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उत्तर प्रदेश

इंडियन एक्सप्रेस में गाजियाबाद पुलिस की गुंडागर्दी की कहानी छपी

अभिषेक उपाध्याय-

योगी आदित्यनाथ के राज में यूपी पुलिस को हुआ क्या है? आज इंडियन एक्सप्रेस का फ्रंट पेज पढ़िए। ये गाजियाबाद की पुलिस है। गाजियाबाद के बीजेपी एमपी अतुल गर्ग के खिलाफ आज से छह महीने छपी एक रिपोर्ट को आधार बनाकर इमरान ख़ान नाम के एक पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्ट भी क्या, एक प्रेस कांफ्रेंस थी जो लोकसभा चुनावों के वक्त कांग्रेस की उम्मीदवार ने उनके खिलाफ की थी और उन्हें भूमाफिया बताया था।

इसी प्रेस कांफ्रेंस को इमरान ने अपने लोकल हिंदी अखबार आप अभी तक में छाप दिया था। तारीख थी 12 अप्रैल। इसके छह महीने बाद यानी 6 अक्टूबर को अतुल गर्ग ने मानहानि की एफआईआर कर दी। अव्वल तो ये एफआईआर ही समझ से परे है कि एक प्रेस कांफ्रेंस को, वो भी कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी की, छापने पर आप छह महीने बाद एफआईआर कैसे कर सकते हैं?

इसके बाद गाजियाबाद पुलिस ने चट से इस एफआईआर के आधार पर गिरफ्तारी भी कर ली। सोचिए, रोज ही कितने बड़े-बड़े अखबार चैनल कितने ही नेताओं की ऐसी प्रेस कांफ्रेंस छापते हैं। फिर तो गाजियाबाद पुलिस को चाहिए कि नोएडा के फिल्म सिटी या फिर पड़ोस में दिल्ली जाकर उन सभी संपादकों को गिरफ्तार करे और डासना में डाल दे।

अब जब उदाहरण ही स्थापित करना है तो बड़े स्थापित कीजिए। किसी लोकल दैनिक के पत्रकार, किसी यूट्यूबर को उठाकर क्या मिलेगा?

मैं पिछले कई दिनों से कानपुर के पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार से यही सवाल कर रहा हूं कि आप डीएम राकेश कुमार सिंह की शिकायत पर एक्शन लेते हुए आज तक और जी न्यूज समेत तमाम बड़े अखबारों व चैनलों के खिलाफ एफआईआर क्यूं नही दर्ज कर रहे, जिनका जिक्र डीएम साहब ने अपनी शिकायत में किया है।

या तो डीएम साहब पर झूठी शिकायत के लिए एफआईआर हो या फिर जिनके खिलाफ उन्होंने शिकायत दी है, उन पर एफआईआर हो। कुछ तो कीजिए। क्या सिर्फ कार्यवाही के नाम पर लोकल पत्रकारों पर ही शिकंजा कसा जाएगा?

इससे पहले इसी गाजियाबाद पुलिस ने पूर्व एमपी जनरल वीके सिंह की शिकायत पर एक यूट्यूबर को गिरफ्तार कर लिया था। उसकी भी रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस ने छापी थी। जनरल वीके सिंह पर गाजियाबाद में रिहाइश के दौरान शहर के एक लोहा व्यापारी ने कुछ आरोप लगाए थे। यूट्यूबर ने उन्हें चला दिया था। जनरल साहब ने एफआईआर करा दी। पुलिस ने यू ट्यूबर को उठा लिया।

इस बीच गाजियाबाद कोर्ट में वकीलों पर लाठियां भांजने के मामले में यूपी की बार काउंसिल ने राज्यव्यापी विरोध का ऐलान कर दिया है। इसकी खबर भी इंडियन एक्सप्रेस में पढ़िए जिसमें कोर्ट रूम में वकीलों पर हुए ताबड़तोड़ लाठीचार्ज के वायरल होते वीडियो का भी जिक्र है।

उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाएं एक सिलसिले का हिस्सा बनती जा रही हैं। कारण सिर्फ इतना है कि कोई रोक नहीं है। कोई पूछने वाला नहीं है कि हुजूर आप कर क्या रहे हैं? ये पद, पोस्ट, अधिकार…ये सिर्फ कुछ वक्त के होते हैं। वक्त बदलता है तो फिर आप खुद उस शिकायत ब्रिगेड का हिस्सा बन जाते हैं जो अपनी तकलीफें बयां करती हुई, स्वयं को विक्टिम के खांचे में पेश करती है। इसीलिए अधिकारों के असीमित और नाजायज प्रयोग से बचना चाहिए।

अधिकारों का बेजा इस्तेमाल सबसे आसान काम है और स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए विवेक सम्मत फैसले लेना बेहद मुश्किल। कई बार कुछ अच्छे और ईमानदार लोग भी इसी कुचक्र में फंस जाते हैं और चाहे अनचाहे इसी अन्यायपरक सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं! ये दुर्भाग्यपूर्ण है!

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