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सुख-दुख

अमर उजाला का वह कौन संपादक था जिस पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिंह थूकना भी नहीं चाहते!

अनिल सिंह-

मां-बाप ने यह देह प्रकृति के सहयोग बनाई। मन को खुद मैंने पहले उनके व समाज के सहयोग और फिर अपने अध्ययन-मनन, चिंतन व कर्म से बनाया। आज मैं 63 साल का हो गया। आगे 65, 70 और बहुत हुआ तो 75, देह की जो हालत मैंने बना रखी है, उसमें वो इससे ज्यादा नहीं चल सकता। उसका राख व मिट्टी बनना तय है। लेकिन मैं काम का कुछ सार्थक बना सका या लिख सका तो मन की निरंतरता बनी रहेगी। नहीं तो वो भी वतन की वादियों में सांस बनकर घुल जाएगा। इससे दूर जाने की न तो इच्छा है और न ही कुव्वत। अपने मुल्क और माटी से बेपनाह मोहब्बत है ही इतनी कमबख्त कि मरने पर भी बहुत दूर जाने नहीं देगी। जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे।

पिताजी ने सालों पहले कहा था कि हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए। लेकिन कभी फुरसत से हिसाब लगाना कि तुमने जो किया, उससे क्या पाया और क्या खोया। 1981 में गणित में एमएससी की पढ़ाई के बाद अब तक के 43 साल का हिसाब लगाता हूं तो पाता हूं कि मैंने सिर्फ खोया ही खोया है और जो मिला, वो बिना कुछ खास किए अपने-आप मिला। न जाने क्यों कभी ज्यादा कुछ पाने की लालसा ही नहीं रही। सुख-सुविधाएं, पद-प्रतिष्ठा मुझे काट खाने को दौड़ती रहीं।

रामजी राय भाई ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान अपने गांव के एक बच्चे का किस्सा सुनाया था। मां के साथ बच्चा नंग-धडंग रहता था। कोलकाता में कमा रहा उसका बाप घर आया तो कुछ कपड़े-लत्ते ले लाया। मां ने बच्चे को नहला-धुलाकर नए कपड़े पहना खेलने भेज दिया। लेकिन बच्चा कुछ ही देर बाद कपड़े फाड़कर पहले जैसा ही नंग-धड़ंग लौट आया और मां के पूछने पर बोला – माई! ऊ कपड़वा त देहियां में काटत रहल। मेरा हाल भी कमोबेश उसी बच्चे जैसा रहा। जब भी जो मिला, उससे कोई मोह पाले बिना फेंकता गया, लुटाता गया। आपको जानकर हैरत होगी कि अपने लिखे सैकड़ों लेखों में किसी की कोई कतरन मैंने कभी अपने पास नहीं रखी।

साल 2003 में एनडीटीवी इंडिया में नौकरी के दौरान सोचा कि कार खरीद लूं। वसुंधरा गाज़ियाबाद का घर बेचा था और जर्मनी में दो साल कमाई का धन भी बचा था तो बेधड़क खरीदकर चलाने लगा। 2004 में मुंबई सीएनबीसी आवाज़ में आया तो कार साथ ले आया। लेकिन कभी उसकी सवारी की इच्छा ही नहीं हुई। सोसायटी में रखी कार झंझट लगने लगी। अंततः 2007 में मुंबई से दिल्ली ले जाकर ₹3.80 लाख की कार ₹2.25 लाख में मारुति को वापस बेच दी और चैन की सांस ली।

1989 में दिल्ली आकर नौकरी का सिलसिला शुरू किया। लेकिन कोई भी नौकरी दो साल से ज्यादा नहीं की। अमर उजाला समूह को छोड़कर, जहां मैंने करीब साढ़े सात साल नौकरी की। वो भी इसलिए क्योंकि वहां ले जाने वाले शख्स ने मुझे तब तक नहीं छोड़ा, जब तक उसका स्वार्थ सधता था। जब स्वार्थ सध गया तो उसने कह दिया कि तुम्हें हिंदी की बिंदी के अलावा आता ही क्या है। बात सुनकर मैं अंदर से हिल गया। अपनी डायरी में घर जाकर मैंने लिखा – मैं सरस्वती का पुत्र, सूरज का बेटा किसी बौने के कहने भर से छोटा तो नहीं हो जाता। बाद में उसने अपने पाप का प्रायश्चित किया या मुझे रास्ते से हटाकर एक तीर से दो निशाने लगा दिए, इस बारे में मैं पक्का नहीं सकता। लेकिन उसी के कहने पर कुलदीप कुमार ने मुझे जर्मनी के रेडियो डॉयचे वेले में नौकरी दिलवा दी, जिसके लिए मैं ताजिंदगी कुलदीप जी का आभारी रहूंगा।

खैर, मैंने इतने साल अपने अत्याचारी का साथ इसलिए दिया क्योंकि 1990 में जब मैं दिल्ली में नौकरी के लिए डग्गेमारी कर रहा था, तब उसने उदयन शर्मा से कहकर हिंदी संडे ऑब्जर्वर में मुफ्त का ट्रेनी रखवा दिया था। मैं पहली नौकरी देने के उसके एहसान के नीचे ऐसा दबा कि जब टाइम्स रिसर्च फाउंडेशन (टीआरएफ) में बतौर ट्रेनी मेरा चयन हो गया और मुझ पर कृपालु, सुरेंद्र प्रताप सिंह या एसपी सिंह के नाम से मशहूर कद्दावर संपादक चाहते थे कि मैं 10-11 महीने की ट्रेनिंग के बाद नवभारत टाइम्स में ही नौकरी करूं, तब इसने मुझसे कहा कि तुम एसपी से मिलो ही मत और चुपचाप दैनिक जागरण से मिला सब-एडिटर का ऑफर स्वीकार कर लो।

उसके बाद आजतक लॉन्च होने के ठीक पहले एसपी अमर उजाला के अंसल भवन स्थित ऑफिस आए। उन्होंने इससे कहा कि मैं तो इस लड़के को अपने साथ ले जाना चाहता था और ये है कि मुंह उधर करके बैठा है। तब इसने कहा था कि आप इसे ले जाएंगे तो हमारा काम कैसे चलेगा। बाद में समाजवादी व अर्थशास्त्री का चोंगा ओढ़कर बैठे इस बौने शख्स के बारे में इतनी घृणित बातें पता चलीं कि आज मैं उस पर थूकना भी नहीं पसंद करूंगा।

वैसे, मुझे आजतक की शुरुआती टीम में न जा पाने का कोई मलाल न तब था और न ही कभी बाद में हुआ। शायद इसकी वजह यह थी कि मैं इतना कुछ छोड़कर आया था कि मुझे कुछ पाने की इच्छा ही नहीं थी। पढ़ाई छोड़ी, करियर छोड़ा, प्यार छोड़ा, घर-बार छोड़ा।

आठ-दस साल तक सब छोड़-छाड़कर बुद्ध और कबीर बनने के लिए पराए गांवों, कस्बों व शहरों के गरीब घरों की शरण में रहने के बाद पत्रकारिता जैसे पेशे से धन कमाने या पद-प्रतिष्ठा पाने की कोई चाह अंदर नहीं बची थी। प्रसंगवश बता दूं कि संभवतः 1980-81 में मैं पत्रकारिता के पेशे को समझने के लिए दिल्ली आया था और जेएनयू में उर्मिलेश जी के कमरे में कुछ दिन ठहरा था। उनके साथ बहादुरशाह जफर रोड पर टहलते हुए मैंने सोचा कि यह कैसा वाहियात पेशा है जिसमें शाम को दारू पिए बिना रीढ़ की हड्डी ही नहीं सीधी होती। फिर मैं वापस इलाहाबाद लौट गया था।

कुछ साल पहले तब दैनिक जागरण के ब्यूरो में काम कर रहे अपने अमर उजाला कारोबार के दिनों के साथी एसपी सिंह से दिल्ली में मिला तो उन्होंने कहा कि आपने कभी कुछ चाहा ही नहीं, चाहते तो न जाने क्या-क्या पा सकते थे। मैंने उनकी बात पर गौर किया तो पाया कि मैंने तो लीक छोड़कर चलने की अपनी यात्रा ही अपने लिखे इस नीति-वाक्य से की थी कि जब अभाव में करोड़ों ज़िंदगियां तबाह हो रही हैं तो उनके साथ एक और जिंदगी के तबाह हो जाने में क्या हर्ज है!

आज भी अपनी दुनिया में मस्त रहता हूं। न कुछ पाने की खुशी और न ही कुछ छूट जाने का गम। कुटुम्ब चलाने भर का इंतजाम हो जाता है। नशा-पत्ती सब छोड़ चुका हूं। दवाओं का खर्च निकल आता है। किसी ‘साधु-संत’ को कुछ देने की स्थिति नहीं है। लेकिन किसी के आगे कभी हाथ फैलाने की नौबत भी नहीं आती।

एक तरह का संतोष है कि अभी तक किसी के साथ छल नहीं किया। अपने तरीके से जीवन किया। कोई मेरा रोल मॉडल नहीं, न ही मैंने किसी की नकल की। नौकरी करते हुए अमर उजाला कारोबार में नंबर दो का पद मिला। लेकिन कभी कोई दो नंबरी काम नहीं किया। न ही कभी पद का दुरुपयोग किया। साथ काम करनेवाले किसी मातहत को कभी दबाया नहीं। जितना हो सकता था, सभी को आगे बढ़ाया।

इसकी तस्दीक विप्लव राही, संदीप त्रिपाठी, विभास अवस्थी और शिशिर सिन्हा जैसे गुणीजन कर सकते हैं। बस एक चीज़ रह गई है जिसे मैं अभी तक नहीं छोड़ पाया। वो है मेरा अहंकार या कहें तो गुरूर। मेरे साथ स्कूली दिनों से ही दिक्कत यह है कि मैं किसी भी तोप-तमंचे को अपने आगे कभी कुछ नहीं सेटता। हो सकता है कि यह भाव नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में अमीर घरों के बच्चों के बीच गरीब घर का होने से उपजी हीनताग्रंथि से उपजा हो। लेकिन अभी तक इससे मुक्त नहीं हो पाया हूं। इसे मुक्त हुए बिना मैं अंदर से खाली नहीं हो सकता तो मेरी मुक्ति का रास्ता भी नहीं खुल सकता।

आप सभी ने मेरा एकालाप पढ़ा, इसके लिए आप सभी का तहेदिल से आभार और शुक्रिया। साथ ही जिन मित्रों ने मैसेज में जन्मदिन की बधाई भेजी हैं, उनका भी बहुत-बहुत धन्यवाद।

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2 Comments

2 Comments

  1. नलिनी रंजन

    September 28, 2024 at 8:41 pm

    अनिल जी, वह संपादक सारे फ़ैसले आपसे करवाता था- चाहे किसी को रखना हो,निकालना हो; पगार बढ़ानी हो या घटानी हो। मुझे उम्मीद है उस संपादक के निर्देश पर लिए गए कई ग़लत फ़ैसलों पर आपको अफ़सोस ज़रूर होगा!

  2. Mp varshney

    September 29, 2024 at 10:29 am

    दरअसल आपकी इस पीढ़ा से वाकिफ होना एक ऐसिड उदाहरण है जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, कर्म करते रहो वत्स। इस तरह के लोग के जीवन में एक समय आता है और तब यह गीत बजता है,बाकी जो कुछ बचा घटिया शुभचिंतक खा गये।

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