नितिन त्रिपाठी-
आप सबने अपोलो 13 मूवी देखी होगी – ह्यूस्टन वी गॉट ए प्रॉब्लम. उस समय ह्यूस्टन में नासा में जो कंट्रोल सेंटर था, अब वह पुराना हो गया है तो उसे पब्लिक के लिये ओपन कर दिया गया है, कोई भी वहाँ जा सकता है.

वहाँ जाकर वह सिस्टम देखिए जिन्हें प्रयोग कर मनुष्य चंद्रमा में गये थे अचरज होता है. यद्यपि उस समय के हिसाब से वह सिस्टम तीस साल एडवांस थे, पर आज के समय से देखेंगे तो वह बीस साल पुराने लगेंगे. बीस बीस किलो के कंप्यूटर थे जो अपोलो अंतरिक्ष यान में रखे जाते थे. 36 किलो बाइट मेमोरी थी कंप्यूटर की. आज आपका फ़ोन इससे कई हज़ार गुना ज्यादा फिक्स मेमोरी रखता है जीबी में. कंप्यूटर का प्रोसेसर की फ्रीक्वेंसी 0.043 MHZ थी. आज आईफ़ोन की फ्रीक्वेंसी 2490 MH होती है. आज आपका फ़ोन अपोलो मिशन के कंप्यूटर से एक लाख गुना पावरफुल है.
वैसे ही यदि इसरो को देखें तो भारत के पहले अंतरिक्ष मिशन के रॉकेट साइकिल और बैलगाड़ी में रख कर ले जाये जाते थे, अंतरिक्ष सफल पहुँच जाते थे.
मनुष्य के दिमाग़ की क्षमता अद्वितीय है. आज अचरज होता है कि इतनी कम क्षमता से मनुष्य चंद्रमा पर पहुँच गया था. पचास साल बाद आज से दस लाख गुना कंप्यूटिंग पॉवर होगी और लोग अचरज करेंगे कि केवल बारह GB मेमोरी के दौर में चांद्र्यान चंद्रमा पर गया था और केवल 42 mega pixel के कैमरा से फ़ोटो खींची जाती थी.
और तब भी बहुत सारे लोग परेशान होंगे कि लाइफ में क्या करें समझ नहीं आ रहा है.
आज आपके पास जो है वह चंद्रमा पर पहुँचे मनुष्यों से लाख गुना ज्यादा है तो आपके पास कोई बहाना वाक़ई नहीं बचता कि आपके पास रिसोर्सेज़ नहीं हैं इस लिये कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
करीब करीब हम extreme पर पहुँच गये हैं। Quantum level पर computer नहीं चल सकता है। DATA corrupt हो जायेगा। Electron एक orbit से दूसरे में jump कर जायेगा। -anil thakur
बिलीव इन ह्यूमन्स. मनुष्य कोई न कोई इन्न्वोएशन का नया तरीक़ा ढूँढ ही लेंगे. -Nitin tripathi
कुछ Y2K जैसी काल्पनिक आशंका के मुरीद होने से बेहतर है भूत-वर्तमान के यथार्थ के आधार पर भविष्य की कल्पना की जाय. जैसे एक सच्चाई AI है और एक आशंका कंप्यूटर थी कि सबकी रोज़ी ही चली जायेगी. -mahendra pal singh
इस हिसाब से तो सर हम लोगों को अब तक सौर्य मंडल छोड़कर दूसरे लोगों तक पहुंच जाना चाहिए था इस टेक्नोलॉजी में कहीं कोई त्रुटि जरूर है. -ashutosh kumar Dwivedi
दादा जी बताते हैं आज से सत्तर साल पहले इंसान बैलगाड़ी से अपने हर रिश्तेदार के घर पहुँच जाता था. आपके लॉजिक से अब कार बाइक सबके पास है तो हर व्यक्ति देश विदेश अपने रिश्तेदारों के घर घूम रहा होगा रोज़. -nitin tripathi




अशोक कुमार शर्मा
July 27, 2023 at 9:02 pm
लेखन कला और अभिव्यक्ति की दुनिया में दृष्टिकोण, नजरिए या पर्सपेक्टिव का बहुत बड़ा तथा महत्वपूर्ण रोल होता है। आपके छोटे से आलेख ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया और बहुत सारी पुरानी यादें, ताजा कर दीं।
कंप्यूटर की दुनिया वाकई बहुत तेजी से बदली है और कमाल की गति से हम लोग भी उसके हिसाब से ढलते चले गए हैं। पहले लैपटॉप हल्के और तुरंत बूट होने वाले होते थे और उनका सॉफ्टवेयर बाबा आदम का विंडोज क्लाइंट एडिशन हुआ करता था जिसमें बूटिंग डिवाइस एक बटन था जिसे दबाते ही कंप्यूटर ऑन हो जाता था स्क्रीन चमकने लगता था। तब टाइपिंग के लिए हमें वाघेला डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम में वर्ड स्टार नामक एक कार्यक्रम की मदद लेनी पड़ती थी। आरंभिक मोबाइल ब्लैक एंड वाइट हुआ करते थे और बहुत ही ज्यादा भारी होते थे उन्हें जेब में रखना तो नामुमकिन था। कॉलिंग की दरें इतनी महंगी होती थी कि सुबह के 10:00 बजे से शाम के 6:00 बजे तक ₹20 प्रति मिनट कि दर से कॉलिंग होती थी और हम लोग एसएमएस के लिए अलग से पेजर इस्तेमाल किया करते थे। पेजर भी बहुत महंगा हुआ करता था और उसे रखना एक स्टेटस सिंबल बन गया था। पेजर आते भी बहुत महंगे थे अलग-अलग कंपनियों के होते थे। वो उनका मासिक किराया भी तगड़ा वसूल करते थे। देखते देखते इन सब दादागिरियों का अंत हो गया और मोबाइल हल्के अधिक काबिल और तेज होते चले गए।
मुझे याद आता है कि 2001 में मैंने अमेरिका में अपने चाचा प्रोफेसर भूदेव शर्मा, के माध्यम से एक पेनड्राइव मंगाई थी जिसकी कीमत करीब ₹7000 थी। उस पेनड्राइव की कुल क्षमता 40 मेगाबाइट थी। तब के कंप्यूटरों की यह हालत थी कि यूएसबी पोर्ट में 1 मेगाबाइट लगाने पर कंप्यूटर की हालत खराब हो जाती थी और उसे रीड करने में कंप्यूटर को पसीना आ जाते थे। मुंबई में जब मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता के साथ गया और कुछ मैटर ताज होटल में ₹10000 प्रतिदिन की दर पर स्थापित अपने कंप्यूटर सेंटर में जब लोड करने लगा तो मुझे शाम के 6:00 बजे से लेकर 7:30 बजे तक केवल फोटो अपलोड होने के लिए ही बैठे रहना पड़ा। यह बात और है कि अगले दिन वह सामग्री लखनऊ के सभी अखबारों में छपने और फ्रंट पेज पर कवरेज के कारण मुख्य सचिव योगेंद्र नारायण और उद्योग सचिव रोहित नंदन समेत सभी ने मुझे बहुत शाबाशी दी और मुख्यमंत्री ने खासतौर से कुछ पुरस्कार भी दिया।
बीते कुछ ही सालों में हमने देखा कि टैलेक्स टेलीफोन और फैक्स खत्म चुके हैं। अब प्रिंटर भी वाईफाई आ गए हैं। एक नई तकनीक और कुछ दिनों पहले ही आई है, उसके जरिए हम किसी भी कंप्यूटर या मोबाइल को किसी भी दूसरे शहर से कंट्रोल कर सकते हैं। अब बहुत सारे लोग एक साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी कर सकते हैं इसके लिए कोई अलग से सेटअप लगाने की जरूरत नहीं है। पहले यह हालत था कि रिलायंस कंपनी ने हर शहर में अपने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सेंटर बनाए थे जिनका वह बहुत तगड़ा किराया वसूल करती थी शायद ₹100000 एक घंटा तक के हिसाब से। इसके तुरंत बाद में जैसे ही नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी), जिन्हे पहले कलेक्ट्रेट के गैरेज जैसी जगहों पर भी अपना ऑफिस बनाने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा था, उन लोगों ने जैसे ही अपने सिस्टम को मजबूत बनाया तो पूरे देश में सरकारी कांच कामकाज का ढर्रा ही बदल गया। निजी सर्विस प्रोवाइडर्स की लूट खसोट समाप्त हो गई।
आपका लेख बहुत गजब है छोटा है लेकिन यह बहुत सारी यादों को समेटे हुए है। कम से कम मेरे मन में तो यादों की सुनामी चल रही है। आपको बहुत आशीष और शुभकामनाएं।