ओम थानवी-
विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ मिलने पर जितना खुलकर स्वागत हुआ, कम लेखकों का होता है। लेकिन हैरानी हुई कि अनेक वामपंथी मित्र — जो अन्यथा फ़ेसबुक पर अत्यधिक सक्रिय हैं — चुप्पी साधे बैठे हैं। कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक, शिक्षक — कुछ मित्रों की वॉल पर जा-जा कर देखा। वे भी विनोदजी के सम्मान पर कुछ नहीं बोले। वे भी जो साहित्यकारों के जीवन-मरण तक की पूरी ख़बर रखते हैं; तुरंत जानकारी देते हैं, अपनी बात साझा करते हैं।
एक प्रगतिशील विद्वान ने तो साफ़-साफ़ कह भी दिया कि शुक्लजी को ज्ञानपीठ मिलने पर वे नहीं कुछ बोलेंगे, क्योंकि यह पुरस्कार पिछले साल रामभद्राचार्य को मिल चुका है; (गुलज़ार को कैसे उन्होंने सुपात्र समझा, वे जानें)।
जब गुलज़ार और रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ मिला, मैंने ‘द वायर’ में लेख लिखकर उस गिरावट की निंदा की थी। लेकिन अब “भूल-सुधार” सा ज़ाहिर हुआ है तो इस पर बेरुख़ी कैसी? गांधीजी को शांति का नोबेल मिले, ऐसा बहुत लोगों ने चाहा, न मिलने पर तीखी प्रतिक्रिया भी की। लेकिन बाद में जिन शांतिदूतों को मिला, उनके सम्मान में आदर और ख़ुशी का इज़हार करने में कोई क़सर न रखी।
संघ-भाजपा की संकीर्णता और क्षुद्रता हमें उचित ही बुरी लगती है। लेकिन अपने मित्रों की असहिष्णुता जब-जब ज़ाहिर हो, तब वह भी नहीं सुहाती।
शायद विद्वानों की टिप्पणियाँ पढ़कर अज्ञातकुलशील भी लिखने लगे कि “ज्ञानपीठ की घोषणा के साथ कवि विनोद कुमार शुक्ल रामभद्राचार्य की श्रेणी में आ गए हैं।”
ऐसा प्रतिक्रिया भी देखी कि विनोदजी ने नक्सलवाद पर कुछ नहीं लिखा, या फ़लाँ-फ़लाँ मामले में कुछ नहीं कहा। भाई, यह मौक़ा ख़ुशी ज़ाहिर करने का है या रंग में भंग घोलने का? और लेखक हर मामले में लिखे-बोले, यह शर्त किसने रखी? इसका हिसाब कौन रखता है, और क्यों?
किसी व्याख्यान में के बाद — मैंने ख़ुद सुना — पहला ही सवाल उछला कि अजी आपने इस बात पर तो कुछ नहीं कहा कि … वक्ता ने तुरंत कहा था: जी, मैंने तो अपने व्याख्यान में कई बातों पर कुछ नहीं कहा! जो कहा, उस पर जवाब दे सकता हूँ।
रसूल हमज़ातोव भी ‘मेरा दाग़िस्तान’ (भाग-एक) में आलोचकों को वाजिब नसीहत देकर गए हैं — कि लेखक ने जो लिखा उसकी चर्चा करो, न कि उसकी जो नहीं लिखा।
चंदन पांडेय-
ओम थानवी ने एक पोस्ट लिखी है जिसमें उनका आशय है कि वामपंथी लोग विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार की बधाई नहीं दे रहे हैं। अगर आकलन का कोई अर्थ है तो यह सहज अनुमान है कि कल से आजतक लाखों लोग विनोदजी को अन्यान्य माध्यमों से बधाई दे चुके हैं। अब ऐसे में वे चुन चुनकर बधाइयाँ गिन रहे हैं तो अवश्य कोई मंतव्य होगा।
आज रविवार था इसलिए कुछ दोस्तों से बात हुई, सबने कहा कि ज्ञानपीठ का निर्णय बेहतर है, इसका चतुर्दिक स्वीकार है। बधाई देना, नहीं देना अपनी जगह है। बहुत लोगों ने गीतांजलि श्री को भी बधाई नहीं दिया होगा। अगर पुरस्कार ही देखें तो वह बुकर भी बहुत बड़ा सम्मान था। लेकिन इस बिना पर आप किसी को कटघरे में खड़ा करते हैं कि किसने बधाई दी और नहीं दी तो बुरा मत मानिए आप एक खास किस्म के एलीटबाज पाठकों/लोगों को उकसा रहे हैं। फिर कह रहा हूँ, उकसा रहे हैं।
लेकिन बात इतनी ही नहीं है। अगर ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी आपको यकीन न हो तो आप ओम थानवी की पोस्ट से अनुमान लगा सकते हैं कि विनोद जी कितने बड़े लेखक हैं! उनका कद है! और यही साहित्यिक कद उनका तीन वर्ष पूर्व भी था जब रॉयल्टी प्रकरण में निपट अलग थलग पड़ गए थे! तब मुझे नहीं याद आता कि ओम थानवी ने एक भी शब्द उनपर खर्चे थे। मैंने आज उनके उन सारे पोस्ट्स को खंगाला जो विनोद कुमार शुक्ल पर हैं, उनमें से किसी में रॉयल्टी वाला वह प्रकरण नहीं दिखा। क्यों हुआ होगा ऐसा?
हो सकता है कि ओम थानवी ने फौरी तौर पर उस विवाद पर कुछ लिखा हो लेकिन जिस भीड़ को उन्होंने अपनी पोस्ट से और पोस्ट पर उकसाया है उनमें से शायद ही किसी ने विनोद जी के उस वक्त पर कुछ लिखा! एक दो को छोड़कर। प्रियंका ने लिखा था। और किसी का याद नहीं आता।
आखिर क्यों हुआ होगा ऐसा? इस एक प्रश्न के जवाब के बहाने भी किसी भीड़ को उकसाया जा सकता है। लेकिन नहीं, उकसाना बुरे लोगों का काम माना जाता है। निहायत।
मेरा अपना मानना है कि अगर किसी व्यक्ति के संकट और खुशी वाले मौकों पर साथ खड़ा होने की बात हो तो दोनों पर खड़े होइये वरना संकट के समय साथ दीजिये।
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