॉप की लोकप्रियता उन युवाओं के दायरे से पार जा फैली, जो इस नए मंच के लक्ष्य के रूप में कभी कमलेशजी की कल्पना में रहे होंगे मगर इसका श्रेय मैं सौरभ को बराबर दूंगा। अपने काम को जुनून से जीना एक ऐसा गुण है, जो सौरभ जैसे व्यक्तित्व को गढ़ता ही है।
दैनिक भास्कर से इंडिया टुडे समूह में आकर अगर वे “आज तक’ चैनल में बने रहते तो भी सब उन्हें पहचानते ही मगर सौरभ द्विवेदी का व्यक्तित्व इतना शायद ही वहाँ खिलकर सामने आ पाता। चकल्लसों से भरे ज्यादातर बकवास न्यूज चैनलों के बीच आज तक भी सीनियर सिटीजन लेडियों के सहारे एक बुझी हुई लालटेन सा बनकर रह गया है। उनके बीच सौरभ के सौरभ बनने की संभावनाएँ सीमित थीं, कॅरिअर बेशक चलता रहता।
मीडिया के धूल-धुआँ में लल्लनटॉप को एक ताजी हवा के झोंके की तरह लाने का श्रेय सौरभ को है। मगर सौरभ का चुनाव करने वाले कमलेश सिंह की पैनी नजर को भी इक्कीस तोपों की सलामी बनती है। पता नहीं आज कल्पेश याज्ञनिक होते तो अपने सामने से गुजरे मीडिया के इन दोनों महानुभावों के बारे में क्या कहते?



