
नवेद शिकोह-
उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति का चुनाव खैरियत से सम्पन्न हुआ। लेकिन ये भी टेस्ट हो गया कि हमारे कुनबे में खैरियत नहीं है। जो होना था वो हुआ पर जो नहीं होना चाहिए था वो भी हुआ।
किसी भी बिरादरी, पेशे या समाज का निर्वाचित संगठन शो रूम की तरह होता है। प्रतीक या आईने की तरह होता है। कुनबे में खूबियों युक्त सुपर क्वालिटी को शोरूम में डिस्प्ले किया जाता है। इसीलिए राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकार अपनी समिति में ऐसों को चुनते थे जिनका पत्रकारिता (कलम और कैमरे) के हुनर में विशिष्ट योगदान रहा हो।
लेकिन दुर्भाग्यवश कि इस अच्छी परंपरा पर विशु्द्ध राजनीति का गंदा रंग चढ़ता दिखा। और इस चुनाव के कुछ रंग बेरंग होते दिखे। लखनऊ के लोकप्रिय पत्रकार ज्ञानेन्द्र शुक्ला के क़लम ने चुनावी गतिविधियों की एक सच्ची और बदसूरत तस्वीर पेश की थी। पर एक अनछुआ पहलू शायद उनकी नजर से छूट गया था। संवाददाता समिति में बहुत कुछ चला, जो सबसे ज्यादा चला वो था- पीडीए।
यानी एक विशेष जाति के वर्चस्व को तोड़ने के लिए दूसरी जातियों/धर्म के लोगों को एकत्र कर भारी जनसमर्थन को जुटाने के फार्मूले पर काम करना। इसके लिए पीडीए की खूब बैठके हुई। जितनी बैठकें हुई उससे ज्यादा इसकी चर्चाएं हुईं।
हालांकि ये दिलचस्प राज़ भी खुला कि पीडीए की जो बारातें सजाई गई थी उसके दूल्हा ही जाति विशेष के थे।
दरअसल पीडीए के उम्मीदवारों को जिताने के नाम पर एक बड़ा छल किया गया था। पीडीए वालों को लाभ पहुंचाने के नाम पर प्रत्याशी विशेष को लाभ पहुंचाना मक़सद था। इसलिए पीडीए वालों को पीडीए का जरा भी फायदा नहीं हुआ, लेकिन पत्रकारों के चुनाव में जब पीडीए का हल्ला मचा तो इसका रिएक्शन भी होना ही था। शीर्ष पदों के नीचे सभी पदों के चुनाव पर तेजी से धर्म/जातियों का ध्रुवीकरण हो गया। जब जाति विशेष के पत्रकारों को लगा कि उनके खिलाफ पीडीए एकजुट हो रहा है तो करीब पौने तीन सौ पत्रकारों की तादाद वाले पत्रकारों को गोलबंद करने की कोशिश की गई। जिससे हर जाति-धर्म के ऐसे उम्मीदवारों को नाहक नुकसान उठाना पड़ा जो इस किस्म की गंदी राजनीति से कोई मतलब नहीं रखते हैं।
दरअसल पत्रकार की पहचान उसके धर्म या जाति से नहीं उसके कलम से होती है, उसकी खबरों से होती है, उसकी वर्तमान या अतीत की खालिस पत्रकारिता से होती है। पत्रकार की पहचान उसके बैनर से भी होती है। पत्रकार किस मीडिया प्लेटफॉर्म में लिखता है या दिखता है, पहचान का मानक ये भी है।
एक बात और मज़े की यह कि पीडीए की इन बैठकों में सिर्फ़ पी डी के ही प्रत्याशियों को बुलाया गया, इसका ए यानि अल्पसंख्यक प्रत्याशी इन बैठकों से पूरी तरह से ग़ायब रहे या यूँ कहे कि उन गरीब अल्पसंख्यक प्रत्याशियों को इन बैठकों में बुलाया ही नहीं गया लेकिन वो मुफ़्त में बदनाम हो गये।
जहां तक मुझे मालूम है उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी ज़फ़र भाई तो अल्पसंख्यक समुदाय से ज़्यादा बहुसंख्यक समुदाय के बीच लोकप्रिय है लेकिन वो भी आटे के साथ घुन के रूप में पिस गये।
ख़ैर अच्छा लगता यदि ज्यादा से ज्यादा अच्छे पत्रकार संवाददाता समिति में होते। अच्छा लगता यदि ये घरेलू चुनाव आपसी सामंजस्य के साथ लड़ा जाता। अच्छा लगता यदि बहुत से अच्छे पत्रकार एक पद पर आपस में नही टकराते।
क़रीब 24 साल से पीटीआई की नौकरी कर रहे और पूर्व कोषाध्यक्ष और निवर्तमान उपाध्यक्ष ज़फ़र इरशाद, देवकीनंदन (सहारा के पूर्व यूनिट हेड), राजीव तिवारी बाबा (राष्टीय सहारा, टाइम्स आफ इंडिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण) सुरेश यादव (पच्चीस वर्षों से आज में हैं), अजय श्रीवास्तव (जनसत्ता, राष्ट्रीय स्वरूप, कुबेर टाइम्स इत्यादि), डीपी शुक्ला (स्वतंत्र चेतना, स्वतंत्र भारत में रहे, वर्तमान में अमृत विचार मे हैं), सत्यवीर सिंह (आईबीएन7 में रहे), शिवशरण सिंह, राघवेन्द्र प्रताप सिंह रघू, बलराम गुप्ता, प्रदीप कुमार सिंह बागी जैसे तमाम पत्रकार भी मान्यता समिति में होते तो अच्छा लगता। ये तब हो सकता था जब खांटी पत्रकार आपसी सामंजस्य से चुनाव लड़ते।
ऐसे लोगों से संवाददाता समिति की शान और भी बढ़ती। ख़ैर भारत सिंह, राघवेन्द्र त्रिपाठी, अविनाश मिश्रा, शेखर शर्मा, आलोक त्रिपाठी, दिलीप सिन्हा, रितेश सिंह जैसे तमाम खांटी पत्रकारों का चुना जाना राहत देता है।
लेखक, उ.प्र.राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के कार्यकारिणी सदस्य हैं।




SANJOG WALTER
September 3, 2024 at 9:21 am
कोई बात नही नवेद भाई आपके इस लेख मे मेरा जिक नहीं था। 2021 मे मिले तल्ख तज़ुर्बे के बाद मैने चुनाव नही लड़ने का फैसला किया।
जिन्होंने 2021 में मुझे किसी भी कीमत पर जीतने न देने की कसम खाई थी,उन्होंने इस बार 7 बार फोन किया था।
जिस निचले स्तर पर उतर कर prachar किया गया उसे सुनकर बहुत शरम हुई