Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

आयोजन

वीरेनियत 6 : कवि वीरेन डंगवाल पर एक कामयाब आयोजन

पंकज चतुर्वेदी-

वि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले समकालीन हिन्दी कविता के सालाना जलसे में आठ चुने हुए कवियों–हरीश चन्द्र पाण्डे, सत्यपाल सहगल, विजया सिंह, कविता कादम्बरी, पूनम वासम, अंचित, पराग पावन और नादिम नदीम का कविता-पाठ सुनने कल 16 नवम्बर को इंडिया हेबिटेट सेंटर, नयी दिल्ली आया था।

‘वीरेनियत : 6’ एक कामयाब आयोजन था, क्योंकि मानवीय ऊष्मा, विवेक और संवेदना से सम्पन्न साथियों से खचाखच भरे सभागार में बहुत-सी बेहतरीन कविताएँ सुनने को नसीब हुईं। एक महफ़िल से इतना कुछ मिल जाए, और क्या चाहिए!

यह आश्वस्ति भी मिली कि फ़ासीवादी सत्ता-प्रतिष्ठान, अकादमिक संस्थानों और सरकारी साहित्यिक संस्थाओं की उदासीनता और उपेक्षा के बावजूद अच्छी कविताएँ लगातार लिखी जा रही हैं और लिखी जाती रहेंगी। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि पूरे हिन्दी समाज में बिखरी हुई श्रेष्ठ एवं तेजस्वी युवा कवयित्रियाँ जिस तरह आज रचनारत और सक्रिय हैं, पहले शायद कभी नहीं थीं। विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल और मंगलेश डबराल सरीखे कवि आज होते, तो बहुत ख़ुश होते।


आशीष कुमार-

वीरेनियत 6 – कल ऐसा लगा कि लोग दाद देने के लिए ही वीरेनियत में आए हैं। बात-बेबात-हर बात पे ताली!

एक दफ़े कहीं कविता पर बोलते हुए नामवर जी ने मिर्ज़ा का एक शेर कोट किया-

देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा
मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है

उन्होंने कहा कि अच्छी कविता वह है, जिसके आलोक में आप ख़ुद को पहचानते हैं। औसत पाठक जानने और पहचानने जैसी कठिन प्रक्रिया में नहीं जाता। वह मानता है, और अगर आप वही मानते हैं तो आपको दाद देता है।

कल जितने घिसे हुए जुमलों दाद मिल रही थी, उससे लगता है कि जल्दी ही नयी बातें निरर्थक हो जाएँगी।

मेरे पीछे आदरणीय पंकज चतुर्वेदी जी बैठे थे, बल्कि ‘दादातुर’ बैठे थे। हर कवि को कमाल! कह रहे थे।

हमारे कवि मित्र अंचित चौथे नंबर पर कविता पढ़ने आये। अंचित की कविताएं चलताऊ ढाबों पर मिलने वाले तुरंता अचार की तरह लगीं। अंचित सूचनाओं को पचाकर कहने के बजाय सूचनाओं को ही कविता कहना चाहते हैं।

अंचित ने तीसरी कविता पढ़ना शुरू किया और कहा- यह कविता पटना के लिए है। पीछे से आवाज़ आयी- आह!

सब लोग हठात हँस पड़े।

जब अंचित जी पढ़कर बैठे तो मैंने पंकज जी से पूछा, हर कवि पर आप कमाल कह रहे थे, पहली बार आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी! उन्होंने बस एक वाक्य कहा- क्या कहा जाए!


विमल कुमार-

वीरेनियत में आज युवा कवियों विशेषकर कवयित्रियों ने इतनी अच्छी कविताएं सुनाई कि डर के मारे उनसे मिलने की हिम्मत भी नहीं हुई।

पूनम वासम और कविता कादम्बरी ने शानदार धारदार कविताएं सुनाईं।


आशुतोष कुमार-

वीरेनियत से हिंदी कविता के लिए उम्मीद जगी है। कवयित्रियों ने सुनाईं धारदार, मार्मिक और राजनीतिक रूप से सचेत कविताएं ! शहर का नाम बदलने से इतिहास नहीं बदल जाता

हिंदी के दिवंगत कवि वीरेन डंगवाल धीरे धीरे एक प्रतीक में बदलते जा रहे हैं। धूमिल के बाद युवा वर्ग में वह लोकप्रिय होते जा रहे हैं। इसके पीछे युवा कवियों नए पाठकों और छात्रों का प्यार और श्रद्धा छिपी हुई है।

वीरेनियत 6- ने कल यह सिद्ध कर दिया कि हिंदी कविता अपने समय में बहुत हस्तक्षेप कर रही है और उससे निराश होने की जरूरत नहीं हैं। कविता का भविष्य उज्ज्वल है।

कलके समारोह में दरअसल कवयित्रियों ने अपना गहरा प्रभाव छोड़ा। पूनम वासम और कविता कादम्बरी ने बहुत धरधार दृष्टि सम्पन्न और मार्मिक कविताएं सुनाकर हिंदी कविता से बहुत उम्मीद जगाई और महफ़िल को भी लूट लिया। उन दोनों ने आज के माहौल में वंचित समुदाय की तकलीफों का बहुत मार्मिक चित्रण किया। एक गहरी प्रतिबद्धता के साथ इन कविताओं ने एक नया मुहावरा भी प्रस्तुत किया।

पूनम ने आदिवासी समाज की विसंगतियों को चित्रित करते हुए विकास के भी सवाल उठाए। उनकी प्रेम कविताएं भी गहरा राजनीतिक अर्थ लिए थी और उसका सौंदर्यबोध भी अलग था। उन्होंने कविता की भाषा और मुहावरे में भी नवाचार किया है। जसिंता केरकेटा के बाद छत्तीसगढ़ के बीजापुर की कवयित्री पूनम एक भरोसेमंद आवाज़ बनकर उभरी हैं।

उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियां यादगार बन कर स्मृति में दर्ज हो गयी हैं —

मैं तुम्हारे पैरें के लिए इंद्रवती नदी का पानी लेकर आऊं… तुम्हारा माथा नहीं तुम्हारे पैर चूमना चाहूँगी…. मेरे पुरखे मरते नहीं पत्थर बन जाते हैं… मैं पहाड़ों को देखती हूँ उम्मीद की तरह नदी अपना दुख किससे कहती होगी मेरे वाद्ययंत्र तोड़े गए …


अनुपम सिंह-

वीरेनियत- 6


आशीष कुमार-

वीरेनियत 6 : अनुपम वीरेनियत के आयोजकों में थीं इसलिए मैं महीनों से विरेनियत में ही था। रोज ऑनलाइन मीटिंग, चंदे के लिए लगातार फ़ोन, पोस्टर, बैनर…। देख-सुनकर जिउ अकच्च। चंदे के आग्रह पर मैंने कहा, मेरी सहनशीलता को ही चंदा समझा जाए।

समय से पहुँचने का इतना दबाव कि मैं समय से पहले पहुँच गया। हॉल में पहुँचा तो बृजराज सिंह और मृत्युंजय जी एक-दूसरे की तरफ़ कुर्सी खींचे जाने क्या बतिया रहे थे।

मैंने कहा ‘दो कवियन की वार्ता’ चल रही है!

बृजराज जी ने कहा, अगर हम दोनों कवि हैं तो तुम आलोचक हो।

मृत्युंजय ने तपाक से जोड़ा- हाँ, जस गन्हाउर गड़ही तस कनचोद बकुला।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन