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आज के अखबार : ट्रम्प टैरिफ से लाचारी में ‘तोड़’ ढूंढ़ने का प्रचार, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में टक्कर

संजय कुमार सिंह

अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव निर्यात पर पड़ेगा और इससे निर्यातक परेशान हैं। फिर भी प्रधानमंत्री ने स्वदेशी का मंत्र दिया है। यह बयान एक अलग और खास संदर्भ में था इसलिए निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि इसीलिए है। फिर भी कल दैनिक भास्कर ने दोनों को मिलाकर छापा था। पढ़ने वाले को लगा होगा कि प्रधानमंत्री कुछ तो कर और सुझा रहे हैं। अमर उजाला ने कल उसे अलग से छापा था और लीड टैरिफ का नुकसान या प्रभाव बताने वाली थी। शीर्षक में कहा गया था, 48 अरब डालर के निर्यात पर सीधा असर होगा। आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, 40 देशों में निर्यात बढ़ायेगा भारत, बातचीत के रास्ते भी खुले। उपशीर्षक है, भारत ने कहा – रिश्तों में अड़चन अस्थायी है। अगर ऐसा ही है तो बातचीत का असर जब तक हो तब तक रिश्ते सुधर भी जायेंगे। लेकिन कल ही खबर छपी थी (जो किसी ना किसी ने छपवाई ही होगी) और यह किसी जर्मन अखबार के हवाले से छपी थी। जर्मन अखबार ने अपने सूत्र नहीं बताये हैं। फिर भी यह प्रचार चल रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने फोन किया था और प्रधानमंत्री ने नहीं उठाया (या बात की) वह भी चार बार। ऐसे में मामला जो है सो है लेकिन टैरिफ से टेक्सटाइल क्षेत्र परेशान है, कल खबर थी कि तीन शहरों के कपड़ा निर्यातकों ने उत्पादन बंद कर दिया है तो हेडलाइन मैनेजमेंट के लिहाज से इस खबर का महत्व आप समझ सकते हैं। अमर उजाला सरकार का यह काम कर रहा है और इतना ही नहीं। सात कॉलम के अखबार में चार कॉलम की लीड अगर कपड़ा निर्यातकों की चिन्ता पर काम जारी होने की खबर दे रहा है तो बॉटम का शीर्षक है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ स्वेच्छा से होना चाहिये, दबाव में नहीं। उपशीर्षक है, अमेरिका से टैरिफ वार के बीच संघ प्रमुख ने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी पर जोर दिया। खबर के साथ संघ प्रमुख की फोटो है और इससे लग जा रहा है कि खबर उन्हीं की है। ये दोनों खबरें केंद्र सरकार के लिए टेलर मेड पैकेज का हिस्सा लगती हैं।

नवोदय टाइम्स की लीड भी ऐसी ही है। शीर्षक है, ट्रम्प टैरिफ की तोड़ ढूंढ़ा। टेक्सटाइल निर्यात 40 देशों में बढ़ाने का कार्यक्रम इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, 590 अरब डॉलर का टेक्सटाइल बाजार। इसके अनुसार, 40 चुनिंदा देश हर साल 590 अरब डॉलर का परिधान आयात करते हैं। भारत के लिये इन बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की अच्छी संभावना बनती है। इस समय इन देशों में भारत की टेक्सटाइल हिस्सेदारी सिर्फ 5-6 प्रतिशत है। आप समझ सकते हैं कि ‘तोड़’ कितना कारगर होगा और कब तक कामयाब होगा। शायद इसीलिये, देशबन्धु की आज की लीड का शीर्षक है, भारत पर 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लागू। उपशीर्षक है, टैरिफ की वजह से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजारों में काफी महंगे हो जायेंगे। इसी के साथ विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का बयान है, ‘मोदी मित्र’ के टैरिफ से लाखों नौकरियों पर खतरा। आप समझ सकते हैं कि विपक्ष में रहते हुए लाल आंखें दिखाने की जरूरत बताने वाले नरेन्द्र मोदी जब भीगी बिल्ली बने हुए हैं तब हेडलाइन मैनेजमेंट से उनकी छवि बनाने या संभालने की कोशिश चल रही है। उसमें भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता के बयान को लीड बनाकर ऐसे छापा गया है जैसे सरकारी खबर है।

अमर उजाला ने सूत्रों के हवाले से लिखा है, अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत के रास्ते अब भी खुले हैं। जो स्थितियां हैं उसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प सीधे घोषणाएं कर रहे हैं। भारत के बारे में फिर कहा है कि पाकिस्तान से संघर्ष उन्होंने रुकवाया। देशबन्धु में छपी खबर के अनुसार, उन्होंने ऊंचे आयात शुल्क की धमकी देकर संघर्ष विराम कराया था। कल खबर थी कि 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने वाला है। ट्रम्प ने 25 प्रतिशत और टैरिफ लगाने की तैयारी कर ली है। ऐसे में बातचीत के दरवाजे खुले होने और प्रधानमंत्री के फोन नहीं उठाने का क्या मतलब हो सकता है, समझना मुश्किल है और आज भी अखबारों से पता नहीं चल रहा है। अमर उजाला की खबर है, वाणिज्य मंत्रालय निर्यात के नए बाजार तलाशने के लिए  सभी हितधारकों के साथ बैठक करेगा। इसका क्या प्रभाव होगा, कब होगा कुछ पता नहीं है लेकिन खबर तो है ही। मुद्दा यह है कि इसमें इतनी देर क्यों हुई। यह बैठक अभी तक हुई क्यों नहीं। टैरिफ की घोषणा या धमकी तो ट्रम्प ने बहुत पहले दी थी और अब कहा भी है कि युद्ध इसीलिए रोकना पड़ा। लेकिन विज्ञप्ति और निर्देश पर काम करने वाले अखबार वही करेंगे जिससे डरकर भारत के प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस करने की हिम्मत नहीं कर पाये और चुनाव आयोग ने किया तो सत्तारूढ़ पार्टी से अपने संबंध और करीबी के साथ विचारों की समानता का खुलासा भी कर गया। देशबन्धु के अनुसार, भाजपा प्रवक्ता डॉ. सैयद जफर इस्लाम ने कहा है कि सरकार आत्मनिर्भर भारत की दिशा में काम कर रही है। द टेलीग्राफ ने नवनीत अग्रवाल की कहानी लिखी है और बताया है कि टैरिफ को लेकर अंतिम उम्मीद दैवीय सहायता की ही है। इनका व्यवसाय तमिलनाडु और बंगाल में है तथा इनमें सैकड़ों लोग काम करते हैं। लेकिन नया काम नहीं होने और तैयार माल देर से बिकने के कारण कंपनी की हालत खराब है और ऐसा देश भर की कई कंपनियों के साथ है।   

सुप्रीम कोर्ट में कुत्तों के मामले में निर्णय बदलने, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहले से सार्वजनिक डिग्री को नहीं दिखाने के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश, सुप्रीम कोर्ट में मामला होने के बावजूद एसआईआर जारी रहने, आधार के उपयोग की सलाह नहीं मानने, 65 लाख नाम मनमाने ढंग से हटा दिये जाने और प्रक्रिया में बीएलए के शामिल न होने पर परेशानी जैसे मामलों के बीच राज्यपालों के लिए विधेयकों पर सहमति देने की समय सीमा तय करने के सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश पर विचार के दौरान मुख्य न्यायाधीश का कहा दो बार अखबारों में छप चुका है कि अगर कोई राज्यपाल विधेयक पर सहमति न दे और उसे वापस भी न करे तो क्या सुप्रीम कोर्ट असहाय बना रहे। यह सुप्रीम कोर्ट पर सरकार का दबाव ही बताता है भले तर्कों के जवाब में पूछा गया हो। ऐसी स्थिति में आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि पूर्व रॉ अधिकारी के खिलाफ जारी गैर जमानती आदेश को दो दिन बाद अदालत ने रद्द कर दिया है। ऐसी खबरों से अदालतों की साख और निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है। चुनाव आयोग के मामले में ऐसा हो चुका है। अखबारों की अपनी स्थिति भी बुरी है और ऐसे में अक्सर छत गिरने (कल उडीशा के किसी स्टेशन की खबर थी), पुल टूटने, सड़क धंसने की खबर आती रहती है और निश्चित रूप से यह 2014 के बाद बढ़ गया है तथा जो गिर और धंस रहे हैं वे पहले के बने नहीं हैं। फिर भी प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं जबकि कल ही खबर थी कि गुजरात की अनजान सी 10 राजनीतिक पार्टियों को 4300 करोड़ रुपये का चंदा मिला है, तीन चुनावों में इसके 43 उम्मीदवारों को कुल 54069 वोट मिले हैं। खबर यह भी थी कि चुनाव आयोग को दिये विवरण के अनुसार इसमें इनके 39.02 लाख रुपये खर्च हुए जबकि ऑडिट रिपोर्ट में 3500 करोड़ खर्च हुए हैं। राहुल गांधी ने पूछा है कि चुनाव आयोग इसकी जांच करेगा या अभी भी शपथ पत्र मांगेगा। इसके बावजूद आज यह खबर मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। 

हिन्दुस्तान टाइम्स में सुप्रीम कोर्ट के दो नए जजों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी होने की खबर है। इनमें एक बांबे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आलोक अराधे हैं और दूसरे पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली। यह मामला विवादास्पद हो चुका था। मुख्य विवाद न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली को लेकर है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जुलाई 2023 में न्यायमूर्ति पंचोली के गुजरात हाई कोर्ट से पटना हाई कोर्ट में हुए स्थानांतरण से जुड़ी परिस्थितियों पर भी सवाल उठाए, यह कहते हुए कि उनकी पदोन्नति न्यायपालिका के लिए प्रतिकूल होगी। हालांकि, कॉलेजियम ने 4:1 के बहुमत से न्यायमूर्ति पंचोली के नाम की सिफारिश को मंजूरी दी और केंद्र सरकार ने भी उनकी नियुक्ति को स्वीकृति दे दी। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में शामिल एक सदस्य, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने उनके नाम की सिफारिश पर असहमति जताई थी। इस असहमति का कारण वरिष्ठता की अनदेखी था। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि न्यायमूर्ति पंचोली के नाम की सिफारिश करने से गुजरात हाई कोर्ट के कई अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस तरह की नियुक्तियों से एक गलत परंपरा स्थापित होगी और न्यायपालिका में वरिष्ठता तथा योग्यता के सिद्धांतों पर सवाल उठेंगे। हालांकि, कॉलेजियम ने बहुमत से न्यायमूर्ति पंचोली के नाम की सिफारिश को मंजूरी दी थी और सरकार ने भी इसे तुरंत स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति नागरत्ना की असहमति का नोट सार्वजनिक होने के बाद यह मामला चर्चा में आया। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले रहती आई है, आज भी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, 50 प्रतिशत टैरिफ का प्रभाव पड़ने के कुछ ही घंटों में कहा गया वार्ता के चैनल्स खुले हैं। अखबार में खात बाते के बॉक्स का शीर्षक है, सरकारी अधिकारियों ने कहा घबराने की कोई जरूरत नहीं है। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद भी सरकार और सरकारी अधिकारियों की यह हालत थी और तब तो ऐसा कहने की जरूरत भी नहीं समझी गई। मीडिया ने सच्चाई नहीं  बताई पर जो हुआ सबने भुगता और सबको याद होगा। नोटबंदी तो नरेन्द्र मोदी की ही महानता थी और इससे विवाह उद्योग में भारी उथल-पुथल रहा था। ज्यादातर शादियों की तारीखें आगे बढ़ानी पड़ी थीं और उनका बजट 50 से 80 पर्सेंट तक घटाना पड़ा था। लोग शादी समारोहों में हाथ बांधकर खर्च करने लगे। इसके चलते ज्वैलरी और डिजाइनर वेयर इंडस्ट्रीज लाइफ सपोर्ट पर आ गईं। भव्य भारतीय शादी समारोह बस नाम के रह गए। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान में दिए भाषण में वेडिंग मार्केट पर डीमॉनेटाइजेशन के असर का जिक्र किया। उन्होंने कहा था, ‘घर में शादी है, पैसे नहीं हैं।’एक साल बाद वेडिंग पोर्टल, बैंडबाजा के को-फाउंडर और सीईओ सचिन सिंघल ने कहा था कि वेडिंग इंडस्ट्री पूरी तरह से पटरी पर लौट आई है। ऐसे में अब सरकारी अधिकारी के कहने का मतलब समझा जा सकता है। खासकर इसलिये कि कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि इससे मोदी की वैश्विक कूटनीति की नाकामी का पता चलता है। हालांकि यह प्रमुखता से नहीं है जबकि नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने रेहड़ी पटरी वालों के लिए अपना खजाना खोल दिया है और 7332 करोड़ रुपये खर्च करेगी। सरकार ने पीएम स्वनिधि योजना को पुनर्गठित किया है और इसकी अवधि 31 मार्च 2030 तक बढ़ा दी है। यह पहले पन्ने पर है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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